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पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी के सबसे क़रीबी सहयोगी कल्याण बनर्जी के हालिया बयान ने पार्टी के अंदर के असंतोष को और स्पष्ट कर दिया है.
वरिष्ठ वकील और पार्टी के सांसद कल्याण बनर्जी ने गुरुवार को पार्टी के महासचिव और ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी के व्यवहार को मुद्दा बनाया और यहाँ तक कह दिया कि पार्टी में या तो वो रहेंगे या अभिषेक बनर्जी.
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हार झेलने के बाद तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की मुश्किलें बढ़ी हैं और कई नेताओं ने पार्टी से किनारा कर लिया है या अभी कर रहे हैं.
ऐसे मुश्किल समय में कल्याण बनर्जी ने ममता बनर्जी का पक्ष लिया. हाल ही में उन्हें लोकसभा में टीएमसी का नया चीफ़ व्हिप भी बनाया गया. अब उनकी नाराज़गी को ज़्यादा गंभीर नज़र से देखा जा रहा है.
पिछले कुछ दिनों से बाग़ी सांसदों पर निशाना साध रहे कल्याण बनर्जी के इस ताज़ा अल्टीमेटम ने टीएमसी में संभावित फूट की अटकलों को और तेज़ कर दिया है.
दरअसल, उनसे भी पहले टीएमसी छोड़ने वाले कई नेताओं ने अभिषेक बनर्जी पर मनमानी का आरोप लगाया था. कुछ नेताओं ने पार्टी के चुनाव प्रचार अभियान की कमान संभालने वाली कंपनी आईपैक को लेकर भी असंतोष ज़ाहिर किया था.
आरोप ये भी लगे कि अभिषेक बनर्जी और आई पैक पूरी पार्टी को कॉर्पोरेट संस्थान की तरह चलाने की कोशिश की.
यहाँ तक कि चुनावी नतीजे आने के बाद ही कई नेताओं और कार्यकर्ताओं ने अभिषेक बनर्जी पर अपना ग़ुस्सा ज़ाहिर किया और उन पर पार्टी को 'ख़त्म' करने के आरोप लगाए.
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इससे पहले मालदा ज़िले के वरिष्ठ नेता और पूर्व पर्यटन मंत्री कृष्णेंदु नारायण चौधरी ने अभिषेक बनर्जी पर पार्टी को धीरे-धीरे ख़त्म करने का ज़िम्मेदार ठहराया था.
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लोकसभा में पार्टी के सांसद और ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद चेहरे कल्याण बनर्जी ने जब गुरुवार को ममता बनर्जी के सामने शर्त रखी तो इससे कुछ लोगों को हैरानी हुई.
कल्याण बनर्जी ने गुरुवार को कहा, "ममता दीदी पार्टी में अभिषेक को चुनेंगी तो मैं शामिल नहीं रहूंगा."
उन्होंने कहा, "मैं ममता दीदी के साथ हूं, मगर अब दीदी को तय करना है कि क्या वो अपनी पार्टी को अभिषेक के बिना आगे नहीं ले जा सकेंगी? अगर ऐसा है तो मैं इसमें शामिल नहीं रहूंगा."
उन्होंने पार्टी महासचिव अभिषेक बनर्जी से जुड़े एक क़ानूनी मामले से ख़ुद को अलग कर लिया.
कल्याण बनर्जी वरिष्ठ क़ानूनी विशेषज्ञ हैं और अभिषेक बनर्जी के केस देख रहे थे.
दरअसल, पूरा विवाद अभिषेक बनर्जी की ओर से बंगाल विधानसभा में विधायकों के फ़र्ज़ी हस्ताक्षर पेश करने वाले मामले की सुनवाई से जुड़ा है. यह केस कलकत्ता हाई कोर्ट में चल रहा है.
फ़र्ज़ी हस्ताक्षर मामले की जांच सीआईडी कर रही है, जिसने बीते सोमवार को अभिषेक बनर्जी के कार्यालय की तलाशी ली थी.
कल्याण बनर्जी का कहना है कि उन्होंने कोर्ट के सामने इस रेड का हवाला देते हुए जल्द सुनवाई की मांग की थी और अदालत गुरुवार को सुनवाई के लिए तैयार भी हो गई.
उनका कहना है कि वो केस को लेकर बुधवार को काफ़ी समय तक अदालत में भी इंतज़ार करते रहे. फिर बुधवार रात क़रीब 12 बजे उन्हें बताया गया कि अभिषेक बनर्जी से जुड़े स्थान की तलाशी मामले को कोई दूसरे वकील देखेंगे.
उन्होंने कहा, "करीब 12:30 बजे एक वकील मेरे पास आए और बताया कि तलाशी की कार्रवाई को लेकर अलग से एक रिट याचिका दायर की गई है और अब इस मामले की पैरवी एक वरिष्ठ वकील करेंगे. मैंने पूछा, 'जब आपने यह मामला पहले ही दायर कर दिया था, तो हमसे चर्चा क्यों नहीं की गई? यह पूरी तरह ग़ैर-क़ानूनी है."
कल्याण बनर्जी ने कहा, "मैंने पूरी रात इस मामले की तैयारी में बिताई. आज भी आप देख सकते हैं कि मैं हर जगह जा रहा हूं, जोखिम उठा रहा हूं और अपना काम कर रहा हूं. इसके बावजूद उनका अनादर करने का रवैया नहीं बदला है. वह (अभिषेक बनर्जी) मानते हैं कि बाक़ी सभी लोग उनसे नीचे हैं.''
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कल्याण बनर्जी जैसे ममता बनर्जी के भरोसेमंद साथियों के असंतोष को, राजनीति के जानकार अधिक गंभीर बता रहे हैं और पार्टी में फूट के लिए बाहरी दबावों से अधिक अंदरूनी समस्याओं को ज़िम्मेदार मान रहे हैं.
