Varanasi News: वाराणसी। दुर्गा मंदिर संगीत समारोह की दूसरी निशा में बुधवार को कलाकारों का मेला लगा। दूसरी निशा में भगवती के दरबार में 60 कलाकारों ने गायन, वादन और नृत्य की प्रस्तुतियां दीं। खास बात यह रही कि शाम चार से रात्रि आठ बजे के सत्र में 31 कलाकार जबकि रात्रि नौ से भोर तक हुए सत्र में 29 कलाकारों को रखा गया था। कलाकारों की संख्या अधिक होने से आयोजन में आपाधापी बनी रही। कुछ कलाकार दो-दो, तीन-तीन भजन सुनाते रहे तो कुछ को भजन का मुखड़ा ही सुनाने का अवसर दिया गया। लोक गायक अमलेश शुक्ला ने ‘नमोस्तुते मां नमोस्तुते दुर्गे मैया नमोस्तुते’, ‘दुर्गाकुंड वाली मैया का शृंगार है’ और ‘हे मां जगदंबा भवानी विनती करूं मैं बारंबार’ जबकि आस्था शुक्ला ने ‘ओ मैया शृंगार तेरा लाल है’,‘लाल चूड़ियां चढ़ाऊं’ और आज तेरा जगराता माता सुनाया। भगवती के दरबार में अदिती चटर्जी, वसुंधरा शर्मा और मांडवी सिंह ने कथक नृत्य किया। इसके बाद रंजना राय, स्नेहा अवस्थी, फिरदौस खान, शैलबाला सरकार, रिरिका पूजा, काजल लाडली, पिंकी मिश्रा, सुमन अग्रहरि, अशोक अनमोल, सूर्य सम्राट तिवारी, रिया राज, सत्यम यादव, पारुल नंदा, कुसुम किशोरी, वंदना अनमोल, चंदन सिंह, अभिषेक पाठक, अर्चना तिवारी, कौशल सिंह, अमन पांडेय आदि ने प्रथम सत्र में भजन गायन किया。
नीरज सिंह, गीतांजलि मौर्या, आर्यन बाबू, अरविन्द अकेला, अंशकिा सिंह, व्यासजी मौर्य, अमरमणि दूबे, तनु प्रियंका सिंह, राजन तिवारी, गोविंद गोपाल, ओम तिवारी, आलोक नादान, श्रद्धा पांडेय, खुशी मिश्रा, अक्षया मिश्रा, मनीष उपाध्याय, कंचन सिंह आदि को अवसर मिला। संचालन जगदीश्वरी चौबे ने किया।
बुधवार सुबह विधि विधान से अर्चन के बाद मंदिर का पट श्रदालुओं के लिए खुला। मध्याह्न में विविध प्रकार के भोग मां को अर्पित किए गए। सांयकाल पंचामृत स्नान के बाद मां को बनारसी साड़ी से सुसज्जित किया गया। टेंगरी, गुलाब, गुड़हल, नीलकंठ के पुष्पों से मां की झांकी सजाई गई। हरे मोतियों की माला और हरे आभूषणों से अलंकृत किया गया। हरियाली और सोलह शृंगार झांकी का दर्शन सायंकाल शुरू हुआ। रात्रि आठ बजे विराट आरती हुई।
शार्ट बायो : सांस्कृतिक समीक्षक के रूप में हिंदी पत्रकारिता में खास पहचान रखने वाले अरविन्द मिश्र अपने परिवार में तीसरी पीढ़ी के पत्रकार हैं। उनके दादा स्व.पं.जनार्दन दत्त मिश्र ‘व्यास’ ने आजादी की लड़ाई में अपनी लेखनी से देश की सेवा की। उनके पिता नवगीतकार स्व.पं.अशोक मिश्र ‘सामयिक’ ने देश के कई राष्ट्रीय समाचार पत्रों में उच्च पदों पर सेवाएं दीं।
परिचय एवं अनुभव
अरविन्द मिश्र, हिंदी सांस्कृतिक पत्रकारिता का जाना पहचाना नाम है। बीते ढ़ाई दशक से अधिक समय से हिंदी पत्रकारिता की मुख्य धारा में बतौर सांस्कृतिक पत्रकार कार्यरत हैं। पत्रकारिता की शुरुआत क्राइम रिपोर्टर के रूप में हुई। दैनिक आज और अमर उजाला के लिए अर्से तक धर्म-संस्कृति की रिपोर्टिंग के साथ-साथ खेल पत्रकारिता भी की। रंगमंच, साहित्यिक मंच और संचालन विधा पर लेखन करने के साथ ही स्वयं उक्त विधाओं से जुड़े भी हैं।
करियर का सफर
अरविन्द मिश्र ने विद्यार्थी जीवन के दौरान ही काशी के सांध्यकालीन एवं साप्ताहिक समाचार पत्रों के लिए लिखना शुरू कर दिया था। वर्ष 1997 में दैनिक आज से जुड़कर मुख्य धारा की पत्रकारिता आरंभ की। आज अखबार चार वर्ष सेवा देने के बाद वर्ष 2002 में दैनिक अमर उजाला के वाराणसी संस्करण से बतौर रिपोर्टर जुड़े। वर्ष 2008 से 2012 तक अमर उजाला कॉम्पैक्ट की डेस्क और रिपोर्टिंग टीम को लीड किया। बरेली में अमर उजाला कॉम्पैक्ट की लॉन्चिंग कराई। वर्ष 2013 में दैनिक हिन्दुस्तान के पटना संस्करण से जुड़े। हिन्दुस्तान की ‘पटना लाइव’ टीम को चार वर्षों तक लीड किया। वर्ष 2018 से वाराणसी में बतौर मुख्य संवाददाता कार्यरत हैं।
