भगवान गणेश की कोई भी मूर्ति या तस्वीर देखें, तो उनके एक हाथ में मोदक जरूर नजर आता है। क्या …और पढ़ें
मोदक का स्वाद जगह के साथ कैसे बदला? (Image Source: AI-Generated)
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। गणेश उत्सव आते ही बाजारों और घरों में एक मिठाई की खुशबू सबसे ज्यादा महकने लगती है, और वो है ‘मोदक’। जी हां, यह सिर्फ एक मिठाई नहीं है, बल्कि एक ऐसा स्वाद है जो सीधे त्योहार की खुशी से जुड़ा है।
क्या आप जानते हैं कि जिस मोदक को हम इतने चाव से खाते हैं, उसकी शुरुआत आखिर कैसे हुई थी और महाराष्ट्र का असली मोदक नॉर्थ इंडिया में मिलने वाले मोदकों से कितना अलग है? आइए, इसे आसान शब्दों में समझते हैं।
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मोदक का इतिहास आज की गणेश उत्सव परंपरा से कहीं ज्यादा पुराना है। प्राचीन संस्कृत साहित्यों और आयुर्वेद में ‘मोदक’ का जिक्र मिलता है और इतिहासकार इसकी शुरुआत करीब 200 ईसा पूर्व से मानते हैं। समय के साथ इसके रूप बदलते गए, जैसे 12वीं सदी के संस्कृत ग्रंथ ‘मानसोल्लास’ में चावल के आटे, इलायची और कपूर से बने ‘वर्षोपलगोलक’ का उल्लेख है। इसके अलावा, छठी शताब्दी की एलोरा गुफाओं की मूर्तियों में भी भगवान गणेश को मोदक या लड्डू जैसी मिठाई खाते हुए दिखाया गया है, जो बप्पा के साथ इसके सदियों पुराने और गहरे रिश्ते को साबित करता है।
वहीं, महाराष्ट्र के मशहूर भाप वाले ‘उकडीचे मोदक’ की शुरुआत कब और कैसे हुई, इसका कोई सटीक लिखित प्रमाण नहीं है, लेकिन इसका विकास पूरी तरह से स्थानीय भूगोल और खेती पर निर्भर रहा है। कोंकण तट के इलाकों में चावल और नारियल प्रचुर मात्रा में मिलते थे, इसलिए वहां चावल के आटे, नारियल और गुड़ से बने मोदक रसोई का हिस्सा बन गए। इसके विपरीत, जिन अंदरूनी इलाकों में गेहूं आसानी से उपलब्ध था, वहां तले हुए मोदक बनाए जाने लगे। इससे यह साफ होता है कि मोदक किसी एक पक्की रेसिपी का मोहताज नहीं रहा, बल्कि समय और जगह के अनुसार अपने अलग-अलग रूप लेता रहा।
अगर आप मोदक का बिल्कुल असली और पारंपरिक स्वाद चखना चाहते हैं, तो आपको महाराष्ट्र के ‘उकडीचे मोदक’, यानी भाप में पके मोदक के बारे में जानना होगा। जी हां, इसके बाहर की सफेद परत चावल के आटे से बनाई जाती है, जो पकने के बाद एकदम मुलायम हो जाती है।
इसके अंदर ताजे कसे हुए नारियल, गुड़, जायफल और इलायची का मीठा मिश्रण भरा जाता है। सबसे खास बात यह है कि इसे तला नहीं जाता, बल्कि भाप में पकाया जाता है। जब इसे परोसा जाता है, तो ऊपर से शुद्ध देसी घी डाला जाता है। घी, गुड़ और नारियल का यह तालमेल इतना शानदार होता है कि यह मुंह में जाते ही घुल जाता है।
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जैसे-जैसे मोदक की लोकप्रियता महाराष्ट्र से बाहर निकली, उत्तर भारत के लोगों ने इसे अपने स्थानीय स्वाद और पसंद के हिसाब से ढाल लिया। नॉर्थ इंडिया में आपको मोदक के कई नए अवतार देखने को मिलेंगे, जो असली मोदक से बिल्कुल अलग होते हैं:
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