औद्योगिक कचरे से दुर्लभ तत्व निकालेगा जमशेदपुर एनएमएल – Live Hindustan

भारत को क्रिटिकल मिनरल्स (महत्वपूर्ण खनिजों) के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लिए एनएमएल जमशेदपुर तकनीक विकसित करेगा। एनएमएल ने इसके लिए साइमन इंडिया लिमिटेड के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किया है। इस एमओयू के तहत अब एनएमएल औद्योगिक कचरे से रेयर अर्थ एलिमेंट्स (दुर्लभ पृथ्वी तत्वों) को निकालने की तकनीक विकसित करने के लिए शोध करेगा और प्रयोगशाला स्तर की तकनीक तैयार कर उसे औद्योगिक प्रोडक्शन के स्तर पर बड़े पैमाने पर लागू करेगा। इस संयुक्त प्रोजेक्ट में सीएसआईआर-एनएमएल अनुसंधान और प्रक्रिया नवाचार का जिम्मा संभालेगा, वहीं साइमन इंडिया इंजीनियरिंग कंपनी समाधान और डिजाइनिंग के जरिए इसके विस्तार में मदद करेगी। गौरतलब है कि स्वच्छ ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबिलिटी और उन्नत विनिर्माण जैसे भविष्य के प्रमुख क्षेत्रों के लिए रेयर अर्थ एलिमेंट्स बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं। वर्तमान में वैश्विक स्तर पर इन संसाधनों की आपूर्ति कुछ ही देशों पर केंद्रित है, जिसके चलते भारत के लिए घरेलू स्तर पर इनका विकास करना रणनीतिक रूप से बेहद जरूरी है。
इस साझेदारी के तहत दोनों संस्थान संयुक्त अनुसंधान और विकास, पायलट-प्रोजेक्ट पर मिलकर काम करेंगे, जिसकी निगरानी एक संयुक्त संचालन समिति द्वारा की जाएगी। यह सहयोग बौद्धिक संपदा (आईपी) के विकास, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और उद्योग-अकादमिक साझेदारी को भी मजबूत करेगा। अधिकारियों के अनुसार, यह कदम भारत सरकार द्वारा देश में प्रति वर्ष 6 हजार मीट्रिक टन रेयर अर्थ निर्माण करने की क्षमता विकसित करने के लिए स्वीकृत की गई 7280 करोड़ की योजना के दृष्टिकोण के अनुरूप है। यह साझेदारी देश की तकनीकी आत्मनिर्भरता और स्वदेशी तकनीकों को बाजार में लाने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित होगी। बताते चलें कि औद्योगिक कचरे में बड़ी मात्र में रेयर अर्थ एलिमेंट्स होते हैं। औद्योगिक कचरे से रेयर अर्थ एलिमेंट्स यानी दुर्लभ पृथ्वी तत्वों को निकालना विज्ञान और इंजीनियरिंग की एक बेहद जटिल तकनीक से ही संभव है। औद्योगिक कचरे, जैसे फ्लाई एश, ई-कचरा, या धातुकर्म से निकलने वाले स्लैग से ये रेयर अर्थ एलिमेंट्स निकले जाएंगे।
क्या है रेयर अर्थ एलिमेंट्स
रेयर अर्थ एलिमेंट्स यानी दुर्लभ पृथ्वी तत्व 17 रासायनिक तत्वों का एक समूह है। इसमें नियोडिमियम, लैंथेनम, सीरियम, यूरोपियम शामिल हैं। नियोडिमियम का उपयोग बेहद शक्तिशाली कंप्यूटर हार्ड डिस्क, मोबाइल फोन और इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) की मोटरों के लिए परमानेंट मैग्नेट (चुंबक) बनाने में होता है। वहीं, लैंथेनम का पर उपयोग हाइब्रिड कारों की बैटरी, कैमरे के लेंस और तेल रिफाइनिंग में उत्प्रेरक के रूप में किया जाता है।
