Independence Day: यूपी के इन गांवों के हर घर में सैनिक! सेना में भर्ती होना युवाओं की पहली पसंद – Hindustan

बुंदेलखंड की वीरता और शौर्य की परंपरा आज भी बांदा जिले के यमुना किनारे बसे बेंदा और जौहरपुर गांवों में जीवंत है। फतेहपुर सीमा से सटे इन दोनों गांवों की आबादी करीब 15-15 हजार है। बेंदा में 42 और जौहरपुर में 28 मजरे हैं। खास बात यह है कि इन गांवों से बड़ी संख्या में युवा सेना में भर्ती होकर देश की सेवा कर रहे हैं। यहां सेना में जाना आज भी युवाओं की पहली पसंद बना हुआ है।

गांवों के लोगों के मुताबिक, लगभग हर घर का कोई न कोई सदस्य सेना में भर्ती की तैयारी करता है। सुबह होते ही गांव के मैदानों और सड़कों पर युवाओं की दौड़ शुरू हो जाती है। इसके बाद लंबी कूद, ऊंची कूद और अन्य शारीरिक अभ्यास किए जाते हैं। युवाओं में सेना में भर्ती होने को लेकर खासा उत्साह है। हाल ही में बेंदा, जौहरपुर और अमलीकौर के करीब आधा दर्जन युवा सेना में भर्ती हुए हैं। इससे उनके परिवारों में खुशी और गर्व का माहौल है।

इन गांवों के युवाओं को देश सेवा के लिए प्रेरित करने में यहां के बलिदानी सैनिकों की महत्वपूर्ण भूमिका है। भारत-पाकिस्तान के पहले युद्ध (1947-48) में छह फरवरी 1948 को सैनिक केदार सिंह के बलिदान की कहानी आज भी लोगों को याद है। वहीं 1971 के युद्ध में जौहरपुर के बलिदानी सैनिक सूरज पाल सिंह ने देश के लिए प्राण न्योछावर किए। गांव के युवा इन वीरों को अपना आदर्श मानते हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि देश की सेवा करना सबसे बड़ा धर्म है। उनका बेटा हाल ही में सेना में भर्ती हुआ है और परिवार के अन्य सदस्य भी सेना में सेवा कर चुके हैं। उनका कहना है कि गांव में वीरों की कमी नहीं है और हर युवा सुबह से ही देश सेवा के लिए तैयारी में जुट जाता है। गांव के युवाओं में सेना में जाने को लेकर जबरदस्त उत्साह है। युवा कड़ी मेहनत करते हैं और यही वजह है कि गांव से बड़ी संख्या में युवा सेना में भर्ती हो रहे हैं।

गांववालों के मुताबिक बचपन से ही घर में गांव के बलिदानियों की चर्चा होती थी। परिवार के बुजुर्ग कहते थे कि देश की सेवा कर लेना ही जीवन की सबसे बड़ी सफलता है। इसी माहौल ने युवाओं के मन में सेना में जाने की इच्छा पैदा की। बुंदेलखंड का बांदा ऐतिहासिक रूप से भी वीरता और संघर्ष की धरती रहा है। 1857 की क्रांति में इस क्षेत्र ने अंग्रेजों के खिलाफ महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। रानी लक्ष्मीबाई के संघर्ष में बांदा के बहादुर शाह के सहयोग की चर्चा भी इतिहास में मिलती है। महाराजा छत्रसाल तथा आल्हा-ऊदल जैसे वीरों की गाथाएं भी बुंदेलखंड की संस्कृति का हिस्सा हैं। इसी वीर परंपरा को बेंदा और जौहरपुर की नई पीढ़ी देश सेवा के संकल्प के साथ आगे बढ़ा रही है।

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