नोटिस, समन और चार्ज फ्रेमिंग का खेल… क्या लीगल है मीनाक्षी नटराजन का नॉमिनेशन? – AajTak

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कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन का नॉमिनेशन रिजेक्ट हो चुका है. चुनाव आयोग के फैसले ने राजनीति के साथ-साथ कानूनी गलियारों में भी बड़ी बहस छेड़ दी है. कांग्रेस नेता बुधवार को अपना पक्ष रखने के लिए चुनाव आयोग के सामने पेश हुईं. हालांकि, बड़ा सवाल यही है कि क्या किसी उम्मीदवार को उस शिकायत का खुलासा करना जरूरी है, जिसमें अभी तक न तो FIR दर्ज हुई हो, न अदालत ने अपराध का संज्ञान लिया हो और न ही आरोप तय किए गए हों.
कांग्रेस की लीगल टीम के सूत्रों ने इंडिया टुडे को बताया कि मीनाक्षी नटराजन ने चुनाव आयोग के सामने यह दलील दी है कि तेलंगाना की अदालत द्वारा जारी किया गया समन वास्तव में औपचारिक नहीं था, बल्कि एक प्री-कॉग्निजेंस इन्क्वायरी का हिस्सा था. कांग्रेस का कहना है कि जिस शिकायत का हवाला देकर उनका नामांकन खारिज किया गया, उसमें उनके खिलाफ कोई प्रत्यक्ष आपराधिक आरोप भी नहीं था. फिलहाल चुनाव आयोग के फैसले का इंतजार है.
दरअसल, मीनाक्षी नटराजन का नाम तेलंगाना में एक पूर्व कांग्रेस कार्यकर्ता द्वारा दायर की गई निजी शिकायत में सामने आया था. शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि एक अन्य पूर्व कांग्रेस कार्यकर्ता ने उसका उत्पीड़न किया और उसके साथ छेड़छाड़ की थी. शिकायत में यह भी कहा गया कि उसने उस समय तेलंगाना कांग्रेस मामलों की प्रभारी और राज्य की AICC प्रमुख रहीं मीनाक्षी नटराजन से संपर्क किया था, लेकिन आरोपी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई.
इसी शिकायत पर हैदराबाद की मजिस्ट्रेट अदालत ने साल 2025 में मीनाक्षी नटराजन को नोटिस जारी किया था. कांग्रेस सूत्रों के अनुसार यह नोटिस भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी BNSS की धारा 223 के तहत जारी किया गया था. इसका उद्देश्य केवल सुनवाई में उपस्थित होकर जवाब मांगना था. इसलिए कांग्रेस की तरफ से दावा किया जा रहा है कि अदालत ने अभी तक कोई आगे की कार्रवाई नहीं की है और न ही मामले में अपराध का संज्ञान लिया है.
कांग्रेस का आरोप है कि रिटर्निंग ऑफिसर ने शुरुआती जांच के लिए जारी नोटिस को उस औपचारिक समन के बराबर मान लिया जो अदालत द्वारा अपराध का संज्ञान लेने के बाद जारी किया जाता है. पार्टी का कहना है कि इसी भ्रम के कारण नामांकन को गलत तरीके से खारिज कर दिया गया.
RP Act की धारा 33A क्या कहती है?
इस पूरे विवाद का केंद्र रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट, 1951 की धारा 33A है. यह प्रावधान उम्मीदवारों को अपने खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों की जानकारी देने के लिए बाध्य करता है. हालांकि यह बाध्यता हर शिकायत या नोटिस पर लागू नहीं होती.
धारा 33A के अनुसार उम्मीदवार को यह बताना जरूरी है कि क्या वह ऐसे किसी लंबित मामले में आरोपी है, जिसमें दो वर्ष या उससे अधिक की सजा का प्रावधान है और जिसमें सक्षम अदालत आरोप तय कर चुकी है. इसके अलावा उम्मीदवार को उन मामलों का भी खुलासा करना होता है, जिनमें उसे दोषी ठहराया जा चुका हो और एक साल या उससे अधिक की सजा सुनाई गई हो.
इस तरह केवल किसी शिकायत में नाम होना या किसी प्रारंभिक जांच का हिस्सा होना, अपने आप में धारा 33A के तहत खुलासा करने की अनिवार्यता पैदा नहीं करता.
BNSS की धारा 223 क्या है?
कांग्रेस की पूरी दलील BNSS की धारा 223 की प्रकृति पर आधारित है. यह धारा उस प्रक्रिया को बताती है, जब किसी मजिस्ट्रेट के सामने कोई निजी आपराधिक शिकायत दायर की जाती है. कानून कहता है कि आरोपी को सुनवाई का अवसर दिए बिना किसी अपराध का संज्ञान नहीं लिया जा सकता.
इस प्रक्रिया में मजिस्ट्रेट शिकायतकर्ता और उसके गवाहों से पूछताछ करता है, प्रारंभिक जांच करता है और उसके बाद तय करता है कि आगे क्या कार्रवाई होनी चाहिए. इसलिए धारा 223 के तहत जारी नोटिस को अंतिम समन या अपराध के संज्ञान के बराबर नहीं माना जाता.
कांग्रेस की दलील क्या है?
