गयाजी के शेरघाटी में करीब 161 साल पहले गिरे मंगल ग्रह के उल्कापिंड का एक टुकड़ा अब बेहद खास स्विस घड़ी का हिस्सा बन गया है। स्विट्जरलैंड की लग्जरी घड़ी निर्माता कंपनी लुई मोइनेट ने भारत की संस्कृति और इतिहास को समर्पित ‘द ओनली इंडिया’ नाम से यह घड़ी
कंपनी के अनुसार यह 1-ऑफ-1 यानी दुनिया में केवल एक बनाई गई कलेक्टर घड़ी है। दुनिया में इसका दूसरा नमूना नहीं है। इस घड़ी की अनुमानित कीमत 2.1 करोड़ रुपए से अधिक बताई गई है।
हालांकि, कंपनी ने इसकी आधिकारिक कीमत जारी नहीं की है। कंपनी के आधाकारिक साइट पर यह जानकारी दी गई है कि सिंगल पीस बनी यह घड़ी बिक गई है। 18 कैरेट रेड गोल्ड,मोर पंख लगे इस घड़ी की खासियत जानिए…
पहले इस घड़ी की कुछ तस्वीरें देखिए
निर्माता कंपनी लुई मोइनेट के अनुसार, इस घड़ी के डायल में 25 अगस्त 1865 को शेरघाटी के पास गिरे उल्कापिंड का असली टुकड़ा लगाया गया है। यह उल्कापिंड मंगल ग्रह से आया था। इसे वैज्ञानिक दृष्टि से दुर्लभ माना जाता है। मूल शेरघाटी उल्कापिंड का संग्रह लंदन के संग्रहालय में है। मंगल ग्रह से आने वाले उल्कापिंडों को मुख्य रूप से शेरगोटी, नाखला और चासिग्नी श्रेणियों में बांटा जाता है।
घड़ी में असली मोर पंख का इस्तेमाल
शेरगोटी श्रेणी के उल्कापिंडों की संख्या भी बहुत कम है। ऐसे में इस घड़ी में इसका इस्तेमाल इसे सामान्य लग्जरी घड़ियों से अलग बनाता है। इस घड़ी का केस 18 कैरट रेड गोल्ड से बनाया गया है। इसके डिजाइन में भारतीय तिरंगे के अशोक चक्र से प्रेरित 20 तीलियों वाला धर्म चक्र उकेरा गया है।
चक्र पर हाथ से बारीक पेंटिंग की गई है। केस के लग्स में चार रूबी (माणिक) भी जड़े गए हैं। घड़ी के डायल में असली मोर पंख का इस्तेमाल किया गया है। इस घड़ी में भारतीय प्रतीकों और स्विस घड़ी निर्माण कला का मेल देखने को मिलता है।
डायल का बेस असली मोर के पंख से बना है, जिससे इसमें प्राकृतिक इंद्रधनुषी चमक आती है। मोर भारत का राष्ट्रीय पक्षी है क्योंकि यह समृद्ध परंपराओं से जुड़ा हुआ है। हजारों वर्षों से इसे अमरता और उर्वरता का प्रतीक माना जाता रहा है
चार महीने की जांच के बाद तैयार हुआ मूवमेंट
द ओनली इंडिया घड़ी में लुई मोइनेट का एलएम-35 दूरबिलॉन मूवमेंट लगाया गया है। घड़ी के अंदर समय मापने वाले मैकेनिकल सिस्टम के घूमते हुए हिस्से को डायल पर देखा जा सकता है। कंपनी के अनुसार इस मूवमेंट ने इंटरनेशनल क्रोनोमेट्री प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार जीता है। पुरस्कार से पहले इसका करीब चार महीने तक परीक्षण किया गया। इसे 150 से अधिक झटकों से गुजारा गया। घड़ी में मैन्युअल वाइडिंग सिस्टम, 72 घंटे का पावर रिजर्व और 21,600 कंपन प्रति घंटे की फ्रीक्वेंसी दी गई है। इसका केस 47 मिमी का है और इसमें 30 मीटर तक पानी से बचाव की क्षमता है।
161 साल बाद शेरघाटी का नाम फिर दुनिया में
शेरघाटी में 25 अगस्त 1865 को गिरा करीब 5 किलो का शेरगोट्टी उल्कापिंड उस समय शायद किसी को अंदाजा नहीं रहा होगा कि उसका नाम आने वाली सदियों में अंतरिक्ष विज्ञान के इतिहास में दर्ज होगा। आज उसी उल्कापिंड का एक प्रामाणिक टुकड़ा भारतीय संस्कृति से प्रेरित एक ऐसी स्विस घड़ी में शामिल है, जिसे दुनिया में सिर्फ एक बार बनाया गया है।
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