डॉ. अभय पाण्डेय | संतों और संन्यासियों से समाज हमेशा यह अपेक्षा करता है कि वे राजनीति और वैचारिक सीमाओं से ऊपर उठकर धर्म, सत्य और लोक कल्याण के पक्ष में मार्गदर्शन करेंगे. वे किसी एक राजनीतिक दल या विचारधारा के चश्मे से सामाजिक विषयों को नहीं देखेंगे, बल्कि उनका दृष्टिकोण तटस्थ, सर्वसमावेशी और न्यायसंगत होगा, लेकिन ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की हालिया गतिविधियां और बयान इस सर्वमान्य कसौटी पर विरोधाभासी प्रतीत होते हैं. उत्तर प्रदेश में गौ-रक्षा और गौ-प्रतिष्ठा के नाम पर 73 दिनों से ‘गविष्ठि यात्रा’ निकाल रहे स्वामी जी राज्य की भाजपा सरकार की नीतियों पर लगातार मुखर हैं. इसके विपरीत, जब विषय तमिलनाडु की कांग्रेस-समर्थित सरकार द्वारा गोवंश संरक्षण के कानूनी फैसलों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का आता है, तो वे वहां असहज करने वाली चुप्पी साध लेते हैं. तमिलनाडु के मामले में उनके इस दृष्टिकोण और इसे महज एक ‘तकनीकी विषय’ बताने की नीति ने उनके रुख पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
मद्रास उच्च न्यायालय द्वारा राज्य में गौ-हत्या पर लगाए गए प्रतिबंधात्मक निर्देशों के विरुद्ध तमिलनाडु की सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया था. सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मामले में अंतरिम स्थगन (स्टे) दिए जाने पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने इस अत्यंत संवेदनशील विषय को एक ‘टेक्निकल मामला’ करार दिया है. उन्होंने तर्क दिया कि याचिका में मूल रूप से जो मांग की गई थी, अदालत ने आदेश में उससे कहीं अधिक निर्देश दे दिए, इसलिए सरकार ने केवल उसमें विधिक सुधार (करेक्शन) की प्रार्थना की है. गोवंश संरक्षण के प्रति समर्पित एक शीर्ष संत द्वारा तमिलनाडु सरकार के इस कदम की आलोचना न करना और इसे केवल एक कानूनी प्रक्रिया बताना यह संदेश देता है कि गौ भक्ति के सिद्धांतों को विभिन्न राज्यों के राजनीतिक नेतृत्व के अनुसार अलग-अलग चश्मे से देखा जा रहा है.
एक तरफ जहां स्वामी जी तमिलनाडु की नीतियों पर अत्यंत नरम और व्याख्यात्मक रुख अपनाते हैं, वहीं दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश में वे लगातार योगी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं. यह तथ्य सर्वविदित है कि उत्तर प्रदेश में देश का सबसे प्रभावी ‘गौवध निवारण अधिनियम 1955 (संशोधित 2020)’ लागू है, जिसके अंतर्गत गोवंश को क्षति पहुंचाने वालों के लिए 10 वर्ष तक के कठोर कारावास और भारी अर्थदंड का प्रावधान है. योगी सरकार ने प्रदेश में अवैध बूचड़खानों पर पूरी तरह अंकुश लगाया है और निराश्रित गोवंश के संरक्षण के लिए हजारों सरकारी गौशालाओं का निर्माण कराया है. इन सुस्पष्ट प्रयासों के बावजूद, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद राज्य में गौ-असुरक्षा का वातावरण दिखाकर सरकार को घेरने का प्रयास कर रहे हैं, जो उनकी प्राथमिकताओं और निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगाता है.
केरल में लंबे समय से गोवध और सार्वजनिक रूप से गोमांस के प्रदर्शन को लेकर सामाजिक और धार्मिक विवाद होते रहे हैं, किंतु स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने वहां सुरक्षात्मक नीतियों के पक्ष में कोई बड़ी यात्रा या आंदोलन करने की आवश्यकता नहीं समझी. तमिलनाडु में भी जब तुष्टिकरण और सनातन परंपराओं के विपरीत शासकीय निर्णय सामने आते हैं, तब वे मौन धारण कर लेते हैं. इन राज्यों में उनकी यह नीरवता और केवल उत्तर प्रदेश पर पूरा ध्यान केंद्रित करना यह दर्शाता है कि यह अभियान पूरी तरह धार्मिक न होकर राजनीतिक हितों से प्रभावित हो सकता है. उत्तर प्रदेश में आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव नजदीक हैं, जिससे यह आशंका बलवती होती है कि इन यात्राओं का उद्देश्य जनमानस को भ्रमित करना और राज्य के नेतृत्व को असहज करना है.
