चांद पर पहुंच गया 'सपेरों का देश', उधर अपनी कुंठा में मगन यूरोप; अभी और जलाएगी भारत की तरक्की – Hindustan Hindi News

हां, हम सपेरे हैं! और हमारी इस स्वीकारोक्ति में कोई शर्म नहीं, बल्कि 21वीं सदी के नए वैश्विक यथार्थ का सबसे बड़ा व्यंग्य छिपा है। हम वाकई सपेरे हैं, क्योंकि आज जब पूरी दुनिया आर्थिक मंदी, युद्ध की विभीषिका और कूटनीतिक अस्थिरता के जहरीले फन के आगे खौफजदा है, तब नया भारत अपनी नीतियों की ‘बीन’ से इन सभी वैश्विक संकटों को काबू कर रहा है।
हाल ही में नॉर्वे के एक अखबार ने भारतीय प्रधानमंत्री को एक सपेरे के रूप में दर्शाते हुए जो कार्टून छापा है, वह कोई रचनात्मक व्यंग्य नहीं है। यह दरअसल उस यूरोपीय और पश्चिमी मीडिया की हताशा का प्रकटीकरण है, जो 19वीं सदी के ‘कोलोनियल हैंगओवर’ से आज तक बाहर नहीं आ सका है। गोरे साहिबों को यह पच नहीं रहा है कि जिस देश को वे सदियों तक ‘सपेरों और नंगे फकीरों’ का देश कहकर अपनी श्रेष्ठता का झूठा दंभ भरते रहे, वह आज उनकी आंखों में आंखें डालकर अपने नियम खुद तय कर रहा है।
पश्चिमी देशों ने सदियों तक ‘वाइट मैन्स बर्डन’ के नाम पर दुनिया को लूटा और अपने साम्राज्यवाद को सही ठहराने के लिए भारत जैसी प्राचीन सभ्यताओं की एक स्टीरियोटाइप छवि गढ़ी। सपेरों का देश, हाथियों का देश, जादू-टोने का देश- ये वे नैरेटिव थे जो उनके अखबारों और साहित्य ने बेचे। लेकिन वे यह भूल गए कि जब यूरोप अंधकार युग में जी रहा था, तब भारत तक्षशिला और नालंदा से दुनिया को ज्ञान बांट रहा था। आज नॉर्वे के अखबार का यह कार्टून उसी ऐतिहासिक कुंठा की राख में सुलगती हुई ईर्ष्या है। उन्हें दर्द इस बात का नहीं है कि भारत में सपेरे हैं, दर्द इस बात का है कि भारत अब उनका सपेरा बन गया है।
भारत को ‘सपेरों, हाथियों और जादूगरों का देश’ कहना कोई स्वाभाविक बात नहीं थी; यह 18वीं और 19वीं सदी के ब्रिटिश और यूरोपीय उपनिवेशवादियों द्वारा बेहद चालाकी से गढ़ा गया एक नैरेटिव था। इस एजेंडे का मुख्य उद्देश्य भारत की समृद्ध बौद्धिक, वैज्ञानिक और दार्शनिक विरासत को दुनिया की नजरों से छिपाना था। पश्चिमी देशों को यह साबित करना था कि पूर्व के देश ‘असभ्य’ हैं, ताकि वे दुनिया पर अपने शासन और लूट को ‘वाइट मेन्स बर्डन’ कहकर सही ठहरा सकें।
प्रसिद्ध आर्थिक इतिहासकार एंगस मैडिसन के आंकड़ों के अनुसार, 17वीं सदी की शुरुआत में वैश्विक जीडीपी में भारत की हिस्सेदारी लगभग 23-24% थी, जो पूरे यूरोप की कुल अर्थव्यवस्था से कहीं अधिक थी। जिस देश ने दुनिया को शून्य (Zero), दशमलव प्रणाली, आयुर्वेद, शल्य चिकित्सा और उन्नत धातु विज्ञान दिया, उसे जानबूझकर केवल ‘सपेरों के खेल’ तक सीमित कर दिया गया।
आज का भारत उस औपनिवेशिक ढांचे को तोड़कर बहुत आगे निकल चुका है। नॉर्वे के अखबार या अन्य पश्चिमी मीडिया घरानों की यह कुंठा दरअसल भारत की वर्तमान सफलताओं को पचा न पाने का सीधा परिणाम है। जिस देश को वे दशकों तक दान और दया का पात्र मानते थे, आज वह उनकी आंखों में आंखें डालकर बात कर रहा है।
