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हमने बहुत किस्से सुने हैं कि फलां प्लेयर ने डोमेस्टिक में बहुत रन बनाए, तब टीम इंडिया में आया. फलां प्लेयर को बहुत वेट करना पड़ा, तब उसे टीम इंडिया की जर्सी मिली. क्यूंकि कहते हैं कि देश की जर्सी कमाने में खिलाड़ियों की पूरी जिंदगी निकल जाती है. यह वो कैप है जिसे सिर पर सजाने के लिए खिलाड़ी रणजी ट्रॉफी की तपस्या में अपनी जवानी गला देते हैं. लेकिन आज भारतीय क्रिकेट जिस चौराहे पर खड़ा है, वहां गरिमा कम और मनमर्जी ज्यादा दिखाई दे रही है.
आयरलैंड (11वें नंबर की टीम) और इंग्लैंड जैसी टीमों के खिलाफ टी-20 फॉर्मेट में जो बेड़ा गर्क हुआ है, उसने साफ कर दिया है कि हमारी दिशा पूरी तरह भटक चुकी है. ऐसा लगने लगा है कि यह 140 करोड़ लोगों की ‘टीम इंडिया’ नहीं, बल्कि किसी एक कोच या मैनेजर की पर्सनल आईपीएल फ्रेंचाइजी बन चुकी है, जहां फैसले मेरिट से नहीं बल्कि पसंद-नापसंद से तय हो रहे हैं. जब इतने बवाल हो रहे हैं, इतनी बहसबाज़ी हो रही है तो हमने सोचा क्यूं ना पांच ऐसे सवाल पूछे जाएं, जो इस वक्त हर क्रिकेट फैन के मन में आ रहे हैं.
1. वर्ल्ड कप जिताने वाले कप्तान और ओपनर को बाहर फेंककर क्या मिला?
भारतीय क्रिकेट इतिहास में ऐसा शायद ही कभी देखा गया हो कि जो खिलाड़ी और कप्तान अभी कुछ समय (सिर्फ दो महीने) पहले आपको वर्ल्ड कप की चमचमाती ट्रॉफी जिताकर लाया हो, उसे अचानक और इतनी बेरुखी से टीम से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाए. क्या सिर्फ ‘युवाओं को मौका’ देने के नाम पर मैच-विनिंग काबिलियत और अनुभव की बलि चढ़ा दी जाएगी?
नतीजा सबके सामने है- आयरलैंड और इंग्लैंड जैसी टीमों के सामने हमारी टी-20 टीम ताश के पत्तों की तरह ढह गई. विजेता टीम को बिखरने की यह कौन सी क्रूर रणनीति है? माना कि सूर्यकुमार यादव की फॉर्म खराब थी, लेकिन आप कप्तानी से हटा देते, टीम से क्यों निकाला. संजू सैमसन ना होते तो वर्ल्ड कप जीत ही नहीं पाते, दो इनिंग फेल में आपने उन्हें चलता कर दिया. और जिस प्लेयर को आप दो साल से कॉन्ट्रेक्ट में नहीं रख रहे थे, उसे सीधा कप्तान बना दिया.
2. यह ‘टीम इंडिया’ है या कोई आईपीएल फ्रेंचाइजी, जहां सिर्फ कोच का हुक्म चलेगा?
सबसे बड़ा और बुनियादी सवाल सोच का है. कोच गंभीर को यह समझना होगा कि इंटरनेशनल क्रिकेट और आईपीएल फ्रेंचाइजी चलाने में जमीन-आसमान का फर्क होता है. देश की टीम में ‘कंट्रोल फ्रीक’ रवैया नहीं चल सकता, जहां कोच या मैनेजर की पसंद ही टीम का भविष्य तय करने लगे. जब फैसले डोमेस्टिक सर्किट के प्रदर्शन के बजाय किसी एक शख्स के ईगो और जिद से होने लगें, तो टीम का ड्रेसिंग रूम बिखर जाता है. यह फ्रेंचाइजी मॉडल देश की टीम पर थोपना आखिर कब बंद होगा? इशारों-इशारों में कई खिलाड़ी (रोहित-कोहली जैसे) ये मान चुके हैं कि ड्रेसिंग रुम की हालत बदल चुकी है.
3. हर्षित राणा, वाशिंगटन सुंदर और तिलक वर्मा पर यह ‘विशेष’ मेहरबानी क्यों?
टीम सिलेक्शन के कुछ फैसले तो किसी की समझ से परे हैं. हर्षित राणा को अचानक तीनों फॉर्मेट (ऑल फॉर्मेट प्लेयर) का खिलाड़ी बनाने की इतनी क्या जल्दी है? उन्होंने ऐसा कौन सा असाधारण रिकॉर्ड बना दिया है? वाशिंगटन सुंदर को लगातार टी-20 में खिलाने का क्या तुक है, इस फॉर्मेट में उनकी भूमिका आज तक साफ नहीं हो सकी है. वहीं तिलक वर्मा लगातार टीम में रहकर क्या कर रहे हैं और किस परफॉर्मेंस के दम पर उन्हें इतने मौके मिल रहे हैं? कब तक एशिया कप फाइनल के नाम पर उन्हें खिलाया जाएगा और तो और, वो टीम के वाइस कैप्टन भी हैं.
4. क्या हर जगह, हर खिलाड़ी पर एक ही नियम थोपा जाएगा?
भारतीय क्रिकेट में आजकल एक नया शॉर्टकट अपना लिया गया है- सबको हर जगह फिट करने की कोशिश. क्या हर खिलाड़ी की काबिलियत और उसका खेल हर फॉर्मेट के लिए एक जैसा हो सकता है? बिना किसी ठोस प्लानिंग और विजन के किसी को भी किसी भी फॉर्मेट में धकेल दिया जाता है. खिलाड़ियों की भूमिकाओं में यह भ्रम क्यों पैदा किया जा रहा है? क्या कोच और सेलेक्टर्स के पास हर फॉर्मेट के लिए कोई अलग और स्पष्ट रोडमैप नहीं है?
5. अगर वर्कलोड मैनेज नहीं हो रहा, तो कोई एक फॉर्मेट छोड़ क्यों नहीं देते?
जब भी किसी सीरीज में खराब प्रदर्शन होता है या आराम की बात आती है, तो ‘वर्कलोड मैनेजमेंट’ का पुराना रोना रोया जाता है. वैसे वर्कलोड की बात सिर्फ खिलाड़ियों के साथ ही हो रही है. एक सवाल ये भी पूछा जाना चाहिए कि कोच साहब का वर्कलोड और विज़न मैनेज हो रहा है? क्या बीसीसीआई को अलग फॉर्मेट के लिए अलग कोच वाले आइडिया को सोचना चाहिए. क्यूं ना ये ट्राई किया जाए कि गौतम गंभीर को सिर्फ वाइट या फिर रेड बॉल फॉर्मेट का कोच बनाया जाए. आप बेहतर हो सकते हैं, लेकिन किसी एक फॉर्मेट में गलती भी कर सकते हैं.
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