जैसी उम्मीद थी, वैसा ही हुआ। मंगलवार को अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो उज्बेकिस्तान से सीधे मुंबई पहुंचे, जहां उनकी मुलाकात भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर से हुई। इस बैठक के मुद्दे करीब-करीब तय थे और ज्यादा जोर रणनीतिक साझेदारी मजबूत करने व भारत-अमेरिका व्यापार समझौता पर ही दिया जाना था। इसका एहसास सोमवार को ही हो गया था, जब समरकंद में रूबियो ने पत्रकारों को बताया कि व्यापार समझौता अंतिम रूप लेने के करीब है।
यह संयोग ही है कि जिस दिन अमेरिकी विदेश मंत्री की भारत यात्रा शुरू हुई, ठीक उसी दिन भारत और न्यूजीलैंड के बीच मुक्त व्यापार समझौते की भी शुरुआत हुई। इस समझौते के बाद न्यूजीलैंड में भारत के करीब-करीब सभी सामान अब आयात-शुल्क से मुक्त हो गए हैं। अमेरिका इससे शायद ही नावाकिफ होगा। रूबियो के बयान का एक संदर्भ यह भी है कि पिछले दिनों वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा था, दोनों देशों के बीच व्यापार-वार्ता लगभग थम सी गई है, जिसके बाद यह आशंका गहराने लगी थी कि मुक्त व्यापार समझौते की पहल सुस्त पड़ गई है। रूबियो ने अब अपने बयान से इस सवाल का जवाब दे दिया है। हालांकि, वह भारत दौरे में नई दिल्ली नहीं आ रहे, मुंबई के बाद सीधे जामनगर जाएंगे, जहां दुनिया की सबसे बड़ी तेल रिफाइनरी है। चर्चा है कि अमेरिका रिफाइनरी क्षेत्र में रिलायंस से बड़ा निवेश कराना चाहता है।
वास्तव में, रूबियो भारत पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि व्यापार-वार्ता को जल्द से जल्द अंजाम तक पहुंचाया जा सके। फरवरी में दोनों देशों ने आपसी व्यापार को बढ़ावा देने के लिए एक अंतरिम समझौते के ढांचे पर सहमति जताई थी, जिसके तहत अमेरिका द्वारा पारस्परिक टैरिफ को घटाकर 18 फीसदी करने और भारत द्वारा अमेरिकी औद्योगिक व कृषि उत्पादों पर कम शुल्क वसूलने का प्रस्ताव था। इस ढांचे पर अंतिम सहमति नहीं बन सकी है, लेकिन हालिया भू-राजनीतिक बदलावों से अमेरिकी मंशा जाहिर जरूर हो रही है।
दरअसल, डीजल की कमी, बढ़ रही महंगाई और अपने मध्यावधि चुनावों को देखते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस के साथ एक ‘डीजल’ समझौता किया है, जिसके तहत अमेरिका को तुरंत रूस से तीन लाख टन डीजल मिलेगा। नवंबर में यह मात्रा बढ़कर पांच लाख टन हो जाएगी और अगली आपूर्ति में 10 लाख टन होगी। माना जा रहा है कि एक लाख टन तेल वाशिंगटन पहुंच भी गया है। चूंकि अमेरिका अपनी ऊर्जा-जरूरतों को पूरा करने के लिए खुद रूस पर निर्भर है, इसलिए रूबियो ने समरकंद में मॉस्को से आयातित ईंधन पर लगे प्रतिबंधों में छूट देने के भी संकेत दिए।
इसका अर्थ है कि अमेरिका फिलहाल उस ‘लिंडसे ग्राहम अधिनियम’ का इस्तेमाल भारत के खिलाफ नहीं कर रहा, जिसमें रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने का प्रावधान है। रूबियो ने छूट की बात कहकर भारत को एक ‘मीठी गोली’ देने की कोशिश की है, पर असलियत में रूस से ऊर्जा-आयात की जरूरत खुद अमेरिका को है। ‘टैरिफ दंड’ में मौजदा छूट को एक लुभावना प्रस्ताव इसलिए माना जा रहा है, क्योंकि लिंडसे ग्राहम कानून को निरस्त नहीं किया गया है। इसका अर्थ है कि नई दिल्ली पर दबाव बनाने के लिए राष्ट्रपति ट्रंप भविष्य में इस टैरिफ का इस्तेमाल बतौर हथियार कर सकते हैं।
