नव नालंदा महाविहार में हिंदी पखवाड़ा का समापन समारोह बुधवार को आचार्य नागार्जुन भवन स्थित सप्तपर्णी सभागार में हुआ। अध्यक्षता कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह ने की। समारोह में वरिष्ठ रचनाकार एवं आलोचक प्रो. अवधेश प्रधान और वरिष्ठ अनुवादविद् एवं भाषा-विच
प्रस्तावना एवं स्वागत वक्तव्य में प्रो. रवींद्र नाथ श्रीवास्तव, प्रोफेसर, हिंदी विभाग एवं संकायाध्यक्ष, पालि एवं अन्य भाषा संकाय ने कहा कि हिंदी का प्रश्न केवल भाषा के विस्तार का नहीं, बल्कि ज्ञान की लोकतांत्रिक उपलब्धता और भारतीय समाज की बौद्धिक स्वायत्तता से जुड़ा है। उन्होंने कहा कि किसी भाषा की प्रतिष्ठा उसमें विकसित होने वाले ज्ञान, चिंतन और रचनात्मकता से बनती है। हिंदी की समृद्धि अन्य भारतीय भाषाओं के साथ संवाद और उनके अनुभवों को आत्मसात करने में है।
दो पुस्तकों का लोकार्पण समारोह में हिंदी के वरिष्ठ आलोचक प्रो. परिचय दास की दो पुस्तकों ‘एवं अथवा’ और ‘समीचीन’ का लोकार्पण किया गया। लोकार्पण डॉ. राजेंद्र प्रसाद मिश्र, प्रो. अवधेश प्रधान, प्रो. सिद्धार्थ सिंह और प्रो. हरे कृष्ण तिवारी ने संयुक्त रूप से किया। ‘एवं अथवा’ में आदिकाल और मध्यकालीन कविता की रचनात्मक समालोचना, जबकि ‘समीचीन’ में भारतीय साहित्य की सृजनात्मक आलोचना के विविध आयामों पर केंद्रित सामग्री है। नव नालंदा महाविहार में 14 से 30 सितंबर तक हिंदी पखवाड़े के दौरान कविता-पाठ, भाषण, निबंध-लेखन, अनुवाद और टंकण प्रतियोगिताएं भी आयोजित की गईं।
अनुवाद भाषाओं के बीच ज्ञान-विचार के आदान-प्रदान का माध्यम डॉ. राजेंद्र प्रसाद मिश्र ने कहा कि अनुवाद विभिन्न भाषाओं के बीच ज्ञान, अनुभव और संवेदना के आदान-प्रदान का महत्वपूर्ण माध्यम है। अच्छे अनुवाद के लिए भाषा की प्रकृति, अभिव्यक्ति क्षमता और सांस्कृतिक संदर्भों की समझ जरूरी है। राजभाषा हिंदी के प्रभावी प्रयोग के लिए सरल, स्पष्ट और स्वाभाविक भाषा पर जोर दिया।
कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह ने हिंदी को उच्च शिक्षा और ज्ञान-विज्ञान में अधिक प्रभावी बनाने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों और शोधार्थियों को अपनी भाषा में विचार करने, प्रश्न उठाने और ज्ञान निर्माण के पर्याप्त अवसर मिलने चाहिए। हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. हरे कृष्ण तिवारी ने धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम का संचालन अतिथि प्राध्यापक शिवानी जायसवाल ने किया। डॉ. धम्म ज्योति ने पालि में मंगलपाठ और डॉ. नरेंद्र दत्त तिवारी ने संस्कृत में स्वस्तिवाचन किया।
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