वाराणसी में दैनिक जागरण की 45वीं वर्षगांठ पर आयोजित संगोष्ठी में वक्ताओं ने अखबार की यात्रा और हिंदी पत्रकारिता में उसके योगदान की सराहना की।
पूर्णचंद्र गुप्त व नरेंद्र मोहन न होते तो बड़ी क्षति होती हिंदी की : प्रो. अजित चतुर्वेदी।
दैनिक जागरण की वाराणसी में 45वीं वर्षगांठ मनाई गई।
पूर्णचंद्र गुप्त और नरेंद्र मोहन का हिंदी को बड़ा योगदान।
जागरण को विश्वसनीयता और राष्ट्र निर्माण का पर्याय बताया।
जागरण संवाददाता, वाराणसी। दैनिक जागरण ने अपनी प्रगति की यात्रा में पाठकों का विश्वास जीत, विश्व स्तर पर कई कीर्तिमान रचे हैं। देश में जब भारत छोड़ो आंदोलन चल रहा था, उस दौर में झांसी में दैनिक जागरण आरंभ हुआ। तब से चली आ रही जागरण की यह अमर यात्रा।
इस यात्रा में अब तक अनेक सोपान तय करते हुए, विश्व स्तर पर अनेक कीर्तिमान रचते हुए जागरण नंबर वन बना हुआ है। इस समाचार पत्र के आने के बाद हिंदी समाचार पत्र जगत में एक नई चेतना आई और फिर लाेगों ने इससे हिंदी सीखना आरंभ किया। सोचिए, यदि पूर्णचंद्र गुप्त और उनके योग्य सुपुत्र नरेंद्र मोहन न होते तो हिंदी की कितनी बड़ी क्षति हाेती, यह अखबार आज प्रिंट मीडिया समाचारों की दुनिया में विश्वसनीयता का पर्याय बन गया है।
तभी तो प्रत्येक सुबह सभी लोग इसका उत्सुकता से इंतजार करते हैं और इंतजार ताे उसी का होता है, जिससे हम प्रेम करते हैं। ये बातें काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने कही।
वह शुक्रवार को सनबीम वरुणा के सभागार में आयोजित दैनिक जागरण के वाराणसी में स्थापना की 45वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित ‘राष्ट्र समाज और युवा शक्ति’ विषयक संगोष्ठी में बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे थे।
आयोजन का शुभारंभ मुख्य अतिथि प्रो. चतुर्वेदी, कार्यक्रम के अध्यक्ष संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा, विशिष्ट अतिथि पद्मश्री प्रो. ऋत्विक सान्याल, पद्मश्री रजनीकांत, नागरी प्रचारिणी सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल, दैनिक जागरण वाराणसी के संपादक संजय मिश्र, महाप्रबंधक डॉ. अंकुर चड्ढा ने स्व. नरेंद्र मोहन व माता सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण व दीप प्रज्वलन से किया।
संपादक संजय मिश्र ने कार्यक्रम की प्रस्तावन रखते हुए कहा कि सूचनाएं हमारे जीवन में हस्तक्षेप करती हैंं, हमारा मार्गदर्शन करती हैं। हमारा सौभाग्य है कि हम 34 वर्ष से इस संस्था से जुड़े हैं। इस संस्था ने हमें राष्ट्र प्रथम का मंत्र दिया, बताया राजनीतिक दल तो आते-जाते रहेंगे, सत्ताएं बदलती रहेंगी लेकिन राष्ट्र सदैव रहेगा।
आयोजन में विशिष्ट अतिथि एडीजी जोन नवीन अरोड़ा, उद्यमी जगदीश झुनझुनवाला, महामना मालवीय मिशन बीएचयू के संगठन मंत्री प्रमिल पांडेय, व्यापारी नेता अजीत सिंह बग्गा, राजीव गुप्ता, नीरज पारिख, राजेश भाटिया, बैडमिंटन खिलाड़ी रुद्राणी जायसवाल, शिल्पी बलराम दास आदि सहित काशी के बहुत से गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।
समारोह की अध्यक्षता करते हुए संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने कहा कि दैनिक जागरण की 45 वर्षों की यात्रा साधारण नहीं, असाधारण है। यात्रा उसी की लंबी होती है जो प्रामाणिकता के साथ, सत्य के साथ सदैव खड़ा रहता है, उसके साथ जीता है और जीना सिखाता है।
जागरण के समाज के प्रति उत्तरदायित्व के भाव का प्रभाव है कि लोगों के स्वभाव में जागरण का बसाव है। दैनिक जागरण साधारण पत्र नहीं है, सूचनाओं के बहुतायत के संसार में समाचारों की सत्यता, विश्वसनीयता, प्रामाणिकता को धारण करता है। अपनी चेतना के साथ-साथ समाज की चेतना, राष्ट्र की चेतना का भाव लेकर चलता है। जनसरोकारों को ध्यान में रखकर समाचार पत्र ने हिंदी पत्रकारिता को एक नया आयाम दिया है।
