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बदलते कृषि परिदृश्य में अब किसान पारंपरिक पानी-खपत वाली फसलों से हटकर सूखा-सहनशील (drought tolerant) फसलों की ओर तेजी से रुख कर रहे हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में यही फसलें खेती की रीढ़ बन सकती हैं. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार कुछ फसलें ऐसी हैं जो सीमित सिंचाई और कम नमी वाली परिस्थितियों में भी अच्छी पैदावार देने की क्षमता रखती हैं. इनमें मुख्य रूप से बाजरा, ज्वार, चना, अरहर और मूंग शामिल हैं.
ये फसलें केवल पानी की बचत ही नहीं करतीं, बल्कि मिट्टी की गुणवत्ता को भी बनाए रखने में मदद करती हैं और लंबे समय तक खेत की उपजाऊ क्षमता को सुरक्षित रखती हैं.
बाजरा और ज्वार: कठिन मौसम के मजबूत साथी
बाजरा और ज्वार को मोटे अनाज की श्रेणी में रखा जाता है. ये फसलें कम बारिश और कम सिंचाई में भी आसानी से उग जाती हैं. इनकी जड़ें मिट्टी में गहराई तक जाकर नमी को अवशोषित कर लेती हैं, जिससे ये सूखे जैसे हालात में भी खराब नहीं होतीं. बाजरा को खासतौर पर शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों के लिए बेहद उपयुक्त माना जाता है. वहीं ज्वार न केवल पशु चारे के रूप में उपयोगी है, बल्कि अनाज के रूप में भी इसकी अच्छी मांग रहती है.
चना, अरहर और मूंग: कम पानी में प्रोटीन का बड़ा स्रोत
दालों की श्रेणी में आने वाली ये तीनों फसलें किसानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं. चना, अरहर और मूंग कम सिंचाई में भी अच्छी पैदावार देने में सक्षम हैं. इन फसलों की खास बात यह है कि ये नाइट्रोजन स्थिरीकरण (nitrogen fixation) के जरिए मिट्टी की उर्वरता बढ़ाती हैं, जिससे अगली फसल के लिए खेत और भी बेहतर बन जाता है.
चना रबी सीजन की प्रमुख फसल है, जबकि मूंग और अरहर खरीफ सीजन में उगाई जाती हैं. बाजार में इनकी मांग हमेशा बनी रहती है, जिससे किसानों को स्थिर आय का स्रोत मिलता है.
पानी की बचत और खेती की लागत में कमी
इन फसलों को अपनाने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इनमें सिंचाई की जरूरत बहुत कम होती है. जहां धान या गन्ना जैसी फसलें अधिक पानी मांगती हैं, वहीं ये फसलें सीमित जल संसाधनों में भी अच्छी पैदावार देती हैं. इससे न केवल पानी की बचत होती है, बल्कि बिजली, खाद और सिंचाई की लागत भी काफी कम हो जाती है. छोटे और मध्यम किसानों के लिए यह एक बड़ा आर्थिक लाभ साबित हो सकता है.
जलवायु परिवर्तन के दौर में बढ़ती अहमियत
जलवायु परिवर्तन के कारण बारिश का पैटर्न लगातार बदल रहा है. ऐसे में कृषि विशेषज्ञ लगातार यह सलाह दे रहे हैं कि किसानों को फसल चयन में विविधता लानी चाहिए. सूखा-सहनशील फसलें न केवल खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करती हैं, बल्कि पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में भी मदद करती हैं. यही वजह है कि सरकार और कृषि संस्थान भी इन फसलों को बढ़ावा देने पर जोर दे रहे हैं.
बाजरा, ज्वार, चना, अरहर और मूंग जैसी फसलें आज के समय में किसानों के लिए एक मजबूत विकल्प बनकर उभर रही हैं. कम पानी में अच्छी पैदावार देने वाली ये फसलें न केवल खेती को लाभकारी बना रही हैं, बल्कि आने वाले समय में जल संकट से निपटने में भी अहम भूमिका निभा सकती हैं.
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