आज है दशमी श्राद्ध, पितरों की शांति के लिए ऐसे करें तर्पण-पिंडदान,जानें मुहूर्त और सही विधि – bharat24live.com

Rashmi Singh
Date: 05-10-26 07:45
Dashami Shraddha 2026: पितृ पक्ष में हर तिथि का अपना धार्मिक महत्व माना जाता है. इसी क्रम में आश्विन कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि पर दशमी श्राद्ध किया जाता है. साल 2026 में दशमी श्राद्ध 5 अक्टूबर, सोमवार को पड़ रहा है. इस दिन उन पूर्वजों का श्राद्ध किया जाता है, जिनका निधन दशमी तिथि को हुआ हो. परिवार के लोग पितरों का स्मरण करते हुए तर्पण, पिंडदान और अन्य श्राद्ध कर्म श्रद्धापूर्वक करते हैं.
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्राद्ध का मूल भाव पितरों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करना है. माना जाता है कि विधि-विधान और श्रद्धा के साथ किया गया तर्पण एवं श्राद्ध कर्म पितरों को समर्पित होता है. इसलिए दशमी श्राद्ध के दिन पूजा-पाठ के साथ मन की श्रद्धा और भावनाओं को भी विशेष महत्व दिया जाता है.
दशमी श्राद्ध 2026 का शुभ मुहूर्त
दशमी श्राद्ध के लिए दिन का अपराह्न काल विशेष महत्वपूर्ण माना जाता है. 5 अक्टूबर को कुतुप मुहूर्त सुबह 11:46 बजे से दोपहर 12:33 बजे तक रहेगा. इसके बाद रौहिण मुहूर्त दोपहर 12:33 बजे से 1:20 बजे तक रहेगा. वहीं श्राद्ध कर्म के लिए अपराह्न काल दोपहर 1:20 बजे से 3:41 बजे तक माना गया है. इस दौरान अपनी पारिवारिक परंपरा और पुरोहित के मार्गदर्शन के अनुसार श्राद्ध कर्म किया जा सकता है.
दशमी श्राद्ध में क्या करें?
दशमी श्राद्ध के दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनें और पूजा या श्राद्ध कर्म के स्थान को साफ करें. इसके बाद पितरों का स्मरण करते हुए श्रद्धापूर्वक संकल्प लिया जाता है. श्राद्ध कर्म में तर्पण का विशेष महत्व माना गया है. इसके लिए जल में काले तिल मिलाकर पितरों को अर्पित किया जाता है. तर्पण के समय पूर्वज का नाम और गोत्र स्मरण करने की परंपरा है.
तर्पण के बाद परिवार की परंपरा के अनुसार पिंडदान किया जाता है. पिंड बनाने के लिए आमतौर पर चावल, तिल और अन्य सामग्री का उपयोग किया जाता है. श्राद्ध की विधि अलग-अलग परिवारों और परंपराओं में कुछ अलग हो सकती है, इसलिए स्थानीय परंपरा के अनुसार कर्मकांड करना उचित माना जाता है.
श्राद्ध में भोजन और दान का महत्व
श्राद्ध कर्म के बाद भोजन कराने और दान देने की भी परंपरा रही है. कई परिवारों में अपनी धार्मिक परंपरा के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है. इसके अलावा जरूरतमंद लोगों को भोजन, वस्त्र या दैनिक उपयोग की वस्तुएं अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान की जा सकती हैं. धार्मिक मान्यता है कि पितरों के निमित्त श्रद्धा से किया गया दान पुण्यकारी होता है. इसलिए इस दिन दिखावे के बजाय अपनी क्षमता के अनुसार सेवा और दान करने पर जोर दिया जाता है.
क्या दशमी श्राद्ध सिर्फ दशमी तिथि में मृत्यु वालों का होता है?
दशमी श्राद्ध मुख्य रूप से उन पूर्वजों के लिए किया जाता है, जिनका निधन दशमी तिथि को हुआ था. इसमें शुक्ल पक्ष या कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि दोनों को ध्यान में रखा जाता है. यानी जिन पूर्वजों की मृत्यु तिथि दशमी मानी जाती है, उनका वार्षिक श्राद्ध इसी तिथि पर करने की परंपरा है.
अगर किसी व्यक्ति को अपने पूर्वज की मृत्यु तिथि की जानकारी नहीं है या तिथि स्पष्ट नहीं है, तो पितृ पक्ष की सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध करने की परंपरा भी बताई गई है. ऐसी स्थिति में परिवार की परंपरा और विद्वान पुरोहित की सलाह के अनुसार श्राद्ध कर्म किया जा सकता है.
पितरों का स्मरण है श्राद्ध का मुख्य भाव
दशमी श्राद्ध केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पूर्वजों को याद करने और उनके प्रति सम्मान व्यक्त करने का अवसर भी माना जाता है. इस दिन श्रद्धा से किया गया तर्पण, पिंडदान, भोजन और दान पितरों को समर्पित किया जाता है. धार्मिक मान्यताओं में श्राद्ध कर्म के पीछे सबसे महत्वपूर्ण भावना श्रद्धा, कृतज्ञता और परिवार की परंपरा का पालन करना मानी गई है.
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