चंद्रयान-3 की चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सफल लैंडिंग ने पश्चिमी देशों के अहंकार को गहरी चोट पहुंचाई है। जिस ‘एलीट स्पेस क्लब’ पर पश्चिमी देशों का एकाधिकार था, भारत ने अपने स्वदेशी ज्ञान और बेहद कम बजट में उसके दरवाजे तोड़ दिए। जो देश मंगल ग्रह के ऑर्बिट में पहली ही कोशिश में पहुंच गया हो, जिसने चांद के दक्षिणी ध्रुव पर अपना शिवशक्ति पॉइंट स्थापित कर दुनिया को चौंका दिया हो, उसे सपेरों का देश कहना अज्ञानता की पराकाष्ठा है। यूरोप के तथाकथित बुद्धिजीवियों को शायद यह खबर नहीं है कि उनके मोबाइल फोन से लेकर उनके कॉर्पोरेट सर्वर तक का संचालन आज भारतीय दिमाग कर रहे हैं।
डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) और यूपीआई (UPI) के मामले में आज भारत यूरोप और अमेरिका से कोसों आगे है। पश्चिमी देश जहां आज भी पुराने कार्ड पेमेंट सिस्टम और क्लीयरेंस के धीमे चक्र में उलझे हैं, वहीं भारत के दूर-दराज के गांवों में भी लोग सेकंड के हजारवें हिस्से में डिजिटल लेन-देन कर रहे हैं। सड़क किनारे सब्जी बेचने वाले से लेकर बड़े शोरूम तक जिस निर्बाध गति से भारत में डिजिटल लेनदेन हो रहा है, वह यूरोप के कई विकसित देशों के लिए आज भी किसी जादू से कम नहीं है।
भारत आज दुनिया की 5वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और जल्द ही तीसरे स्थान पर पहुंचने की राह पर है। वहीं, कई यूरोपीय देश आज मंदी, ऊर्जा संकट और आर्थिक स्थिरता की कमी से जूझ रहे हैं। यह आर्थिक शक्ति संतुलन का बदलना भी उनकी कुंठा का एक बड़ा कारण है। सिलिकॉन वैली के शीर्ष पदों- गूगल, माइक्रोसॉफ्ट से लेकर आईबीएम तक पर आज इसी ‘सपेरों के देश’ के नागरिक बैठे हैं।
आर्थिक मोर्चे पर पश्चिमी देशों की हालत किसी से छिपी नहीं है। एक तरफ यूरोप और अमेरिका मंदी की आहट, बढ़ती महंगाई और चरमराती सप्लाई चेन से जूझ रहे हैं, वहीं भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना हुआ है। जब पश्चिमी बैंक डूब रहे थे, तब भारतीय अर्थव्यवस्था ने अपने मजबूत बुनियादी ढांचे के दम पर खुद को सुरक्षित रखा। आज दुनिया की बड़ी से बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियां चीन से अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर भारत में अपनी फैक्ट्रियां लगा रही हैं।
आज भारत ‘ग्लोबल साउथ’ यानी विकासशील और अल्पविकसित देशों की सबसे बुलंद और प्रामाणिक आवाज बन चुका है। जी-20 के सफल आयोजन ने दुनिया को दिखा दिया कि भारत केवल मेजबानी नहीं करता, बल्कि वैश्विक एजेंडा सेट करता है। रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान पश्चिमी देशों ने भारत पर दबाव बनाने की हर संभव कोशिश की, लेकिन भारत ने अपनी ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ से समझौता नहीं किया। हमने अपनी शर्तों पर तेल खरीदा और पश्चिम की आंखों में आंखें डालकर पूछा- “यूरोप की समस्याएं दुनिया की समस्याएं हैं, लेकिन दुनिया की समस्याएं यूरोप की समस्याएं नहीं हैं।” इस बेबाकी ने उस पश्चिमी मीडिया को अंदर तक झकझोर दिया है, जो भारत को हमेशा ‘यस मैन’ के रूप में देखने का आदी था।
यह पहली बार नहीं है जब पश्चिमी मीडिया ने ऐसी नस्लभेदी और कुंठित सोच का परिचय दिया है। उनका यह पैटर्न पुराना है।
