जेपीयू में वेतन रोकने के आदेश पर बढ़ा विवाद – Hindustan

हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद भी कार्रवाई जारी प्रतिनियुक्ति विवाद में नए निर्देश से मचा बवाल शिक्षकों ने उठाए कई सवाल, विश्वविद्यालय की कार्यशैली पर भी लगे भेदभाव के आरोप युवा लीड प्रस्तावित छपरा, हिन्दुस्तान प्रतिनिधि। जय प्रकाश विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा नवस्थापित डिग्री महाविद्यालयों में प्रतिनियुक्ति के बावजूद योगदान नहीं करने वाले प्रभारी प्राचार्यों और अर्थपालों के विरुद्ध की जा रही कार्रवाई अब और विवादों में घिर गई है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने 16 जुलाई को एक पत्र जारी कर संबंधित स्नातकोत्तर विभागों एवं महाविद्यालयों को निर्देश दिया है कि संबंधित शिक्षकों को उपस्थिति पंजी में हस्ताक्षर नहीं करने दिया जाए तथा 27 जून 2026 के बाद का वेतन विपत्र विश्वविद्यालय को नहीं भेजा जाए। इस आदेश के बाद शिक्षकों में असंतोष बढ़ गया है।
हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश के बावजूद कार्रवाई पर सवाल प्रतिनियुक्ति को लेकर सारण, सीवान और गोपालगंज जिले के बरौली, सिधवलिया, पंचदेवरी, विजयीपुर, इसुआपुर, मशरक, पानापुर, तरैया और आंदर प्रखंडों के नवस्थापित डिग्री महाविद्यालयों में प्रतिनियुक्त प्रभारी प्राचार्य एवं अर्थपालों ने पटना हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। रबिन्द्र सिंह एंड अदर्स द्वारा दायर सीडब्ल्यूजेसी-9278/2026 में 2 जुलाई 2026 को पारित अंतरिम आदेश में पटना हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालय से याचिका में लगाए गए आरोपों पर पैराग्राफवार जवाब मांगा है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि प्रतिनियुक्ति विश्वविद्यालय के वैधानिक प्रावधानों और परिनियम-3.2.6 के विपरीत बिना सहमति तथा पिक एंड चूज नीति के तहत की गई। न्यायालय ने कुलपति को याचिकाकर्ताओं के प्रतिवेदन पर विचार कर उचित आदेश पारित करने तथा 23 जुलाई की सुनवाई में उसे प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। इसी प्रकार रवि प्रकाश ‘बबलू’ की सीडब्ल्यूजेसी-9715/2026 में 9 जुलाई 2026 को भी समान अंतरिम आदेश पारित हुआ है। इस मामले की अगली सुनवाई 30 जुलाई को निर्धारित है। वहीं अच्युतानंद सिंह की सीडब्ल्यूजेसी-9528/2026 में 13 जुलाई 2026 को पारित आदेश में पटना हाईकोर्ट ने कुलाधिपति (चांसलर) को चार सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता के प्रतिवेदन पर विधिसम्मत निर्णय लेने का निर्देश दिया है। साथ ही कुलपति को यह भी निर्देश दिया गया कि कुलाधिपति के निर्णय तक उनका आदेश प्रभावी नहीं रहेगा। इन तीनों न्यायिक आदेशों के बावजूद विश्वविद्यालय द्वारा नए निर्देश जारी किए जाने पर प्रभावित शिक्षकों ने सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि जब मामला न्यायालय में विचाराधीन है, तब दंडात्मक कार्रवाई न्यायोचित नहीं मानी जा सकती। समान परिस्थिति में अलग-अलग कार्रवाई का आरोप विश्वविद्यालय प्रशासन पर समान परिस्थितियों में अलग-अलग रवैया अपनाने का भी आरोप लगाया जा रहा है। जानकारी के अनुसार विश्वविद्यालय के आदेश के बावजूद अर्थपाल के रूप में विजय कुमार (जगदम कॉलेज), अमृत प्रजापति (नंदलाल सिंह कॉलेज), विशाल कुमार सिंह (राजेन्द्र कॉलेज) तथा कमाल अहमद (गंगा सिंह कॉलेज) ने योगदान नहीं दिया। बताया गया कि कमाल अहमद ने अपनी प्रतिनियुक्ति को चुनौती देते हुए सीडब्ल्यूजेसी-10352/2026 दायर कर रखी है और मामला न्यायालय में विचाराधीन है। विजय कुमार भी हाईकोर्ट का रुख कर चुके हैं। आरोप है कि वेतन स्थगन एवं उपस्थिति रोकने का आदेश केवल कमाल अहमद के विरुद्ध लागू किया गया, जबकि समान स्थिति वाले अन्य तीन अर्थपालों पर ऐसी कार्रवाई नहीं हुई। इसे लेकर विश्वविद्यालय प्रशासन पर पिक एंड चूज नीति अपनाने का आरोप लगाया जा रहा है। वेतन जीवन का आधार, रोकना नियम विरुद्ध प्रभावित शिक्षकों का कहना है कि किसी भी सरकारी सेवक का वेतन उसके और उसके परिवार के जीवन-यापन का प्रमुख आधार होता है। उनका दावा है कि विश्वविद्यालय के किसी नियम, विनियम, परिनियम अथवा अधिनियम में वेतन रोकने का प्रावधान नहीं है। यहां तक कि निलंबन की स्थिति में भी जीवन निर्वाह भत्ता दिए जाने का प्रावधान है। फिलहाल प्रतिनियुक्ति विवाद और वेतन रोकने के आदेश को लेकर विश्वविद्यालय में असमंजस की स्थिति बनी हुई है। अब सबकी निगाहें पटना हाईकोर्ट और कुलाधिपति के समक्ष लंबित मामलों पर टिकी हैं।
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