कांग्रेस का कहना है कि मीनाक्षी नटराजन को जो नोटिस मिला था वह केवल प्रारंभिक चरण की कार्रवाई थी. न तो अदालत ने FIR दर्ज करने का आदेश दिया था और न ही किसी प्रकार के आरोप तय किए गए थे. इंडिया टुडे से बातचीत में वरिष्ठ अधिवक्ता गौतम नारायण ने कहा कि कानून के अनुसार खुलासा तभी जरूरी होता है जब किसी मामले में आरोप तय हो चुके हों. 
उन्होंने कहा कि RP Act की धारा 33A को चुनाव नियमों के नियम 4A और उससे जुड़े फॉर्म-26 के साथ पढ़ना होगा. फॉर्म-26 में FIR से जुड़ी जानकारी मांगी जाती है, लेकिन कर्नाटक हाई कोर्ट ने 2024 के BG उदय मामले में स्पष्ट कहा था कि कोई फॉर्म कानून के दायरे का विस्तार नहीं कर सकता. यदि मूल कानून केवल आरोप तय होने की स्थिति में खुलासे की बात करता है तो चुनावी फॉर्म उससे आगे नहीं जा सकता.
उन्होंने बताया कि इस फैसले के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिका को सुप्रीम कोर्ट भी खारिज कर चुका है. इसलिए वर्तमान कानूनी स्थिति यही है कि केवल FIR या शिकायत के आधार पर खुलासा करना अनिवार्य नहीं माना जा सकता.
फॉर्म 2C से 26 तक का विवाद
गौतम नारायण ने यह भी कहा कि पहले चुनावी प्रक्रिया में फॉर्म 2C का इस्तेमाल होता था, जिसमें केवल उन मामलों का खुलासा आवश्यक था जिनमें उम्मीदवार को दोषी ठहराया गया हो. इसके बाद में सुप्रीम कोर्ट ने मतदाताओं के सूचना के अधिकार पर जोर दिया, जिसके बाद RP Act में धारा 33A लाई गई.
इसके बाद चुनाव आयोग ने फॉर्म-26 लागू किया. हालांकि कर्नाटक हाई कोर्ट ने कहा कि फॉर्म-26 कानून की मूल सीमाओं को पार नहीं कर सकता. यदि संसद ने धारा 33A में आरोप तय होने की शर्त रखी है तो केवल FIR या प्रारंभिक शिकायत के आधार पर अतिरिक्त बाध्यता नहीं बनाई जा सकती.
मीनाक्षी केस में कानून क्या कहता है?
गौतम नारायण का कहना है कि मीनाक्षी नटराजन के मामले में अदालत ने अभी तक यह भी तय नहीं किया है कि FIR दर्ज होनी चाहिए या नहीं. उनके अनुसार BNSS की धारा 223 की प्रक्रिया पुराने CrPC की धारा 156(3) जैसी प्रारंभिक जांच की प्रक्रिया है.
उन्होंने कहा कि यह पूरी तरह प्री-कॉग्निजेंस स्टेज है. यहां अदालत केवल प्रारंभिक साक्ष्यों और शिकायत की प्रकृति को देखती है. जब तक अदालत अपराध का संज्ञान नहीं लेती या आरोप तय नहीं करती, तब तक धारा 33A के तहत खुलासे की बाध्यता नहीं बनती.
उन्होंने कहा, “कोई FIR नहीं है, इसलिए उसे धारा 33A के तहत घोषित करने की आवश्यकता नहीं है. BNSS की धारा 223 के तहत जारी नोटिस कोई FIR नहीं है. कानून में मूल शर्त चार्ज फ्रेमिंग है, FIR नहीं.”
मनीष सिसोदिया केस का हवाला
इस विवाद के बीच जनवरी 2026 में दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा दिए गए एक महत्वपूर्ण फैसले का भी उल्लेख किया जा रहा है. अदालत ने आम आदमी पार्टी नेता मनीष सिसोदिया के खिलाफ दायर उस चुनाव याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें उन पर एक FIR का खुलासा नहीं करने का आरोप लगाया गया था.
दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा था कि केवल FIR दर्ज हो जाने से यह नहीं माना जा सकता कि किसी व्यक्ति के खिलाफ RP Act की धारा 33A के तहत खुलासा करने योग्य आपराधिक मामला लंबित है. अदालत ने स्पष्ट किया था कि ऐसी कानूनी जिम्मेदारी तभी उत्पन्न होती है जब आरोप तय हो जाएं या अदालत अपराध का संज्ञान ले ले.
अदालत ने यह भी कहा था कि संसद ने जानबूझकर धारा 33A में ‘ऐसे लंबित मामले जिसमें सक्षम अदालत द्वारा आरोप तय किए गए हों’ जैसी भाषा का इस्तेमाल किया है. इसलिए यह प्रावधान केवल उसी स्थिति में लागू होगा.
चुनाव आयोग के फैसले पर टिकी नजर
मीनाक्षी नटराजन का मामला अब केवल एक उम्मीदवार के नामांकन तक सीमित नहीं रह गया है. यह मामला इस व्यापक सवाल को जन्म दे रहा है कि चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के लिए आपराधिक मामलों के खुलासे की सीमा क्या होनी चाहिए.
यदि चुनाव आयोग कांग्रेस की दलीलों को स्वीकार करता है तो यह फैसला भविष्य के कई मामलों में मिसाल बन सकता है. वहीं यदि आयोग नामांकन खारिज करने के फैसले को सही ठहराता है तो यह चुनावी खुलासों की कानूनी व्याख्या को नए सिरे से परिभाषित कर सकता है.
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