कोलकाता में सेंट ज़ेवियर कॉलेज में पढ़ाने वाले लेखक और वरिष्ठ पत्रकार सयांतन घोष का कहना है कि अगर पार्टी ने अभी सुधार नहीं किए तो मुश्किलें बढ़ जाएंगी.
सयांतन घोष ने एक्स पर लिखा, "कल्याण बनर्जी की अभिषेक बनर्जी को लेकर कही गई बातों पर ध्यान दिया जाना चाहिए. इसकी वजह यह नहीं है कि हर कोई उनकी बात से सहमत है, बल्कि यह है कि वह हर मुश्किल दौर में ममता बनर्जी के साथ खड़े रहे हैं. किसी नेता की लंबे समय की निष्ठा उसकी आलोचना को भी महत्व देती है."
"अगर टीएमसी के कई नेता व्यवहार और फ़ैसले लेने की प्रक्रिया को लेकर एक जैसी चिंताएं जता रहे हैं, तो पार्टी उन्हें केवल नज़रअंदाज नहीं कर सकती. बाहरी हमले किसी पार्टी को कमज़ोर कर सकते हैं, लेकिन अंदरूनी असंतोष उसे भीतर से नुक़सान पहुँचाता है."
उन्होंने सुझाव दिया, "अगर समय रहते सुधारात्मक क़दम नहीं उठाए गए, तो टीएमसी ऐसे संकट की ओर बढ़ सकती है, जिसकी वजह ख़ुद पार्टी के भीतर पैदा हुई परिस्थितियां बनेंगी."
वरिष्ठ पत्रकार और लेखक वीर सांघवी ने टीएमसी की मौजूदा स्थिति की तुलना 1977 के कांग्रेस से की है.
उन्होंने एक्स पर कल्याण बनर्जी के बयान की कहानी साझा करते हुए लिखा, "1977 में इंदिरा गांधी और संजय गांधी के दौर की समानताएं लगातार बढ़ती जा रही हैं."
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अभिषेक बनर्जी ने पश्चिम बंगाल पुलिस सीआईडी के उस नोटिस को चुनौती दी है, जिसमें उन्हें एक मामले में पेश होने के लिए कहा गया था.
यह मामला विधानसभा में विपक्ष के नेता पद के लिए पार्टी की पसंद के रूप में सोवनदेब चट्टोपाध्याय के समर्थन में भेजे गए एक पत्र पर तृणमूल विधायकों के कथित तौर पर फ़र्ज़ी हस्ताक्षर किए जाने से जुड़ा है.
तृणमूल विधायक ऋतुब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बोस से शिकायत की थी कि पार्टी के एक प्रस्ताव पर उनके हस्ताक्षर फ़र्ज़ी तरीक़े से किए गए हैं.
शुरुआती जांच के बाद एक एफ़आईआर दर्ज की गई और मामले की जांच सीईडी को सौंप दी गई. सीआईडी ने तृणमूल के 13 विधायकों के बयान दर्ज किए.
इनमें से तीन विधायकों बहारुल इस्लाम, अरूप रॉय और सुभाषिस दास ने दस्तावेज़ पर मौजूद हस्ताक्षरों को अपना मानने से इनकार कर दिया.
मामले पर मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के बयान के बाद तृणमूल नेतृत्व ने ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में पार्टी से निष्कासित कर दिया.
निष्कासन के दो दिन बाद ही तीन जून को ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में विपक्ष का नेता चुना गया.
दरअसल ऋतब्रत बनर्जी ने विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बसु को टीएमसी के क़रीब दो तिहाई बाग़ी विधायकों के समर्थन का पत्र सौंपा था.
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पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे की 35 साल तक चली सरकार को हटाकर सत्ता में आईं ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने 15 सालों तक प्रदेश में शासन किया.
हालिया विधानसभा चुनावों में मिली हार के बाद से ममता बनर्जी और उनकी पार्टी अपने राजनीतिक करियर की सबसे बड़ी चुनौती से जूझ रही है.
पार्टी के नेता एक एक कर साथ छोड़ रहे हैं. पहले ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा के साथ विधानसभा में बग़ावत हुई उसके बाद राष्ट्रीय नेताओं में इस्तीफ़े का सिलसिला शुरू हुआ.
कोलकाता मेयर और ममता के एक और क़रीबी नेता फिरहाद हकीम ने मेयर के बाद से इस्तीफ़ा दे दिया. ममता बनर्जी के घर हुई बैठक में उन्होंने खुद इस्तीफ़े की पेशकश की थी.
लोकसभा में पार्टी की सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने पिछले दिनों दावा किया कि उनके साथ 20 सांसद हैं और उन्होंने लोकसभा स्पीकर से सदन में अलग बैठाने की मांग की. उन्होंने एनडीए को समर्थन देने की भी बात कही.
बुधवार को राज्यसभा में पार्टी की सांसद सुष्मिता देव ने पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया और राज्यसभा की सदस्यता भी छोड़ दी.
सुष्मिता देव से पहले टीएमसी के राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रे ने भी राज्यसभा और पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफ़ा दे दिया था.
लोकसभा में टीएमसी के 28 और राज्यसभा में 13 सांसद थे. लेकिन सुखेंदु शेखर और सुष्मिता देव के इस्तीफ़ा देने के बाद राज्यसभा में टीएमसी के 11 सांसद ही रह गए हैं.
पार्टी में भारी बग़ावत के बाद अब ये भी अटकलें लगाई जा रही हैं कि क्या पार्टी अपना चुनाव चिह्न भी बचा पाएगी जैसे महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की शिव सेना के साथ हुआ था.
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