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बिहार के बुनियादी ढांचे की रीढ़ माने जाने वाले बख्तियारपुर-रजौली राष्ट्रीय राजमार्ग (NH-20) पर एक बार फिर से निर्माण कार्य और गुणवत्ता को लेकर बहस छिड़ गई है। ₹3,500 करोड़ की लागत से बना यह 107 किलोमीटर लंबा फोरलेन मार्ग, जो नालंदा और नवादा जैसे महत्वपूर्ण जिलों को जोड़ता है, अपनी सुविधाओं से अधिक अपनी ‘मरम्मत’ और ‘ट्रैफिक डायवर्जन’ के लिए चर्चा में है। जहां एक ओर यह सड़क आवागमन को सुगम बनाने का दावा करती है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय लोगों और यात्रियों का कहना है कि इसके निर्माण के बाद से यह सड़क लगातार मरम्मत के दौर से गुजर रही है।
सितंबर 2020 में शिलान्यास और 31 दिसंबर 2021 को निर्माण कार्य शुरू होने के बाद, यह परियोजना 2024 में बनकर तैयार हुई। बख्तियारपुर से शुरू होकर बिहारशरीफ, गिरियक, नवादा और अंततः झारखंड सीमा के पास रजौली तक जाने वाला यह मार्ग बिहार के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। सरकार ने यात्रियों की सुविधा के लिए इस मार्ग पर नालन्दा के कई स्थानों-जैसे गिरियक, बिहारशरीफ, मोरा तालाब, भागन बिगहा, धमौली, वेना और हरनौत-पर एलिवेटेड रोड और फ्लाईओवर का निर्माण कराया है। लेकिन, उद्घाटन के कुछ समय बाद ही इन संरचनाओं की मजबूती और कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े होने लगे हैं।
परियोजना के दौरान निर्माण और मरम्मत कार्यों के कारण सड़क को अक्सर ‘वन-वे’ करना पड़ता है। मीडिया रिपोर्टों और स्थानीय दावों के अनुसार, गलत दिशा में वाहनों के परिचालन और अनियोजित डायवर्जन के कारण अब तक आधा दर्जन से अधिक लोगों की सड़क दुर्घटनाओं में असामयिक मौत हो चुकी है। स्थानीय निवासियों का आरोप है कि उचित साइनबोर्ड और सुरक्षा मानकों के अभाव में वाहन चालक अक्सर भ्रमित हो जाते हैं, जिसका खामियाजा उन्हें जान देकर चुकाना पड़ता है।
हाल के दिनों में वेना और पावापुरी फ्लाईओवर की तस्वीरें सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुईं। वेना फ्लाईओवर पर एक वीडियो सामने आया था जिसमें सड़क के जोड़ों (Joints) पर भारी भार स्थानांतरण वाली छड़ें (Dowel Bars) लगाने का काम चल रहा था। बाद में इन क्रैक्स में बिटुमिनस और अलकतरा डालकर लीपापोती करने के आरोपों ने तूल पकड़ा। वहीं, पावापुरी फ्लाईओवर में भी कार्य को लेकर संशय की स्थिति बनी रही। इस मामले पर प्रशासनिक स्तर से भी संज्ञान लिया गया है। नालंदा की जिलाधिकारी उदिता सिंह ने मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच के आदेश दिए हैं, जिससे प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठना लाजिमी है।
इन तमाम आरोपों के बीच, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के प्रोजेक्ट डायरेक्टर अरविंद ने स्पष्टीकरण दिया है। उन्होंने इसे ‘स्ट्रक्चरल क्रैक’ मानने से साफ इनकार किया है। अधिकारी के अनुसार, “फ्लाईओवर में जो दरारें दिख रही हैं, वे ‘PQC’ (Pavement Quality Concrete) की सतह पर होने वाले माइनर क्रैक हैं। यह किसी भी कंक्रीट संरचना में सामान्य प्रक्रिया है। IRC (Indian Roads Congress) के दिशा-निर्देशों के अनुसार, यह रूटीन मेंटेनेंस का हिस्सा है। रही बात वेना की, तो वहां 30-40 मीटर के पैच पर काम चल रहा था जो निर्धारित मेथोडोलॉजी के तहत किया गया है। पावापुरी फ्लाईओवर के संदर्भ में अधिकारी ने बताया कि वहां कोई खराबी नहीं थी, बल्कि निर्माण के दौरान लगी शटरिंग हटाने और छह महीने के अनिवार्य इंस्पेक्शन के लिए डायवर्जन लिया गया था। उन्होंने दावा किया कि कहीं भी कोई स्ट्रक्चरल खतरा नहीं है और ये दरारें केवल सतह पर 2-3 मिलीमीटर की हैं, जिन्हें समय-समय पर भरा जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, कंक्रीट की सड़कों में ‘लोड ट्रांसफर’ के लिए लगाई जाने वाली छड़ें अत्यधिक महत्वपूर्ण होती हैं। ये छड़ें भारी वाहनों के भार को एक स्लैब से दूसरे स्लैब पर समान रूप से वितरित करती हैं। यदि इनका रखरखाव सही हो, तो ये ‘फाल्टिंग’ (सड़क का ऊबड़-खाबड़ होना) को रोकती हैं और सड़क की उम्र 10-15 साल तक बढ़ा सकती हैं। NHAI का तर्क है कि वे इन्हीं तकनीकी मानकों का पालन कर रहे हैं, ताकि भविष्य में सड़क को बड़ा नुकसान न हो।
बख्तियारपुर-रजौली एनएच-20 बिहार की प्रगति का मार्ग है, इसमें कोई संदेह नहीं। हालांकि, ₹3,500 करोड़ खर्च करने के बाद भी यदि जनता को सड़क पर चलने से डर लग रहा है, तो यह गंभीर चिंता का विषय है। ‘रूटीन मेंटेनेंस’ की आड़ में गुणवत्ता से समझौते की खबरों ने जनता का विश्वास कम किया है। प्रशासन और एनएचएआई को न केवल तकनीकी सफाई देनी चाहिए, बल्कि सड़क सुरक्षा मानकों को सुनिश्चित करना चाहिए ताकि जानमाल का नुकसान न हो। विकास के इस पथ पर चलने वाले यात्रियों को ‘मेंटेनेंस’ का डर नहीं, बल्कि यात्रा की सुरक्षा का भरोसा मिलना चाहिए। यह देखना बाकी है कि जिलाधिकारी की जांच में क्या तथ्य सामने आते हैं और क्या भविष्य में इस महत्वपूर्ण मार्ग पर मरम्मत के नाम पर होने वाली बाधाओं से लोगों को राहत मिल पाती है।
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