सिर पर फोन बांधकर झाड़ू-पोछा-बर्तन और हर घंटे डॉलर में हो रही कमाई! AI रोबोट्स ऐसे हो रहे ट्रेंड – AajTak

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अपने ही घर में एक घंटे झाड़ू-पोछा करने या खाना बनाने के लिए कौन 250 रुपए देगा? आप सोचेंगे कि कोई नहीं देता. लेकिन ऐसा नहीं है, आज की तारीख में आप अपनी इसी रोजमर्रा की मेहनत से अच्छे-खासे पैसे कमा सकते हैं…
ये कहना है तमिलनाडु के करूर की रहने वाली एक साधारण हाउसवाइफ रम्या चंद्रा का. रम्या इस राह में अकेली नहीं. आज भारत के छोटे कस्बों और गांवों की हजारों महिलाएं दुनिया के सबसे एडवांस रोबोट्स की ‘गुरु’ बन चुकी हैं. 
पहली बार सुनने में यह किसी साइंस-फिक्शन फिल्म की स्क्रिप्ट जैसा लग सकता है, लेकिन इंटरनेशनल न्यूज एजेंसियों ‘DW’ और AFP की एक ग्राउंड वीडियो रिपोर्ट ने एआई (AI) क्रांति का ये अनोखा चेहरा दुनिया के सामने रखा है, जिसने सबको हैरान कर दिया है.
भारत के आम लोग और घरेलू महिलाएं अपने सिर पर स्मार्टफोन और कैमरे बांधकर अपने रोजमर्रा के कामों जैसे कपड़े धोना, खाना बनाना, बर्तन मांजना या सब्जियां काटने का वीडियो रिकॉर्ड कर रहे हैं. इन वीडियो का इस्तेमाल दुनिया की बड़ी टेक कंपनियां अपने रोबोट्स को ‘इंसानों की तरह’ काम करना सिखाने के लिए कर रही हैं.
कैमरे के साथ 30 मिनट का काम 40 मिनट में
इस काम की बारीकियों को समझाते हुए रम्या चंद्रा बताती हैं कि यह काम जितना आसान दिखता है, उतना है नहीं. इसमें बहुत ज्यादा सब्र की जरूरत होती है. अगर रसोई का कोई काम सामान्य रूप से 30 मिनट का है, तो सिर पर कैमरा पहनकर और पूरी रिकॉर्डिंग के नियमों का पालन करते हुए उसे पूरा करने में 35 से 40 मिनट लग जाते हैं. लेकिन इस थोड़े से अतिरिक्त सब्र के बदले इन महिलाओं को प्रति घंटे ₹250 (लगभग 3 से 4 डॉलर) तक की कमाई हो रही है, जो घर बैठे किसी वरदान से कम नहीं है.
हर दिन 90 से ज्यादा वीडियो और बदलता बैकग्राउंड: कैसे सीख रही हैं मशीनें?
सिलिकॉन वैली से लेकर बीजिंग तक, इस समय ‘फिजिकल एआई’ यानी ऐसे रोबोट्स बनाने की होड़ मची है जो घरों और फैक्ट्रियों में इंसानों की मदद कर सकें. लेकिन एक रोबोट को ये सिखाने के लिए कि इंसान किसी ऑब्जेक्ट (वस्तु) को कैसे पकड़ता है या फर्श पर कैसे झुकता है, लाखों अलग-अलग एंगल्स के वीडियो की जरूरत होती है.
रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस ट्रेनिंग की प्रक्रिया बेहद पेचीदा और सटीक है. एक-एक सेंटर या स्टूडियो में हर दिन 90 से ज्यादा वीडियो शूट किए जा रहे हैं. रोबोट्स को भ्रम से बचाने के लिए हर दिन बैकग्राउंड बदला जाता है. अगर कोई ट्रेनर आज एक पोज में बैठकर काम रिकॉर्ड कर रहा है, तो अगले दिन वह खड़े होकर और तीसरे दिन किसी दूसरी लोकेशन पर जाकर वही काम रिकॉर्ड करता है.
इसमें अलग-अलग बर्तनों, कपड़ों या औजारों के आधार पर इंसानी हरकतों को हर कोण से कैमरे में कैद किया जाता है, जिसे टेक की भाषा में ‘रोबोटिक लर्निंग थ्रू वीडियो डेमोंस्ट्रेशन’ कहते हैं. 
बता दें कि सिर्फ घरों में ही नहीं, बल्कि बड़े-बड़े स्टूडियो और फैक्ट्रियों में भी लोग दिन-रात अलग-अलग शिफ्टों में काम करके मशीनों को इंसानी हरकतें सिखा रहे हैं.
मशीनें चाहे जितनी स्मार्ट हो जाएं, इंसानों की जरूरत रहेगी
इस पूरी तकनीक का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि रोबोट्स को सिखाने के लिए खुद रोबोट्स काफी नहीं हैं. एआई और मशीनें भले ही कितनी भी तेजी से सीख रही हों, लेकिन उन्हें व्यावहारिक दुनिया का ज्ञान देने के लिए हाड़-मांस के इंसानों की जरूरत हमेशा बनी रहेगी. 
भारत जैसे देश में, जहां रोजगार को लेकर हमेशा चिंताएं रहती हैं, वहां इस ‘वीडियो डेटा’ रेवोल्यूशन ने टियर-2 और टियर-3 शहरों के युवाओं और महिलाओं के लिए कमाई के नए और लीक से हटकर दरवाजे खोल दिए हैं. लेकिन एक डर ये भी है कि एक दिन जब मशीनें हम ही से सब सीख जाएंगी तब क्या होगा. कहीं ये हमको ही री-प्लेस न कर दें. 
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