शंभुनाथ सिंह थे आधुनिक भावबोध के रचनाकार – Hindustan

वाराणसी, मुख्य संवाददाता। डॉ.शंभुनाथ सिंह का व्यक्तित्व एवं कृतित्व बहुआयामी है। वह भारतीय ज्ञान परंपरा के साहित्य साधक रहे। परंपरा और आधुनिक भावबोध के रचनाकार के रूप में वह सदैव याद किए जाएंगे। उक्त विचार महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष एवं ख्यात समीक्षक प्रो.श्रद्धानंद ने व्यक्त किए। वह नवगीत के प्रतिष्ठापक डॉ. शम्भुनाथ सिंह की 35 वीं पुण्यतिथि पर आयोजित स्मृति संध्या को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि डॉ.सिंह की ख्याति रचनात्मक तथा संगठनात्मक दृष्टि से हिंदी नवगीत के शलाका पुरुष के रूप में सर्वाधिक रही। उन्होंने नवगीत को ही नहीं अपितु संपूर्ण समकालीन हिंदी कविता को भी समृद्ध किया है।
अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ गीतकार हीरालाल मिश्र ‘मधुकर’ ने कहा कि डॉ. शम्भुनाथ सिंह का व्यक्तित्व एवं कृतित्व बहुत विराट था। उनकी रचनाएं अंधविश्वास और रूढ़ियों पर सीधे प्रहार करती हैं और समाज की विषम वर्जनाओं को तोड़ती हैं। डॉ. सिंह लोकतंत्र के समग्र जीवन दर्शन को जानते-पहचानते थे। वे सामाजिक यथार्थ और शोषित वर्ग की पीड़ा के प्रति हमेशा संवेदनशील रहे। सारस्वत अतिथि वरिष्ठ समीक्षक प्रो.इंदीवर ने कहा कि शंभुनाथ सिंह ने आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की परंपरा में व्यापक गद्य रचना की। उनका वैदिक, पुरातात्विक, सांस्कृतिक और सामाजिक चिंतन चमत्कृत करने वाला है। विशिष्ट अतिथि डॉ.रामसुधार सिंह ने कहा कि डॉ.शंभुनाथ सिंह हाईस्कूल में ही गीत और कविताएं लिखने लगे थे। उस दौरान पूरे कालेज का वातावरण साहित्यिक था। आरंभ में अतिथियों का स्वागत डॉ.बेनी माधव, संचालन डॉ.राजीव सिंह एवं धन्यवाद ज्ञापन डॉ.रोली सिंह ने किया। दूसरे सत्र में कवि गोष्ठी हुई। इसमें डॉ.मंजरी पांडेय, कंचन सिंह परिहार, नवगीतकार डॉ.अशोक सिंह, कुंवर सिंह ‘कुंवर’, डॉ. लियाकत अली ‘जलज’, डॉ.निकेता सिंह, टीकाराम शर्मा ‘आचार्य’, प्रो.वत्सला श्रीवास्तव, प्रो. अंशु शुक्ला, अभिनव अरुण, ओम धीरज, हीरालाल मिश्र ‘मधुकर’ शम्भुनाथ शास्त्री, राकेश तिवारी, डॉ.रामानंद दीक्षित, बुद्धदेव तिवारी, विनोद कुमार वर्मा, कुमार महेंद्र, नागेश शांडिल्य, संतोष कुमार प्रीत, देवाशीष, शशिकला पांडेय, पंकज श्रीवास्तव, देवेंद्र पांडेय, नरेंद्रनाथ मिश्र, हिमांशु उपाध्याय, नवनीत सिंह, कुमार हेमंत, मो.आमिर, विजयचंद्र त्रिपाठी आदि ने काव्यपाठ किया। संचालन गौतम अरोड़ा ‘सरस’ ने किया।
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