रांची, विशेष संवाददाता। झारखंड की जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं के पुनरुद्धार, संरक्षण और संवर्द्धन के उद्देश्य से शनिवार को मोरहाबादी स्थित रांची विश्वविद्यालय के दीक्षांत मंडप में आयोजित जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा कॉन्क्लेव-2026 में राज्य की सभी नौ भाषाओं के संरक्षण और विकास को लेकर व्यापक मंथन हुआ। कार्यक्रम के आयोजन संयोजक व झारखंड सरकार की समन्वय समिति के सदस्य और पूर्व मंत्री बंधु तिर्की ने कहा कि झारखंड की सभी जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाएं ही राज्य की पहचान और अस्तित्व की आधारशिला हैं। अगर इनके विकास और संरक्षण की उपेक्षा की गई तो इसका दुष्परिणाम पूरे समाज, संस्कृति, राज्य और देश को भुगतना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि भाषा को सिर्फ संवाद का माध्यम मानना उचित नहीं है, बल्कि यह संस्कृति, परंपरा, इतिहास और सामाजिक पहचान का प्रमुख आधार है। उन्होंने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण और विकास के लिए प्रभावी पहल करने की अपील करते हुए कहा कि राज्य की जनता इस दिशा में सरकार से ठोस निर्णय की अपेक्षा कर रही है।
दिनभर चले कॉन्क्लेव में झारखंड की नौ जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं- कुड़ुख, खड़िया, संताली, कुरमाली, नागपुरी, हो, मुंडारी, खोरठा और पंचपरगनिया की वर्तमान स्थिति, चुनौतियों और भविष्य की संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा की गई। साथ ही भाषा संरक्षण, शोध, शिक्षण, डिजिटल संसाधनों के विकास और नई शिक्षा नीति के प्रभावी क्रियान्वयन जैसे विषयों पर विशेषज्ञों ने अपने विचार साझा किए। भाषाविदों और विशेषज्ञों ने सरकार को कई महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए। इनमें जनजातीय व क्षेत्रीय भाषाओं के शिक्षकों की पर्याप्त नियुक्ति, उच्च शिक्षा एवं शोध को प्रोत्साहन, डिजिटल शिक्षण सामग्री का विकास, लोक साहित्य और सांस्कृतिक धरोहर का दस्तावेजीकरण व आधुनिक तकनीक के माध्यम से भाषाओं के संरक्षण और संवर्द्धन को बढ़ावा देने पर विशेष जोर दिया गया।
कॉन्क्लेव में रांची विश्वविद्यालय की कुलपति डॉ सरोज शर्मा, डीएसडब्ल्यू डॉ सुदेश साहू, कोलेबिरा के विधायक नमन विक्सल कोंगाड़ी सहित विभिन्न जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं के विद्वानों, साहित्यकारों, भाषाविदों, प्राध्यापकों, शोधार्थियों, शिक्षकों व विभिन्न कॉलेजों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। कार्यक्रम में लगभग 4000 छात्र-छात्राओं की भागीदारी रही।
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संक्षिप्त परिचय: श्रेयसी मिश्रा पिछले 19 वर्षों से अधिक समय से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं और वर्तमान में हिन्दुस्तान, रांची संस्करण में विशेष संवाददाता के रूप में कार्यरत हैं। वह उच्च शिक्षा, महिला, बाल विकास और सामाजिक सरोकारों से जुड़े विषयों पर गहन रिपोर्टिंग के लिए जानी जाती हैं।
परिचय एवं अनुभव
श्रेयसी मिश्रा मीडिया जगत का एक प्रतिष्ठित नाम हैं। वर्ष 2011 से हिन्दुस्तान, रांची संस्करण से जुड़ी श्रेयसी ने उच्च शिक्षा, नवाचार, शोध, अनुसंधान और नीति-आधारित विषयों की रिपोर्टिंग में विशेष दक्षता हासिल की है। बदलते शैक्षणिक रुझानों और पाठकों की रुचि को समझने की उनकी क्षमता उनकी रिपोर्टिंग को विशिष्ट बनाती है।
करियर का सफर (प्रिंट से डिजिटल तक)
श्रेयसी ने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत हिन्दुस्तान, रांची से की। इससे पूर्व उन्होंने आकाशवाणी पटना, आकाशवाणी रांची, दूरदर्शन केंद्र पटना और दूरदर्शन केंद्र रांची में कार्य किया, जहां उन्होंने प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल पत्रकारिता की मजबूत नींव तैयार की। इन्होंने कला, संस्कृति और फिल्म जगत की रिपोर्टिंग में भी उल्लेखनीय कार्य किया है। श्रेयसी ने गायक शान, मीका सिंह, कैलाश खेर, शारदा सिन्हा, पलाश सेन, ममता शर्मा, मालिनी अवस्थी, मनोज तिवारी, संतूर वादक पंडित शिवकुमार शर्मा, सितार वादक उस्ताद अमजद अली खान सहित अनेक ख्यातिप्राप्त कलाकारों और नोबेल शांति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी, ओलंपियन मैरी कॉम जैसी विशिष्ट हस्तियों के साक्षात्कार किए हैं।
शैक्षणिक पृष्ठभूमि
श्रेयसी मिश्रा ने इतिहास में स्नातकोत्तर (एमए) की उपाधि प्राप्त की है और फैशन डिजाइनिंग में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा किया है। सक्रिय पत्रकारिता में आने से पूर्व उनकी कहानियां और आलेख संडे ऑब्ज़र्वर, नवभारत टाइम्स और हिन्दुस्तान जैसे राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। संडे ऑब्जर्वर में उनका बिहार की तत्कालीन मुख्यमंत्री राबड़ी देवी का साक्षात्कार काफी चर्चित रहा था। इन्होंने सीबीएसई शिक्षा प्रणाली, एनईपी-2020, आधुनिक खेती के तरीके, नई फसलों क प्रभेद और ग्रामीण आजीविका से जुड़े विषयों पर भी कई एक्सक्लूसिव और प्रभावशाली स्टोरीज़ की हैं।
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