रेप केस में 10 साल बाद जुड़ा SC/ST एक्ट, दिल्ली हाई कोर्ट ने बताई वजह; क्या कहा – Hindustan

नाबालिग लड़की के साथ 10 साल पुराने रेप केस में दिल्ली हाई कोर्ट का बड़ा फैसला सामने आया है। कोर्ट ने आरोपी पर अब एससी/एसटी एक्ट को जोड़ने और इसके तहत आरोप तय करने का निर्देश दिया है। इस मामले में कोर्ट ने माना है कि शुरुआती सबूतों से पता चल रहा है कि आरोपी को लड़की की जाति के बारे में पता था।

इस मामले फैसला सुनाते हुए जस्टिस सौरभ बनर्जी ने ट्रायल कोर्ट के 2017 के फैसले में बदलाव करते हुए निर्देश दिया कि नाबालिग लडकी के साथ रेप के आरोपी के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1) के तहत आरोप तय किए जाएं। हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश के बाकी फैसलों को उसी तरह से रखा है।

रेप पीड़िता ने दिल्ली हाई कोर्ट में एक रिवीजन याचिका दायर की थी, जिसपर सुनवाई हो रही थी। इस याचिका में कड़कड़डूमा कोर्ट में पॉक्सो एक्ट के तहत स्पेशल कोर्ट द्वारा पारित पिछले आदेश को चुनौती दी गई थी। पीड़िता की तरफ से आईपीसी की धारा 328, पॉक्सो एक्ट की धारा 14(3) और एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1) के तहत आरोप जोड़ने की मांग की गई थी। कोर्ट ने इस मामले में अब एससी/एसटी एक्ट जोड़कर आरोप तय करने का निर्देश दिया है।

मामाल 31 मार्च, 2016 का है। इस दिन 10वीं कक्षा में पढ़ रही लड़की अपना रिजल्ट लेने के लिए स्कूल गई थी। इस दौरान आरोपी तरुण उसे स्कूल से बाहर ले गया और उस्मानपुर के पांचवें पुश्ता इलाके में उसके दो दोस्त आए और कार से लेकर नोएडा गए। इसके बाद यहां नाबालिग लड़की के साथ रेप किया गया। रेप करने के बाद आरोपियों ने इस घटना के बारे में किसी को ना बताने की धमकी दी थी।

इस मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने गौर किया कि लड़की ने सीआरपीसी की दारा 164 के तहत दर्ज किए गए बयान में आरोपों को दोहराया था। इस बयान में लड़की ने आरोप लगाया था कि दूसरे आरोपी ने उसके साथ रेप किया था और तीसरे आरोपी ने घटना का वीडियो बनाया था। वीडियो बनाने वाले युवक ने भी नाबालिग लड़की के साथ रेप करने की कोशिश की थी।

इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने पहले किडनैपिंग, आपराधिक धमकी और पॉक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज करने के बाद आरोप तय किए थे। लेकिन आईपीसी की धारा 328 और 366ए, पॉक्सो एक्ट की धारा 14(3) या एससी एसटी एक्ट से संबंधित प्रावधानों के तहत आरोप नहीं तय किए थे। इस मामले पर सुनवाई करते हुए जस्टिस बनर्जी ने कहा कि एससी एसटी एक्ट को अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों को जाति आधारित अपमान, भेदभाव और अत्याचार से बचाने के लिए बनाया गया था। जस्टिस ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14,15,17 और अनुच्छेद 21 का कानूनी रूप बताया था।

संक्षिप्त विवरण
मोहम्मद आजम पिछले 3.5 सालों से पत्रकारिता कर रहे हैं और वर्तमान में लाइव हिन्दुस्तान में स्टेट टीम में बतौर कंटेंट प्रोडूसर काम कर रहे हैं।
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