2014 का न्यूयॉर्क टाइम्स कार्टून: जब भारत ने अपने पहले ही प्रयास में मंगलयान को मंगल की कक्षा में स्थापित कर इतिहास रचा था, तब प्रतिष्ठित माने जाने वाले ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ ने एक कार्टून छापा था। इसमें एक पगड़ी पहने भारतीय व्यक्ति को गाय लेकर ‘एलीट स्पेस क्लब’ का दरवाजा खटखटाते हुए दिखाया गया था। भारी विरोध के बाद उन्हें इसके लिए माफी मांगनी पड़ी थी।
कोविड-19 के दौरान दोहरे मापदंड: महामारी के दौरान पश्चिमी मीडिया ने भारत की चिताओं और श्मशान घाटों की तस्वीरें ड्रोन से खींचकर जिस तरह की ‘गिद्ध पत्रकारिता’ की, वह उनके नस्लभेदी दृष्टिकोण का प्रमाण था। जबकि ठीक उसी समय उनके अपने देशों (अमेरिका, इटली, ब्रिटेन) में स्वास्थ्य सेवाएं चरमरा गई थीं और लाशों के अंबार लगे थे, लेकिन वहां उन्होंने ऐसी असंवेदनशील रिपोर्टिंग से परहेज किया।
पश्चिमी मीडिया चाहे जितने कार्टून छाप ले, यथार्थ यह है कि 21वीं सदी का सूरज पूरब से निकल चुका है। भारत की यह तरक्की अभी उन्हें और जलाएगी। यह नया भारत है, जो अपनी सांस्कृतिक जड़ों (चाहे वे सपेरे हों या हमारे योग और आयुर्वेद) पर गर्व करता है, लेकिन साथ ही अपनी तकनीकी और आर्थिक उड़ान से आसमान नाप रहा है।
डिजिटल पत्रकारिता की बदलती लहरों के बीच समाचारों की तह तक जाने की ललक अमित कुमार को इस क्षेत्र में खींच लाई। समकालीन राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर पैनी नजर रखने के साथ-साथ अमित को जटिल विषयों के गूढ़ विश्लेषण में गहरी रुचि है। उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के रहने वाले अमित को मीडिया जगत में एक दशक का अनुभव है। वे पिछले 4 वर्षों से लाइव हिन्दुस्तान में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
अमित न केवल समाचारों के त्वरित प्रकाशन में माहिर हैं, बल्कि वे खबरों के पीछे छिपे ‘क्यों’ और ‘कैसे’ को विस्तार से समझाने वाले एक्सप्लेनर लिखने में भी विशेष रुचि रखते हैं। डिजिटल पत्रकारिता के नए आयामों, जैसे कि कीवर्ड रिसर्च, ट्रेंड एनालिसिस और एआई-असिस्टेड कंटेंट ऑप्टिमाइजेशन को वे बखूबी समझते हैं। उनकी पत्रकारिता की नींव ‘फैक्ट-चेकिंग’ और सत्यापन पर टिकी है। एक मल्टीमीडिया पत्रकार के तौर पर अमित का सफर देश के प्रतिष्ठित संस्थानों के साथ रहा है। उन्होंने अमर उजाला, वन इंडिया, इंडिया टीवी और जी न्यूज जैसे बड़े मीडिया घरानों के साथ काम किया है।
अमित ने देश के प्रतिष्ठित भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा और गुरु जम्भेश्वर विश्वविद्यालय से जनसंचार में मास्टर डिग्री हासिल की है। उन्होंने यूनिसेफ और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से हेल्थ जर्नलिज्म का सर्टिफिकेशन भी प्राप्त किया है। एआई-असिस्टेड कंटेंट ऑप्टिमाइजेशन और एडिटोरियल प्लानिंग में उनकी विशेषज्ञता उन्हें आज के आधुनिक न्यूज रूम के लिए एक अनिवार्य स्तंभ बनाती है। पेशेवर जीवन से इतर, अमित एक जुनूनी घुमक्कड़ हैं जिन्हें हार्डकोर ट्रेकिंग और फोटोग्राफी का शौक है, साथ ही वे ऐतिहासिक और वास्तविक जीवन पर आधारित सिनेमा देखने के भी शौकीन हैं।
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