डिबाई में मेला श्री गणेश चौथ और राधा अष्टमी महोत्सव के दूसरे दिन मंगलवार देर रात अनाज मंडी परिसर में रसियों का मुकाबला हुआ। यह कुश्ती का दंगल नहीं, बल्कि ब्रज के लोकगायन, हास्य-व्यंग्य और हाजिरजवाबी से जुड़ा एक खास आयोजन था। इसमें दो पक्ष गीतों के जरिए एक-दूसरे पर कटाक्ष करते हैं। वे तुकबंदी और तुरंत जवाब देने की कला से दर्शकों का मनोरंजन करते हैं।
रसिया ब्रज क्षेत्र की मुख्य लोकगीत परंपराओं में से एक है। इसकी शुरुआत ब्रज की ग्रामीण संस्कृति से मानी जाती है। यहां उत्सवों, होली और दूसरे आयोजनों में गीतों से भावनाओं और हास्य-विनोद को दिखाया जाता रहा है। समय के साथ रसिया गायन के स्थानीय रूप विकसित हुए। जवाबी गायन और हास्य वाले कटाक्ष की शैली भी इसी लोकपरंपरा का हिस्सा है। हालांकि, इसके मौजूदा मुकाबला स्वरूप की शुरुआत किसी एक जगह या व्यक्ति से नहीं जोड़ी जा सकती।
डिबाई के मुकाबले में अखाड़ा बीके मधुआ राया के शंभू बांगड़ा और सत्तो शर्मा सोटे वाले ने हिस्सा लिया। उनका मुकाबला अतरौली के होती लाल शास्त्री से हुआ। एक पक्ष के गीत में किए गए कटाक्ष का जवाब दूसरे पक्ष ने गीत से ही दिया। इस मुकाबले में पहले से लिखी स्क्रिप्ट नहीं थी। कलाकारों की हाजिरजवाबी, शब्दों की चतुराई, तुकबंदी और मौके पर तुरंत जवाब देने की क्षमता खास रही। चुटीले बोलों पर दर्शकों ने खूब तालियां बजाईं और ठहाके लगाए।
इस कार्यक्रम का आयोजन राकेश वार्ष्णेय उर्फ लल्ला साइकिल वाले की याद में किया गया। इसका उद्घाटन पिंकी वार्ष्णेय साइकिल वाले और अजय कुमार लोधी भट्टे वाले ने मिलकर किया। राजीव अग्रवाल कुमार इलेक्ट्रॉनिक, कमल वर्मा, अजय शर्मा बैटरी, रॉबिन अग्रवाल, शिवकुमार लोहे वाले, विनय शर्मा बस वाले, सोनू गुप्ता, रितेश खल वाले समेत कमेटी के सभी सदस्य वहां मौजूद थे।
रसियों का मुकाबला देखने हजारों लोग अनाज मंडी पहुंचे। देर रात से बुधवार सुबह करीब पांच बजे तक गीतों में कटाक्ष और जवाबी गायन चलता रहा। आज के आधुनिक मनोरंजन के दौर में भी यह आयोजन लोगों को लोकभाषा, संगीत, तुकबंदी और सामूहिक लोकस्मृति से जोड़ता दिखा।
डिबाई में मेला श्री गणेश चौथ एवं राधा अष्टमी महोत्सव के दूसरे दिन मंगलवार देर रात अनाज मंडी परिसर में रसियों का मुकाबला आयोजित किया गया। यह कुश्ती का दंगल नहीं, बल्कि ब्रज अंचल की समृद्ध लोकगायन, हास्य-व्यंग्य और हाजिरजवाबी से जुड़ा अनूठा आयोजन था। दो पक्ष गीतों के माध्यम से एक-दूसरे पर चुटीले कटाक्ष करते हैं और तुकबंदी तथा तत्काल जवाब देने की कला से दर्शकों का मनोरंजन करते हैं।
रसिया ब्रज क्षेत्र की प्रमुख लोकगीत परंपराओं में शामिल है। इसकी जड़ें ब्रज की ग्रामीण लोकसंस्कृति में मानी जाती हैं, जहां उत्सवों, होली और सामूहिक आयोजनों में गीतों के माध्यम से भावनाओं और हास्य-विनोद की अभिव्यक्ति होती रही है। समय के साथ क्षेत्रों में रसिया गायन के स्थानीय रूप विकसित हुए। जवाबी गायन और हास्यपूर्ण कटाक्ष वाली शैली भी इसी लोकपरंपरा का रूप है। हालांकि इसके वर्तमान मुकाबला स्वरूप की शुरुआत किसी एक स्थान या व्यक्ति से जोड़ना उचित नहीं माना जाता।
डिबाई में हुए मुकाबले में अखाड़ा बीके मधुआ राया के शंभू बांगड़ा एवं सत्तो शर्मा सोटे वाले और अतरौली के होती लाल शास्त्री के बीच गीतों का मुकाबला हुआ। एक पक्ष के गीत में किए गए कटाक्ष का जवाब दूसरे पक्ष ने गीत के जरिए दिया। मुकाबले में लिखित पटकथा के बजाय कलाकारों की हाजिरजवाबी, शब्दों की चतुराई, तुकबंदी और मौके के अनुसार तत्काल जवाब देने की क्षमता प्रमुख रही। चुटीले बोलों पर दर्शकों ने तालियां बजाईं और जमकर ठहाके लगाए।
कार्यक्रम का आयोजन राकेश वार्ष्णेय उर्फ लल्ला साइकिल वाले की स्मृति में किया गया। उद्घाटन पिंकी वार्ष्णेय साइकिल वाले एवं अजय कुमार लोधी भट्टे वाले ने संयुक्त रूप से किया। राजीव अग्रवाल कुमार इलेक्ट्रॉनिक, कमल वर्मा, अजय शर्मा बैटरी, रॉबिन अग्रवाल, शिवकुमार लोहे वाले, विनय शर्मा बस वाले, सोनू गुप्ता, रितेश खल वाले सहित कमेटी के सभी सदस्य मौजूद रहे।
रसियों का मुकाबला देखने के लिए हजारों लोग अनाज मंडी पहुंचे। देर रात से बुधवार सुबह करीब पांच बजे तक गीतों में कटाक्ष और जवाबी गायन का सिलसिला चलता रहा। आधुनिक मनोरंजन के दौर में भी यह आयोजन लोकभाषा, संगीत, तुकबंदी और सामूहिक लोकस्मृति से लोगों को जोड़ता नजर आया।
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