शैक्षणिक पृष्ठभूमि और रिपोर्टिंग
हाईस्कूल की परीक्षा विज्ञान वर्ग के विद्यार्थी के रूप में उत्तीण करने के बाद इंटरमीडिएट की परीक्षा वाणिज्य विषय से दी। हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की परीक्षा यूपी बोर्ड से उत्तीर्ण की। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से वर्ष 1994 में बीकॉम की पढ़ाई पूरी की। पारिवारिक परिस्थितियों के कारण एम.कॉम की पढ़ाई पूरी नहीं हो सकी। बहुत ही कम समय में अरविन्द मिश्र ने अमर उजाला में सांस्कृतिक पत्रकारिता के नवीन मानदण्ड स्थापित कर दिए। इस दौरान उन्होंने ‘काशी परिक्रमा’, ‘आमने-सामने’ और ‘देखी तुम्हरी काशी’ जैसे कॉलमों के माध्यम से अपनी लेखनी को धार दी। प्रदूषण की मार झेल रही गंगा पर उन्होंने विशेष रूप से कार्य किया। गंगा पर उनके विशिष्ट लेखन से प्रभावित होकर ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरुशंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने उन्हें गंगारविन्द नाम दिया। सोशल मीडिया पर अरविन्द मिश्र इसी नाम से पहचाने जाते हैं। हिन्दुस्तान से जुड़ने के बाद अरविन्द मिश्र ने सांस्कृति पत्रकारिता में मील के कई पत्थर स्थापित किए। उन रिपोर्ट में रामनगर की रामलीला, नाटी इमली के भरत मिलाप से लेकर काशी में होने वाले धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजनों की अनेकानेक रिपोर्ट शामिल हैं। संकट मोचन संगीत समारोह और काशी के अति प्राचीन बेनियाबाग के इतिहास को पहली बार कलमबंद करने का श्रेय भी अरविन्द मिश्र को ही जाता है। उन्हें हिन्दुस्तान अखबार की ओर से राष्ट्रीय स्तर पर दिए जाने वाले ‘होनहार अवार्ड’ इंडिवीजुअल कैटेगरी में छह बार दिए जा चुके हैं। जिन समाचार शृंखलाओं के लिए उन्हें यह अवार्ड मिले उनमें ‘काकोरी काण्ड के नायक’, ‘मैं बेनियाबाग हूं’, ‘प्रेमचंद के बहाने’, ‘प्रेमचंद से छल’, ‘सब्जीवाला शायर’ और ‘गंगा कावेरी’ शामिल हैं। संकट मोचन संगीत समारोह, काशी तमिल संगमम, बनारस लिट् फेस्ट जैसे वृहद आयोजनों की यादगार कवरेज की कटिंग पाठकों ने सहेज कर रखी है। 23 अगस्त 2023 को चंद्रयान-3 की चंद्रमा पर सफल लैंडिंग के दिन अरविन्द मिश्र ने 23 अगस्त की तारीख को चंद्रयान दिवस के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर मनाने की पहल छेड़ी। इसका नतीजा यह हुआ कि दक्षिण अफ्रीका की यात्रा से लौट कर सीधे इसरो पहुंचे प्रधानमंत्री ने इस दिन को नेशनल स्पेस डे के रूप में मनाने की घोषणा कर दी।
विशेषज्ञता
अरविन्द मिश्र निश्चित रूप से सांस्कृति पत्रकार के रूप में अपनी खास पहचान रखते हैं लेकिन मानवीय कोणों वाली स्टोरी, शिक्षा, खेल और प्रशासनिक रिपोर्टिंग में भी अपनी दक्षता प्रमाणित की है। एक सफल रिपोर्टर होने के साथ ही उन्होंने अपने आप को एक छायाकार के रूप में भी स्थापित किया। हिन्दुस्तान समाचार पत्र में पटना और वाराणसी संस्करण में सौ से अधिक फोटोग्राफ पर बाइलाइन मिल चुकी है। काशी में देवदीपावली के उत्सव की उनके द्वारा ली गई तस्वीर को हिन्दुस्तान के देशभर के सभी संस्करणों में प्रमुखता से स्थान मिल चुका है।
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