क्या है SEM कोर्ट, जहां फंसी हुई है सौरव-रांका की रिहाई? सामान्य कोर्ट से कितना अलग – AajTak

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कॉकरोच जनता पार्टी के सौरव दास और आशुतोष रांका की न्यायिक हिरासत बुधवार (21 अक्टूबर 2026) को खत्म हो रही है. अब इस मामले की सुनवाई एसईएम कोर्ट में होनी है. इससे पहले बुधवार दोपहर में न्यायिक हिरासत को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में भी सुनवाई थी. यहां कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब कानून में अपील और दूसरे वैकल्पिक उपाय मौजूद हैं, तो याचिकाकर्ता सीधे संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अदालत क्यों आए हैं. इसके बाद सौरव दास और आशुतोष रांका ने दिल्ली हाई कोर्ट में उनकी हिरासत बढ़ाने के आदेशों को चुनौती देने वाली याचिका वापस ले ली. 
अब उनकी रिहाई का फैसला एसईएम कोर्ट में होगा. ऐसे में सवाल है कि आखिर ये एसईएम कोर्ट है क्या,  क्या ये सामान्य कोर्ट से अलग है?  तो जानते हैं इन सवालों के जवाब… 
एसईएम कोर्ट की बात करने से पहले आपको सौरव और आशुतोष के मामले के बारे में बताते हैं कि ये मामला एसईएम कोर्ट कैसे पहुंचा. दरअसल, रांका और दास को 14 अक्टूबर को विरोध प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा व्यवस्था तोड़ने और जंतर-मंतर में प्रवेश करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. फिर सोमवार को एसईएम ने उनकी हिरासत दो दिन और बढ़ा दी. इस तरह उनकी कुल हिरासत सात दिन हो गई, जो बुधवार को खत्म हो रही है. 
क्या है एसईएम कोर्ट?
अब जानते हैं एसईएम कोर्ट है क्या… एसईएम का मतलब होता है स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट. वैसे जब दास को यहां ले जाया जा रहा था तो उन्होंने एसईएम को ‘पुलिस कोर्ट’ कहा था. साथ ही कहा था कि यहां कोई न्याय नहीं है. यहां का मुख्य काम सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए एहतियाती कदम उठाना है. यहां के मजिस्ट्रेट की शक्तियां काफी सीमित रहती है. मजिस्ट्रेट शांति भंग होने से रोकने के लिए कुछ शक्तियों का इस्तेमाल कर सकते हैं, लेकिन वे मुकदमों की सुनवाई नहीं कर सकते. कई बार कोर्ट ने भी इनकी शक्तियों के इस्तेमाल के तरीके पर सवाल उठाए हैं.
बता दें कि बीएनएसएस की धारा 126 से 143 तक एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट को यह अधिकार है कि वह सार्वजनिक शांति भंग होने की आशंका पर किसी व्यक्ति से बॉन्ड भरवा सकता है. जब कोई व्यक्ति इस पीस बॉन्ड का उल्लंघन करता है, तो मजिस्ट्रेट धारा 130 के तहत जांच शुरू करता है. यानी एसईएम का काम बॉन्ड भरवाने या उसके उल्लंघन तक ही सीमित होता है. 
कई बार एसईएम का दफ्तर किसी थाने में रखा जाता है, इसलिए उसे “थाने का एसईएम कोर्ट” कहा जाता है. उदाहरण के लिए, सौरव दास और आशुतोष रांका की सुनवाई मंदिर मार्ग पुलिस स्टेशनमें स्थित एसईएम कोर्ट में हुई. इसका मतलब ये नहीं है कि एसईएम का क्षेत्र आमतौर पर इलाके/डिस्ट्रिक्ट के हिसाब से होती है, न कि हर थाने के लिए अलग-अलग. 
क्या ये सामान्य कोर्ट से अलग है?
जी हां, ये सामान्य कोर्ट से काफी अलग है. सामान्य कोर्ट अपराध की सुनवाई करके तय करती है कि आरोपी दोषी है या नहीं, जबकि एसईएमस का मुख्य काम संभावित शांति भंग रोकने के लिए एहतियाती कार्रवाई करना है. एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट सरकार के अधीन काम करते हैं और उनके पास न्यायिक शक्तियां नहीं होतीं. उनकी पदोन्नति, वेतन बढ़ोतरी और सेवा में वरिष्ठता उनके विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों पर निर्भर करती है. परंपरागत रूप से एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट राजस्व या प्रशासनिक अधिकारी होते हैं. 
दिल्ली में दिल्ली पुलिस अधिनियम केंद्र सरकार को यह अधिकार देता है कि वह पुलिस आयुक्त और एसीपी रैंक से नीचे के न होने वाले अधीनस्थ अधिकारियों को जिला मजिस्ट्रेट और कार्यकारी मजिस्ट्रेट की शक्तियों का इस्तेमाल करने के लिए अधिकृत कर सकती है. न्यायिक मजिस्ट्रेट न्यायपालिका के अधीन होते हैं, जिसका प्रशासनिक नियंत्रण हाई कोर्ट के पास होता है. वे मुकदमों की सुनवाई कर सकते हैं.
 
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