Published By: Anjali Karmakar | Updated: Sep 9, 2026, 8:55 PM
धरती पर सूरज जैसी ऊर्जा पैदा करने की कोशिश में भारत ने एक बड़ा कदम आगे बढ़ाया है. बेंगलुरु की स्टार्टअप 'प्रनोस फ्यूजन' ने अपने टोकामक PRAGYA में पहली बार प्लाज्मा तैयार करने में सफलता हासिल की है. अर्थ.कॉम की रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 40 सेंटीमीटर रेडियस वाले इस टोकामक को महज 8 महीने में तैयार किया गया है. ये 20 करोड़ डिग्री सेंटीग्रेड का एक महाप्रयोग है. यह उपलब्धि भारत के न्यूक्लियर फ्यूजन रिसर्च में प्राइवेट सेक्टर की बढ़ती भूमिका को दिखाती है. अब इसी तकनीक के जरिए प्लाज्मा को कंट्रोल करने, उसकी जांच करने और फ्यूजन एनर्जी से जुड़ी तकनीकों को विकसित और टेस्ट करने की दिशा में काम किया जाएगा.
PRAGYA का काम अभी बिजली बनाना नहीं है. यह एक तरह की टेस्ट मशीन है, जिस पर कंपनी लगातार प्रयोग करेगी. कंपनी इसे करीब 20 साल तक चलाने की योजना बना रही है. इस दौरान हर साल करीब 3,000 प्लाज्मा शॉट लेने का लक्ष्य है. यानी रोजाना करीब 10 से 12 बार प्लाज्मा बनाकर उससे जुड़ा डेटा इकट्ठा किया जाएगा. इस डेटा से आगे बड़े फ्यूजन रिएक्टर बनाने में मदद मिल सकती है.
PRAGYA टोकामक पहले वेसल के अंदर बहुत ज़्यादा वैक्यूम बनाता है. हाइड्रोजन आइसोटोप, हाइड्रोजन या ड्यूटेरियम को फिर चैंबर में इंजेक्ट किया जाता है. इसे तब तक गर्म किया जाता है, जब तक एटम अपने इलेक्ट्रॉन खो नहीं देते. इससे गैस इलेक्ट्रिकली चार्ज्ड प्लाज़्मा में बदल जाती है. यह प्रोसेस एक अच्छे से चलने वाले मिलिट्री कंट्रोल रूम से कम नहीं है. काम शुरू करने के लिए, कंट्रोल रूम से वॉकी-टॉकी के ज़रिए टोकामक लैब को एक कमांड दिया जाता है. सिस्टम को ग्रीन-फ्लैग मिलने के बाद, PRAGYA अपना काम शुरू कर देता है. हालांकि, PRAGYA वह नहीं कर सकता जो एक फुल-स्केल फ्यूजन रिएक्टर कर सकता है. इसका मतलब होगा प्लाज़्मा को लगभग 100-150 मिलियन डिग्री सेल्सियस तक गर्म करना, ताकि हाइड्रोजन न्यूक्लिआई अपने आपसी इलेक्ट्रिकल रिपल्शन को दूर कर सकें और फ्यूज हो सकें.
प्रनोस भले ही भारत में प्राइवेट फ्यूजन के लिए नई राह बना रहा हो, लेकिन दुनिया भर में यह टेक्नोलॉजी बहुत तेज़ी से आगे बढ़ रही है. इसकी तुरंत फंडिंग और टेक्नोलॉजी की मुश्किलें फिलहाल सुलझ गई हैं, इसलिए टीम ने पक्का इरादा कर लिया है कि वह मौका न चूके. इससे पहले अगस्त की शुरुआत में चीन ने नेक्स्ट-जेनरेशन फ्यूजन प्रोजेक्ट के लिए एक बड़े 582-टन के सुपरकंडक्टिंग मैग्नेट का सफल टेस्ट किया था. हेफेई में इंस्टीट्यूट ऑफ प्लाज़्मा फिजिक्स द्वारा बनाया गया, यह अब तक का सबसे बड़ा फ्यूजन रिएक्टर मैग्नेट है. इस मैग्नेट का इस्तेमाल चीन के बर्निंग प्लाज़्मा एक्सपेरिमेंटल सुपरकंडक्टिंग टोकामक (BEST) में किया जाएगा, जिसे अक्सर “आर्टिफिशियल सूरज” कहा जाता है. खबर है कि चीन 2027 के आखिर तक BEST को पूरा करने और 2030 तक फ्यूजन से बिजली बनाने का प्रदर्शन करने का लक्ष्य बना रहा है.
भारत में भी न्यूक्लियर फ्यूजन पर रिसर्च तेज़ी पकड़ रही है. गांधीनगर में इंस्टिट्यूट फॉर प्लाज़्मा रिसर्च के पास दो ऑपरेशनल टोकामक हैं: पहला- आदित्य-U भारत के 1989 के टोकामक का अपग्रेडेड वर्जन. दूसरा- स्टेडी-स्टेट सुपरकंडक्टिंग टोकामक-1. PRAGYA देश का पहला टोकामक है जो किसी प्राइवेट प्लेयर से आया है. यह प्राइवेट कैपिटल और कमर्शियल प्रेशर से भारत में फ्यूजन के लिए दूसरा रास्ता खोलने में पायनियर है. भारत के न्यूक्लियर नियमों में बहुत ज़रूरी ढील से इसे बढ़ावा मिला है. 2025 में पास हुए SHANTI एक्ट ने भारत के न्यूक्लियर पावर सेक्टर के दरवाज़े प्राइवेट प्लेयर्स के लिए खोल दिए हैं, जिससे उन्हें ज़्यादा आज़ादी से इन्वेस्ट और रिसर्च करने की इजाज़त मिली है.
प्रनोस सिर्फ PRAGYA पर ही नहीं रुकेगा. अगला कदम प्राणिक नाम का एक फुल-फ्लेज्ड न्यूक्लियर फ्यूजन रिएक्टर है.PRAGYA, Praniq का एक छोटा वर्जन है, जहां बेसिक सिमुलेशन और टेस्ट किए जा रहे हैं. Praniq 100–200 मिलियन डॉलर का प्रोजेक्ट है. इसका मकसद सिर्फ न्यूक्लियर फ्यूजन करना नहीं है, बल्कि रिएक्टर जितनी एनर्जी इस्तेमाल करता है, उससे ज़्यादा एनर्जी बनाना है.
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