यही वजह है कि अमेरिकी व्यापार प्रस्ताव को नई दिल्ली हर पैमाने पर तौल रहा है। सावधानी से आगे बढ़ना हमारी सही नीति है। जल्दबाजी में हमें ऐसा कोई समझौता नहीं करना चाहिए, जो हमारे दीर्घकालिक हितों को नुकसान पहुंचाए। इस समझौते के बहाने अमेरिका व्यापार संतुलन अपने पक्ष में करना चाहता है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि अप्रैल से सितंबर के दौरान अमेरिका में भारतीय निर्यात लगभग 51 अरब अमेरिकी डॉलर का रहा, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह आंकड़ा 45 अरब डॉलर के आसपास था। यानी, शुल्क संकट के बावजूद लगभग 11 फीसदी की वृद्धि हुई है। इसी तरह, समान अवधि में भारत का आयात 26 फीसदी बढ़कर 32 अरब डॉलर से भी अधिक रहा है। वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही के दौरान, अमेरिका के साथ भारत का वस्तु व्यापार अधिशेष लगभग 18.48 अरब डॉलर रहा।
अमेरिका इस अंतर को कम करने के लिए भारतीय कृषि बाजार का इस्तेमाल अपने किसानों के लिए करना चाहता है। नई दिल्ली शायद ही इसके लिए तैयार होगी। भारत में कृषि का अपना राजनीतिक गणित भी है। यहां के किसानों, सहकारी समितियों और बाजार समितियों के हितों से हमारी राजनीति जुड़ी हुई है। फिर, कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था के मूल में भी है। ऐसे में, भारत अपने किसानों को चोट पहुंचाने वाले प्रावधानों से बचना चाहेगा। ऐसे किसी व्यापार समझौते की बाध्यता इसलिए भी हमारी नहीं है, क्योंकि हमारे पास कुछ ऐसे ‘ट्रंप कार्ड’ हैं, जिनका इस्तेमाल कर सकते हैं। मसलन, भारतीय दवाओं की एक बड़ी खेप अमेरिका जाती है। आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका में इस्तेमाल की जाने वाली लगभग 50 फीसदी दवाएं भारत से ही आती हैं। इसी तरह, भारतीय वस्त्रों की अमेरिका में काफी मांग है और दुनिया भर में भारतीय वस्त्र के निर्यात का करीब 30 फीसदी अकेले अमेरिका जाता है। इस सूची में उपभोग के कुछ अन्य सामान भी हैं।
जाहिर है, अमेरिका दबाव डालकर हमसे व्यापार समझौता नहीं कर सकता, इसलिए रूसी तेल खरीदने में छूट का दांव उसने खेला है। अच्छी बात यह है कि भारत ने अपने ऊर्जा-स्रोतों में विविधता की शुरुआत कर दी है। हम अब लगभग 40 देशों से कच्चा तेल मंगवा रहे हैं, जबकि दो दशक पहले यह संख्या 27 थी। फिर भी, रूस हमारा बहुमूल्य सहयोगी बना हुआ है और अगस्त में तो कुल तेल आयात में उसकी हिस्सेदारी सबसे अधिक 44.3 फीसदी रही। रूस के साथ इस संबंध में कोई आंच आनी भी नहीं चाहिए, क्योंकि यह हमारी ऊर्जा सुरक्षा के लिए जरूरी है।
रही बात मार्को रूबियो के नई दिल्ली न आने की, तो मुमकिन है कि राष्ट्रीय राजधानी के हालिया विरोध-प्रदर्शनों ने उनको यहां आने से रोका हो। हालांकि, उनकी नई दिल्ली में अगवानी करने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय हितों की रक्षा है, जिसके लिए भारत तत्पर दिख भी रहा है।
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