जागरण युवाओं में राष्ट्र भाव का जागरण करते हुए राष्ट्र निर्माण में अपनी सहभागिता निभा रहा है। आज जागरण काशी की आत्मा, बाबा विश्वनाथ के कल्याण भाव, बुद्ध के औदात्य, शंकर के अद्वैत, संत रविदास की निश्छल भक्ति, कबीर की खरी-खरी, तुलसी के लोकहित को धारण कर समाचारों के संप्रेषण में लगा है। गंगा की कल-कल तरंग के साथ काशी में 45 वर्ष का जागरण नई उमंग के साथ यहां के विकास में सहभागी बने, यही हम सबकी कामना है।
विशिष्ट अतिथि एडीजी नवीन अरोडा ने कहा कि दैनिक जागरण सिर्फ अखबार नहीं, जनमानस की आवाज है। लोकतंत्र के चतुर्थ स्तंभ की वास्तविक भूमिका का निर्वहन करता यह समाचार पत्र अपनी विश्वसनीयता के बल पर विश्व में सर्वाधिक पढ़े जाने वाले अखबारों में से एक है। यह समाज के प्रत्येक वर्ग के विकास, उत्थान व राष्ट्र निर्माण में अपनी अग्रणी भूमिका निभा रहा है।
कोरोना से लेकर, पर्यावरणीय संकट तक, सुरक्षा, शिक्षा के अभियान तक जागरण हर जगह खड़ा मिलता है। जागरण केवल समस्याएं ही नहीं उठाता, समाधान भी सुझाता है। वर्ष 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लक्ष्य की तैयारी में जागरण लगा हुआ है।
हम जैसे युवा यूपीएससी की तैयारी के लिए जागरण के संपादकीय लेखों से अपना कांसेप्ट क्लियर करते रहे हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जागरण का सहयोग अमूल्य है। धर्मनगरी काशी से जागरण का संबंध आत्मा और शरीर का है।
आज का दिन दैनिक जागरण के पूर्व प्रधान संपादक नरेंद्र मोहन को याद करने का है। जीवंत स्मृतियां गूंजती हैं और मृत स्मृतियां आंसू बहाती हैं। नरेंद्र मोहन की विरासत के उत्तराधिकारियों ने दैनिक जागरण को जीवंत धात्विक टंकार में बदल दिया है। जागरण ने साहित्य, संस्कृति के साथ विभिन्न प्रकल्पों में अपना बहुविस्तार किया है।
इस देश की रचनात्मकता यौवन की उपज है। वह यौवन चाहे खुदीराम बोस का रहा हो, बनारस के सचींद्रनाथ सान्याल या चंद्रशेखर आजाद और भी बहुत से लोगों का रहा हो, देश निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया है। यदि रचनात्मकता नहीं है तो आपकी युवता भी देश और समाज के किसी काम का नहीं है।
मैंने बचपन से ही दैनिक जागरण के साथ संगत की है। भाषा सीखी है, शीर्षक सीखा है। पाठकों को समग्र समाचार प्रामाणिकता के साथ ससमय उपलब्ध कराने के लिए दैनिक जागरण के पत्रकारों की जिजीविषा देखी है। यही कारण है कि जागरण आज सबसे अग्रणी है।
देश के जीआइ मैन कहे जाने वाले पद्मश्री रजनीकांत ने कहा कि जागरण की यात्रा हमारे लिए सिर्फ यात्रा नहीं है, लाखों लोग जुड़े, पढ़े-लिखे, समझदार बने। हमने भारत के अलग-अलग भूभाग से जो जीआइ टैग कराए हैं या काशी और आसपास केे जिन 32 उत्पादों को जीआइ टैग् मिला है, उसमें जागरण का भी महत्वूपर्ण योगदान है।
जागरण ने समय-समय पर काशी के खानपान, उद्यम, कारीगरी, शिल्प, कौशल आदि पर जो विशेष लेख निकाले, उनसे हमें उन उत्पादों के बारे में तथ्य और प्रेरणा मिली।
तिरंगा बर्फी के इतिहास को हमने जागरण से ही जाना और उसे जीआई टैग् दिलाने के आवेदन में जागरण का लेख भी अटैच किया। काशी से शुरू जीआइ टैग् की यह यात्रा अब देश के सभी 25 राज्यों में पहुंच चुकी है। कहने में संकाेच नहीं, मुझे जीआइ मैन बनाने में जागरण का भी योगदान है।
मैंने जब 1981 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय में संगीत का अध्यापन आरंभ किया, उसी समय बनारस में दैनिक जागरण आरंभ हुआ। अब जागरण मेरे विचारों का दर्पण है। जागरण ने सत्य के अन्वेषण, समाज के प्रति उत्तरदायित्व और राष्ट्र निर्माण को अपनी पत्रकारिता का मूल आधार बनाया, वास्तव में यही पत्रकारिता के सिद्धांत भी हैं और जागरण इनका प्रत्येक परिस्थिति में सदैव अनुगमन करता है।
यह स्वामी विवेकानंद के पथ- उठो, जागो और प्राप्त करो… का अनुगामी है। हम संगीतकार जीवंत की सर्जना करते हैं जो राज्य नहीं, देश-काल की सीमाओं के पार तक जाता है। इस साधना में जागरण जीवन में दिनचर्या निर्धारण का अंग बन गया है।
निष्पक्ष, निर्भीक और सटीक पत्रकारिता का पर्याय है दैनिक जागरण। बनारस के रस को अपनाते हुए जागरण यहां की संस्कृति-संगीत, हवाओं में घुला-मिला है। इसका आस्वादन पाठकों को अपनी पत्रकारिता के साथ कराता रहता है।