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शॉर्ट बायो : भादो माझी पिछले 17 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और वर्तमान में ‘हिन्दुस्तान’ में प्रिंसिपल कोरेस्पोंडेंट के तौर पर जनजातीय बहुल इलाक़ों में पत्रकारिता कर रहे हैं।
परिचय एवं अनुभव
भादो माझी प्रिंट मीडिया जगत का एक प्रतिष्ठित नाम हैं, जिन्हें पत्रकारिता में 17 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वर्तमान में वह ‘हिन्दुस्तान’ (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में प्रिंसिपल कोरेस्पोंडेंट के तौर पर राजनीतिक एवं सामाजिक मुद्दों पर नजर रखते हैं। जनजातीय समाज के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, पारंपरिक एवं शैक्षिक पहलुओं के विश्लेषण पर उनका विशिष्ट अनुभव हैं। 2021 से इस भूमिका में रहते हुए उन्होंने प्रिंट मीडिया एवं डिजिटल कंटेंट के बदलते ट्रेंड्स और पाठकों की रुचि पर मजबूत पकड़ बनाई है।
करियर का सफर :
भादो माझी ने अपने करियर की शुरुआत 2009 में दैनिक जागरण अखबार से की, जहां उन्होंने प्रिंट पत्रकारिता की बुनियादी समझ विकसित की। 2015 में दैनिक जागरण में उन्हें लोकल कंटेंट क्रिएटर टीम का नेतृत्व दिया गया। 2015 से 2021 तक दैनिक जागरण में लोकल रिपोर्टिंग टीम का नेतृत्व करने के बाद वह ‘हिन्दुस्तान’ से जुड़े।
शैक्षणिक पृष्ठभूमि और रिपोर्टिंग
मास कम्युनिकेशन में ग्रेजुएट होने के कारण भादो माझी को पत्रकारिता की तकनीकी और फील्ड प्रैक्टिकलिटी की मजबूत समझ है। इसी वजह से उनका राजनीतिक बीट पर कमांड होने के साथ उन्हें जनजातीय समाज में आ रहे परिवर्तन की शोध स्तरीय विशेषज्ञता प्राप्त है। झारखंड के ट्राइबल इंस्टिट्यूट ऑफ़ मीडिया स्टडीज के शोध छात्रों के लिए उन्होंने फ़ील्ड गाइड के रूप में भी अपनी एक्स्पर्टीज़ को साझा किया। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध उनकी शोध आधारित स्टोरीज को आज भी रेफरेंस के तौर पर जनजातीय मामलों की रिपोर्ट बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
ट्राइबल स्टडीज एवं योगदान
झारखंड के 32 (अब 33) जनजाति की रूढ़ि परंपरा से लेकर स्वशासन व्यवस्था के बारे में उनकी पकड़ न सिर्फ़ इन जनजातियों के बीच मज़बूत है बल्कि अलग अलग माध्यमों से इन समुदायों की स्थिति और संभावनाओं पर भी इनकी रिपोर्ट सरकार के नीति निर्धारकों तक के लिए इन जनजातियों का मंतव्य प्रस्तुत करती रही है। भादो माझी का मानना है कि पत्रकारिता की नींव तथ्यपरकता और विश्वसनीयता है—उनका लक्ष्य पाठकों को सटीक, प्रमाणिक और सशक्त जानकारी देना तो है ही, साथ ही वंचित वर्ग की आवाज बनकर नीति निर्धारकों तक वस्तुस्थिति पहुंचाना और भविष्य की रणनीति को बेहतर बनाने में अपना योगदान देना है।
विशेषज्ञता
झारखंड के 32 जनजाति समाज की समझ
रूढ़ि परंपरा पर गहरी पकड़
सुदूर गांवों के अंतिम पंक्ति में खड़े आदिवासियों से सीधा संवाद
झारखंड की सभी जनजाति की भाषा की जानकारी
देश की तीसरी सबसे बड़ी जनजाति संथाल समाज से आना
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