किशोरों में आत्महत्या के प्रयास करीब तीन गुना बढ़े – Hindustan

मानसिक तनाव जब गहरा होता है, तो वह किसी को दिखाई नहीं देता। अधिकांश मामलों में पीड़ित शख्स को भी नहीं पता होता कि उसे खतरनाक जानलेवा बीमारी ने घर कर लिया है। ऐसे में विशेषज्ञ एक बात पर ज्यादा जोर दे रहे हैं कि गहरा मानसिक संकट अक्सर चुपचाप बढ़ता है। अवसाद, चिंता, लगातार निराशा या अकेलापन जैसी परेशानियां सामान्य थकान जैसी नहीं दिखतीं, इसलिए परिवार और आसपास के लोग इन्हें देर से पहचानते हैं। कलंक, शर्म और अपने आप ठीक हो जाएगा वाली सोच के कारण इलाज भी अक्सर देर से शुरू होता है। सच यह है कि ऐसे विचारों और संकट का इलाज संभव है। समय पर बातचीत, काउंसलिंग और जरूरत पड़ने पर चिकित्सकीय मदद से जोखिम काफी हद तक घटाया जा सकता है। इसलिए आत्महत्या के विचारों को सामान्य परेशानी नहीं, मेडिकल इमरजेंसी मानना चाहिए और संकेत दिखते ही मदद लेनी चाहिए。
2026 में जर्नल चाइल्ड एंड एडोलेसेंट साइकिएट्री एंड मेंटल हेल्थ में प्रकाशित अध्ययन चेन्जेस इन सुसाइड अटेम्प्ट, सुसाइडल आइडिएशन, एंड सेल्फ-हार्म अमंग इंडियन एडोलेसेंट्स : कम्पैरिजन ऑफ क्रॉस-सेक्शनल सर्वेज बिफोर 2016 एंड आफ्टर 2023 कोविड-19 पैंडेमिक में 2016 और 2023 के सर्वे की तुलना की गई। दक्षिण भारत के नौ स्कूलों में कक्षा सात से सात के 11 से 17 वर्ष के विद्यार्थी शामिल थे। 2016 में 1,459 और 2023 में 1,153 छात्रों के जवाब लिए गए। इनमें आत्महत्या के प्रयास 2.1 से बढ़कर 6.6 फीसदी, आत्महत्या के विचार 4.7 से 11.6 फीसदी और खुद को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं 8.5 से 15.2 फीसदी मिलीं। प्रयासों का जोखिम करीब 3.45 गुना और विचारों का जोखिम 2.64 गुना रहा। अध्ययन ने मानसिक स्वास्थ्य की परेशानी, बुलिंग और साइबर बुलिंग, शहरी परिवेश तथा पारिवारिक संरचना को जोखिम से जोड़ा। इसके विपरीत स्कूल में सुरक्षित महसूस करना और सकारात्मक सामाजिक व्यवहार सुरक्षा देने वाले कारक रहे।
एनसीआरबी की रिपोर्ट एक्सीडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड्स इन इंडिया 2024 के अनुसार 2024 में देश में कुल 1,70,746 आत्महत्याएं दर्ज हुईं, जबकि 2023 में यह संख्या 1,71,418 थी। छात्र मामलों की संख्या 2023 के 13,892 से बढ़कर 2024 में 14,488 हो गई। 2014 में यह आंकड़ा 8,068 था। यानी एक दशक में करीब 80 फीसदी बढ़ोतरी हुई।
शोध के साथ दिल्ली के आईएचबीएएस के वरिष्ठ प्रोफेसर एवं जेरियाट्रिक मानसिक स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख डॉ. ओम प्रकाश कहते हैं कि किसी व्यक्ति के मन में ऐसे विचार आना सामान्य परेशानी नहीं, मेडिकल इमरजेंसी की तरह लेना चाहिए। ऐसे व्यक्ति को अकेला छोड़ने के बजाय जल्द विशेषज्ञ तक पहुंचाना जरूरी है। उनके अनुसार यह धारणा गलत है कि जोखिम हमेशा बिना संकेत के अचानक आता है। कई बार व्यक्ति परिवार, दोस्तों या शिक्षकों को सीधे या इशारे में अपनी तकलीफ बताता है, लेकिन बात को मजाक या गुस्सा मान लिया जाता है। मैं मरना चाहता हूं या अब मुझसे और नहीं होगा जैसी बातों को टालना नहीं चाहिए। वहीं, आईएचबीएएस विशेषज्ञ दिल्ली के स्कूलों और कॉलेजों में शिक्षकों को गेटकीपर बनाने पर जोर देते हैं। विद्यार्थी के व्यवहार में अचानक बदलाव, पढ़ाई से दूरी, लगातार अनुपस्थिति, सामाजिक अलगाव, निराशा या विदाई जैसी बातें पहचानना जरूरी है। डॉ. प्रकाश के मुताबिक, सबसे जरूरी बात यही है कि ऐसे विचारों को हल्के में न लिया जाए। समय पर पहचान, शांत बातचीत, परिवार और संस्थान का सहयोग तथा विशेषज्ञ तक तत्काल पहुंच कई जिंदगियां बचा सकती है।
– व्यक्ति बार-बार मौत या मरने की बात करे
– अचानक सबसे अलग-थलग रहने लगे
– लगातार निराश या बेहद परेशान दिखे
-₹ परिवार, दोस्तों या शिक्षकों से विदाई जैसी बातें करे
– व्यवहार में अचानक बड़ा बदलाव आए
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