यह पहली बार नहीं है जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने धार्मिक विमर्श की आड़ में राजनीतिक परिदृश्य को प्रभावित करने का प्रयास किया हो. इससे पूर्व वे बिहार में भी इसी प्रकार की गौ-रक्षा यात्रा आयोजित कर चुके हैं, जहां उन्होंने परोक्ष रूप से राजनीतिक विमर्श को बदलने का यत्न किया था. हालांकि, बिहार की जागरूक जनता ने धर्म और राजनीति के इस घालमेल को स्वीकार नहीं किया और उनके द्वारा समर्थित उम्मीदवारों को चुनावों में भारी पराजय का सामना करना पड़ा. बिहार के इन राजनीतिक परिणामों के बाद भी स्वामी जी ने अपने दृष्टिकोण में कोई परिवर्तन नहीं किया और अब वही रणनीतिक प्रयोग वे उत्तर प्रदेश की धरती पर दोहरा रहे हैं, जहां योगी सरकार की प्रभावी गोवंश नीतियों के सामने उनका यह अभियान तार्किक रूप से कमजोर दिखाई दे रहा है.
यदि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उनके पूज्य गुरु दिवंगत स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के ऐतिहासिक रुख का विश्लेषण किया जाए, तो उनका झुकाव पारंपरिक रूप से कांग्रेस और उसकी सहयोगी विचारधाराओं की ओर अधिक देखा गया है. वर्तमान केंद्र व राज्य सरकार के मजबूत सांस्कृतिक और धार्मिक नेतृत्व से उनका वैचारिक मतभेद छिपा नहीं है. यही कारण है कि वे गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रशासनिक कार्यशैली से निरंतर असंतुष्ट दिखाई देते हैं. उनके वक्तव्यों में मुख्यमंत्री के प्रति एक विशेष प्रकार का तीखापन और पूर्वाग्रह स्पष्ट होता है. भारी जनसमर्थन से चुनी गई एक सरकार के मुखिया पर इस प्रकार के एकतरफा आरोप लगाना एक उच्च सन्यासी की गरिमा के अनुकूल प्रतीत नहीं होता.
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य पद पर आसीन होना स्वयं में कानूनी और धार्मिक विवादों के घेरे में रहा है. देश की सर्वोच्च अदालत सहित विभिन्न विधिक मंचों पर उनके इस पद की वैधता को लेकर याचिकाएं और मुकदमे विचाराधीन हैं. सनातन धर्म की कई प्रतिष्ठित संत परंपराएं, अखाड़े और अखाड़ा परिषद के वरिष्ठ पदाधिकारी उनके इस दावे को शास्त्रसम्मत और वैध नहीं मानते हैं. अपनी इस विवादास्पद धार्मिक स्थिति के उपरांत भी, वे सार्वजनिक और राजनीतिक मंचों पर ‘शंकराचार्य’ जैसे परम आदरणीय पद की प्रतिष्ठा और प्रभाव का उपयोग उत्तर प्रदेश सरकार को घेरने और अपने विशिष्ट एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए कर रहे हैं.
पूरे प्रदेश में गविष्ठि यात्रा निकालने के बावजूद अपेक्षित परिणाम न निकलता देख और जनता की बजाए केवल कांग्रेस, सपा और आप नेताओं की भागीदारी से पूरी यात्रा सवालों के घेरे में बनी हुई है. वही अब आगामी 24 जुलाई को लखनऊ में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद द्वारा अपनी ‘अक्षौहिणी सेना’ के माध्यम से एक बड़े एकत्रीकरण और प्रदर्शन की तैयारी की जा रही है. यह आयोजन प्रत्यक्ष रूप से उत्तर प्रदेश सरकार पर दबाव बनाने की एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है. एक तरफ जहां वे तमिलनाडु में गोवंश संरक्षण विरोधी न्यायिक अपीलों पर उंगली उठाने से बचते हैं, वहीं दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश में आकर वे स्वयं को गौ-संस्कृति के एकमात्र रक्षक के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं. यह दोहरी नीति यह सोचने पर विवश करती है कि गोवंश के प्रति आस्था का उपयोग कहीं न कहीं राजनीतिक सौदेबाजी और अपने प्रभाव को बढ़ाने के साधन के रूप में किया जा रहा है.
वास्तविक और निष्पक्ष गौ-रक्षा वह होती है जो बिना किसी राजनीतिक झुकाव या पक्षपात के संपूर्ण राष्ट्र में गोवंश के संरक्षण के लिए समान नीतियों और कड़े कानूनों का समर्थन करे. उत्तर प्रदेश में योगी सरकार ने सुदृढ़ विधिक संरचना तैयार कर और धरातल पर कड़ाई से नियमों का पालन सुनिश्चित कराकर गौ-सेवा का एक अनुकरणीय मॉडल प्रस्तुत किया है. इसके विपरीत, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का यह चयनात्मक विमर्श, जहां गैर-भाजपा शासित राज्यों में वे कानूनी जटिलताओं की आड़ लेकर शांत रहते हैं और यूपी में निरंतर आंदोलन करते हैं, यह उनके 2027 के वैचारिक एजेंडे को संकेत देता है. हिंदू समाज को धर्म और संन्यास के सम्मान की आड़ में चल रहे इन राजनीतिक समीकरणों को समझने की आवश्यकता है, ताकि सनातन और गोवंश की रक्षा का मूल उद्देश्य संकीर्ण हितों की भेंट न चढ़े.
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के रामानुजन कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. समसामयिक विषयों पर लेखन करते रहते हैं.)
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