BRICS Summit 2026: नई दिल्ली में 12-13 सितंबर को होने वाले 18वें BRICS शिखर सम्मेलन से पहले भारत और चीन के बीच आर्थिक और व्यापारिक मुद्दों पर बातचीत अहम रहने वाली है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के सम्मेलन में शामिल होने की उम्मीद है और उनके साथ बड़ा कारोबारी प्रतिनिधिमंडल भी आ सकता है। ऐसे में भारत की ओर से चीन से आने वाली हाईटेक वस्तुओं के आयात में आ रही दिक्कतों और चीन में भारतीय कंपनियों के सामने मौजूद निवेश संबंधी प्रतिबंधों का मुद्दा उठाया जा सकता है।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने भारतीय उद्योग संगठनों से इस मुद्दे पर विचार-विमर्श शुरू किया है। मंत्रालय के चीन डेस्क ने चीनी कस्टम्स की ओर से प्रमुख टेक्नोलॉजी से जुड़े सामान पर लगाए गए प्रतिबंधों का अध्ययन किया है।
सरकारी अधिकारी के मुताबिक, इन प्रतिबंधों का भारतीय मैन्युफैक्चरिंग पर असर पड़ रहा है। भारत की ओर से बातचीत में प्रक्रियागत अड़चनों और सोर्सिंग से जुड़े नियमों में राहत के लिए पारस्परिकता यानी दोनों देशों की ओर से समान स्तर की सुविधा देने का मुद्दा उठाया जा सकता है।
एक वरिष्ठ रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर के अधिकारी ने बताया कि चीन की ओर से कई क्षेत्रों में महत्वपूर्ण टेक्नोलॉजी और कच्चे माल के निर्यात पर बढ़ते प्रतिबंध सरकार के लिए बड़ी प्राथमिकता बन गए हैं।
उद्योग क्षेत्र के अधिकारी के मुताबिक चीन ने कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रों में निर्यात प्रतिबंध लगाए हैं। इनमें शामिल हैं:
HVDC तकनीक लंबी दूरी तक बिजली पहुंचाने में महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि इससे ट्रांसमिशन के दौरान बिजली के नुकसान को कम किया जा सकता है। यह रिन्यूएबल एनर्जी को ग्रिड से जोड़ने और ग्रिड स्थिरता के लिए भी जरूरी है।
उद्योग क्षेत्र के अधिकारी ने कहा कि चीन के ये प्रतिबंध भारत की घरेलू मैन्युफैक्चरिंग क्षमता विकसित करने की कोशिशों को प्रभावित कर सकते हैं। उनके मुताबिक, अगर इन समस्याओं का समाधान नहीं हुआ तो भारत में बैकवर्ड इंटीग्रेशन की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। पिछले 12-15 महीनों में इनमें से ज्यादातर प्रतिबंध लगाए गए हैं। चीन द्वारा महत्वपूर्ण टेक्नोलॉजी और विशेष कंपोनेंट्स के निर्यात पर प्रतिबंध वैश्विक सप्लाई चेन की रणनीतिक कमजोरियों को सामने लाते हैं।
हालांकि, आधिकारिक व्यापार आंकड़ों के मुताबिक हाल के महीनों में चीन से भारत के व्यापार में एक अलग तस्वीर भी सामने आई है। चीन को भारत का निर्यात चालू वित्त वर्ष की अप्रैल-जून अवधि में पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले 28 प्रतिशत से ज्यादा बढ़कर 5.55 अरब डॉलर हो गया। चीन को निर्यात में यह बढ़ोतरी ऐसे समय हुई जब अमेरिकी टैरिफ की वजह से भारतीय मछली निर्यात पर असर पड़ा। चीन को बढ़े निर्यात ने उस नुकसान को कुछ हद तक संभालने में मदद की।
भारत और चीन के व्यापारिक रिश्तों में हाल के समय में कुछ नरमी देखने को मिली है। इसमें कई अहम बदलाव शामिल हैं:
इसी बीच वाणिज्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के इस सप्ताह बीजिंग जाने की उम्मीद थी। हालांकि, भारत-चीन के बीच सीमा संबंधी बातचीत के चलते यह यात्रा टलने की जानकारी मिली है। इस संबंध में वाणिज्य मंत्रालय को भेजे गए सवाल का खबर लिखे जाने तक जवाब नहीं मिला था।
भारत में चीनी राजदूत शू फेइहोंग ने 1 सितंबर को वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल से मुलाकात की थी। चीनी दूतावास के मुताबिक, दोनों पक्षों ने आर्थिक और व्यापारिक संबंधों के साथ-साथ आपसी हित से जुड़े अन्य मुद्दों पर विचारों का आदान-प्रदान किया।
दूतावास ने कहा कि दोनों देशों के नेताओं के रणनीतिक मार्गदर्शन में चीन-भारत संबंधों में सुधार और विकास की अच्छी गति बनी हुई है। इसमें सीधी उड़ानों और सीमा व्यापार की बहाली तथा लोगों के बीच संपर्क बढ़ने का भी जिक्र किया गया।
इसके अलावा, 2019 में भारत के चीन के नेतृत्व वाली RCEP वार्ता से बाहर होने के बाद पहली बार इस साल अप्रैल में वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कैमरून में WTO की 14वीं मंत्रिस्तरीय बैठक के दौरान अपने चीनी समकक्ष Wang Wentao के साथ द्विपक्षीय बातचीत की थी।
अमेरिकी टैरिफ को लेकर बनी अनिश्चितता के बीच भारत ने चीन के साथ आर्थिक संबंधों के कुछ क्षेत्रों में नियमों में ढील भी दी है। मार्च में सरकार ने देश की सबसे बड़ी सरकारी बिजली उपकरण निर्माता कंपनी BHEL को चीन से 21 महत्वपूर्ण वस्तुओं की खरीद पांच साल तक करने की अनुमति दी।
जून में वित्त मंत्रालय ने भारत में कारखाने रखने वाली चार चीनी बिजली उपकरण निर्माता कंपनियों को महत्वपूर्ण बिजली परियोजनाओं से जुड़े सरकारी टेंडरों में हिस्सा लेने की अनुमति दी।
इन चार कंपनियों को सरकारी खरीद नियमों के कुछ प्रावधानों से छूट दी गई है।
भारत में जमीन से सीमा साझा करने वाले देशों की कंपनियों के लिए सरकारी खरीद में हिस्सा लेने से पहले संबंधित भारतीय प्राधिकरण के पास पंजीकरण जरूरी है। चीनी कंपनियों पर ये प्रतिबंध 2020 में भारत और चीन के सैनिकों के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर हुई हिंसक झड़प के बाद लागू किए गए थे। इसके तहत चीनी बोलीदाताओं के लिए विदेश मंत्रालय और गृह मंत्रालय से अनिवार्य राजनीतिक और सुरक्षा मंजूरी लेना जरूरी किया गया था।
इस साल मार्च में बिजली क्षेत्र से जुड़ी कुछ खरीद के मामले में और जून में चार चीनी बिजली उपकरण कंपनियों को सरकारी टेंडरों में हिस्सा लेने की अनुमति दिए जाने के साथ इन नियमों में कुछ ढील देखने को मिली है। यह बदलाव ऐसे समय आया है जब सरकार ने लैंड बॉर्डर शेयर करने वाले देशों से होने वाले विदेशी प्रत्यक्ष निवेश यानी FDI की नीति में भी कुछ बदलाव किए हैं।
12-13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाला BRICS Summit भारत और चीन के बीच आर्थिक और व्यापारिक मुद्दों पर उच्चस्तरीय बातचीत का मंच भी बन सकता है। चीन से टेक्नोलॉजी और कच्चे माल के आयात में आ रही अड़चनें तथा भारतीय कंपनियों के लिए चीन में निवेश से जुड़ी पाबंदियां इस बातचीत के प्रमुख मुद्दों में शामिल हो सकती हैं।
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