जब देशभर में हिंदी दिवस पर हिंदी की समृद्ध परंपरा और उसके विकास की चर्चा हो रही है, तब काशी का नाम प्रमुखता से सामने आता है। काशी और आधुनिक हिंदी का रिश्ता करीब तीन सदियों से लगातार मजबूत होता आया है।
हिंदी को कठिन साहित्यिक भाषा से निकालकर आम बोलचाल और जनमानस की भाषा बनाने में काशी के साहित्यकारों की बड़ी भूमिका रही है। यही वह धरती है, जहां भारतेंदु हरिश्चंद्र ने आधुनिक साहित्यिक हिंदी की नींव मजबूत की।
प्रेमचंद की रचनाओं को नई पहचान मिली और काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) ने हिंदी को अकादमिक मंच पर स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
1920 में BHU में शुरू हुई हिंदी की PG पढ़ाई
1920 में BHU में हिंदी की पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई शुरू हुई। इससे पहले महामना पंडित मदन मोहन मालवीय ने विश्वविद्यालय में हिंदी को खास जगह दी थी। 1919 में आचार्य रामचंद्र शुक्ल को हिंदी का प्रोफेसर बनाया गया। इसके बाद BHU हिंदी की पढ़ाई और शोध का बड़ा केंद्र बन गया।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल की पोती डॉ. मुक्ता के पास 1920 की एक पुरानी तस्वीर है। इसमें पंडित मदन मोहन मालवीय, BHU के प्रोफेसरों के साथ आचार्य रामचंद्र शुक्ल भी नजर आ रहे हैं। यह तस्वीर उस समय की है, जब BHU में हिंदी की पढ़ाई को आगे बढ़ाया जा रहा था।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल 1937 में BHU के हिंदी विभाग के अध्यक्ष बने थे। BHU में आज भी वह कुर्सी रखी है, जिस पर आचार्य रामचंद्र शुक्ल बैठते थे।
आइए अब जानते हैं हिंदी विभाग के प्रोफेसर ने क्या बताया…
प्रोफेसर ने बताया- BHU में पहली बार बनी हिंदी की पूरी पढ़ाई
BHU के हिंदी विभाग के प्रोफेसर श्रीप्रकाश शुक्ल ने बताया कि हिंदी की पूरी और व्यवस्थित पढ़ाई शुरू करने वाला BHU देश का पहला विभाग था। वर्ष 1920 में यहां हिंदी में पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री शुरू हुई।
उन्होंने बताया कि 1918 में कोलकाता में हिंदी की पढ़ाई शुरू हो गई थी, लेकिन वहां हिंदी का अलग पूरा विभाग नहीं था। इस वजह से BHU का हिंदी विभाग देश में अपनी तरह का पहला पूरा हिंदी विभाग बना। फिलहाल BHU का हिंदी विभाग अपना शताब्दी वर्ष मना रहा है।
मालवीय जी के प्रयास से 1900 में कचहरियों में देवनागरी को मिली जगह
काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के हिंदी विभाग के वरिष्ठ साहित्यकार और आचार्य प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल ने हिंदी के विकास में काशी और BHU के योगदान के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि हिंदी दिवस पर काशी के उन विद्वानों और रचनाकारों को याद करना गौरव की बात है, जिन्होंने हिंदी भाषा और साहित्य को समृद्ध किया।
प्रो. शुक्ल ने कहा कि महामना पंडित मदन मोहन मालवीय का हिंदी और देवनागरी के विकास में बड़ा योगदान रहा। उनके प्रयासों से वर्ष 1900 में कचहरियों में देवनागरी लिपि को जगह मिली। इसके बाद BHU में हिंदी की पढ़ाई शुरू हुई। बाबू श्यामसुंदर दास, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, केशव प्रसाद मिश्र और विश्वनाथ प्रसाद मिश्र जैसे विद्वानों ने हिंदी को आगे बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई।
अंग्रेजी हटाओ आंदोलन में भी बनारस और BHU की बड़ी भूमिका
प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल ने बताया कि वर्ष 1967 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय के छात्र नेताओं ने हिंदी के समर्थन में बड़ा आंदोलन किया था। इसका मकसद अंग्रेजी के साथ हिंदी को भी बराबर का दर्जा दिलाना और हिंदी को आगे बढ़ाना था।
आंदोलनकारियों की मांग थी कि अंग्रेजी की जगह हिंदी को बढ़ावा दिया जाए। साथ ही भारतीय संविधान में हिंदी को राजभाषा के रूप में मिली मान्यता को सही तरीके से लागू किया जाए। इस आंदोलन में BHU के छात्रों ने हिंदी के पक्ष में मजबूती से आवाज उठाई थी।
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