विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने दोहा में कतर के प्रधानमंत्री से मुलाकात की, जिसमें भारत-कतर रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने पर जोर दिया गया। …और पढ़ें
कतर के पीएम से मिले एस जयशंकर।
जयशंकर ने कतर के प्रधानमंत्री से दोहा में मुलाकात की।
भारत-कतर रणनीतिक साझेदारी, ऊर्जा, व्यापार पर गहन चर्चा हुई।
पश्चिम एशिया के बदलते घटनाक्रमों और क्षेत्रीय संकट पर मंथन।
डिजिटल डेस्क, दोहा। पश्चिम एशिया के तेजी से बदलते राजनीतिक घटनाक्रमों के बीच भारत ने अपने कूटनीतिक कदमों को और तेज कर दिया है। इसी सिलसिले में, विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने रविवार को अपनी खाड़ी देशों की यात्रा के पहले पड़ाव पर दोहा में कतर के प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री शेख मोहम्मद बिन अब्दुलरहमान अल थानी से मुलाकात की।
यह मुलाकात न केवल दोनों देशों के पुराने और प्रगाढ़ रिश्तों को नया आयाम देने वाली रही, बल्कि वैश्विक पटल पर भारत की सजग भूमिका को भी रेखांकित करती है।
साल 2025 में कतर के अमीर की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों के रिश्ते ‘रणनीतिक साझेदारी’ में तब्दील हुए थे। उसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए, इस बैठक में ऊर्जा, व्यापार, निवेश, कनेक्टिविटी और सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों की गहन समीक्षा की गई।
जयशंकर ने दोनों देशों के बीच व्यापारिक और आर्थिक सहयोग को और मजबूत करने के नए अवसरों पर खुलकर चर्चा की। इस दौरान कतर में रह रहे लाखों भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा और कल्याण के लिए कतर सरकार का आभार भी जताया गया, जो दोनों देशों के बीच के मजबूत मानवीय जुड़ाव (पीपुल-टू-पीपुल टाइज) को दर्शाता है।
यह यात्रा एक ऐसे समय में हो रही है जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव को समाप्त करने वाले समझौते के बाद क्षेत्र की राजनीति करवट ले रही है। हाल ही में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के निधन के बाद उपजे हालातों और दोहा में जारी परोक्ष शांति वार्ताओं के बीच, दोनों नेताओं ने पश्चिम एशिया के संकट और उसके वैश्विक प्रभाव पर अपने आकलन साझा किए। कतर, ओमान और पाकिस्तान के साथ मिलकर इस क्षेत्र में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है।
पांच से 10 जुलाई तक चलने वाली इस यात्रा के दौरान जयशंकर बहरीन, कुवैत और ओमान का भी दौरा करेंगे। इसके तुरंत बाद, वह न्यूयार्क में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के कार्यकाल 2028-29 के लिए भारत के आधिकारिक अभियान की शुरुआत करेंगे और ब्रसेल्स में भारत-ईयू व्यापार बैठक में हिस्सा लेंगे। भारत की यह सक्रिय विदेश नीति बताती है कि नई दिल्ली वैश्विक शांति और विकास में अपनी अहम भूमिका निभाने के लिए पूरी तरह तैयार है।