'बिहारी होना मजाक नहीं, गर्व की बात है…' पंचायत आजतक 'बिहार' में बोले क्रांति प्रकाश झा – AajTak

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पंचायत आजतक बिहार के सेशन ‘सितारे बिहार के’ में अभिनेता क्रांति प्रकाश झा और अभिनेत्री ऐश्वर्या सुष्मिता ने बॉलीवुड में बिहार के कलाकारों की मौजूदगी, बिहार को लेकर बनी स्टीरियोटाइप छवि और राज्य की अलग-अलग भाषाई-सांस्कृतिक पहचान पर खुलकर बात की. दोनों कलाकारों ने कहा कि बिहार में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है, लेकिन राज्य की कहानियों को अब भी सीमित नजरिए से पेश किया जाता है. उन्होंने यह भी बताया कि बिहार से निकलने वाले कलाकार किस तरह अपनी पहचान बनाते हुए आगे बढ़ रहे हैं.
क्रांति प्रकाश झा ने बिहार के कलाकारों की मौजूदगी की बात करते हुए कहा कि बिहार से आने वाली प्रतिभाओं को पहचानने में लोगों को समय लगा है. कला किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं होती और बिहार के लोग अपनी जिंदगी की मुश्किल परिस्थितियों को पार करते हुए आगे बढ़ना जानते हैं. बिहार के लोगों में एक तरह की जिजीविषा और संघर्ष से निकलने की क्षमता होती है. उनके मुताबिक, मुंबई में रहते हुए उन्होंने कभी ऐसा महसूस नहीं किया कि बिहार से होने की वजह से लोग उन्हें कमतर नजर से देखते हैं.
क्रांति प्रकाश झा ने कहा कि बिहार से आने वाले कलाकारों में एक खास तरह की सादगी और मिट्टी से जुड़ाव दिखाई देता है. उन्होंने मनोज बाजपेयी, पंकज त्रिपाठी और संजय मिश्रा जैसे कलाकारों का उदाहरण देते हुए कहा कि उनके अभिनय में बिहार की मिट्टी की खुशबू, सहजता और सरलता दिखाई देती है.
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बिहार को पर्दे पर सिर्फ एक स्टीरियोटाइप तक सीमित करने पर उठाया सवाल
क्रांति प्रकाश झा ने फिल्मों में बिहार के चित्रण को लेकर भी अपनी बात रखी. उन्होंने कहा कि बिहार को बेचना आसान है, लेकिन बिहार को बनाना मुश्किल है. बिहार के पास कहानियों की कोई कमी नहीं है, लेकिन फिल्मों और वेब सीरीज में अक्सर बिहार की वही छवियां दिखाई जाती हैं, जो पहले से लोकप्रिय रही हैं.
क्रांति प्रकाश झा ने कहा कि बिहार के इतिहास और समाज में कई ऐसी कहानियां हैं, जिन पर अब तक ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया. उन्होंने वीर कुंवर सिंह का उदाहरण देते हुए कहा कि बिहार के ऐसे कई नायकों और महत्वपूर्ण लोगों की कहानियां सामने आनी चाहिए.
ऐश्वर्या सुष्मिता: बिहार सिर्फ भोजपुरी नहीं, कई भाषाओं और संस्कृतियों का मेल
अभिनेत्री ऐश्वर्या सुष्मिता ने कहा कि बिहार की पहचान को एक ही भाषा या संस्कृति तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि भोजपुरी को फिल्मों में काफी जगह मिली है, लेकिन बिहार में दूसरी भाषाओं और बोलियों की भी अपनी समृद्ध परंपरा है. उन्होंने मैथिली फिल्मों का जिक्र करते हुए कहा कि अब ऐसी कहानियां भी सामने आ रही हैं, जिन्हें दर्शकों और फिल्म इंडस्ट्री से पहचान मिल रही है. ऐश्वर्या ने ‘पोखर के दुनू पार’ फिल्म का उदाहरण दिया और कहा कि इस तरह की फिल्में बिहार की अलग कहानी और संस्कृति को सामने लाती हैं. उन्होंने कहा कि ऐसी फिल्मों को दर्शकों की सराहना और पहचान मिलना सकारात्मक बदलाव है.
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 ऐश्वर्या सुष्मिता ने आगे कहा कि अब लोगों की स्वीकार्यता बढ़ रही है और बिहार की अलग-अलग भाषाओं में बनने वाली फिल्मों और कहानियों को भी दर्शक पसंद कर रहे हैं. उन्होंने भोजपुरी के साथ-साथ मैथिली सिनेमा में भी काम किया है. मिथिला मकान’ जैसी मैथिली फिल्म का जिक्र करते हुए कहा कि इस फिल्म को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली थी.
उनके मुताबिक, बिहार के कलाकारों और क्षेत्रीय सिनेमा के सामने अभी भी सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उनकी कहानियां बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंचें. लेकिन धीरे-धीरे यह बदलाव दिखाई दे रहा है.
‘बिहारी होना कोई मजाक नहीं है’
अपने अनुभव साझा करते हुए क्रांति प्रकाश झा ने बिहार से बाहर रहने के दौरान सामने आई धारणा का भी जिक्र किया. उन्होंने बताया कि जब वह पढ़ाई के लिए दिल्ली गए तो वहां बिहारियों को लेकर एक स्टीरियोटाइप धारणा मौजूद थी. कई बार उनसे कहा गया कि वह ‘बिहारी जैसे नहीं दिखते’. क्रांति ने कहा कि उन्हें यह बात समझ नहीं आती थी कि किसी का बिहारी जैसा दिखना आखिर किस तरह का पैमाना है. अपने संघर्ष के बारे में कहा कि बिहार से उन्हें जो संस्कार और दृढ़ता मिली, उसने उन्हें मुश्किल हालात में आगे बढ़ते रहने की ताकत दी.
क्रांति प्रकाश झा ने कहा कि उनकी जिंदगी का मूल मंत्र है कि चाहे हालात कितने भी मुश्किल हों, हार नहीं माननी चाहिए. उन्होंने कहा कि बिहार की मिट्टी और उनके माता-पिता के संस्कारों ने उन्हें यह सीख दी है. उन्होंने यह भी कहा कि एक कलाकार के तौर पर उनके लिए एक दूसरी चुनौती यह है कि वह बिहार की बात इतनी ज्यादा करते हैं कि लोग उन्हें सिर्फ ‘बिहारी कलाकार’ के रूप में देखने लगते हैं. उनके मुताबिक, उनकी पहचान सिर्फ क्षेत्र तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि एक कलाकार के तौर पर भी होनी चाहिए.
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