बीजिंग/नई दिल्ली: भारत और चीन के बीच रिश्तों में सुधार देखा जा रहा है. सोमवार को भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने चीनी विदेश मंत्री वांग यी से मुलाकात की. मुलाकात के दौरान चीन और भारत ने आपसी समझ और समर्थन को बढ़ावा देने के लिए और अधिक ठोस उपाय तलाशने का आह्वान किया. हालांकि दोनों देशों की ओर से जारी आधिकारिक बयान को ध्यान से देखने पर ऐसा लगता है, जैसे भारत ने शंघाई सहयोग संगठन (SCO) में कम दिलचस्पी दिखाई हुई है. दरअसल चीन के विदेश मंत्रालय और भारत में चीनी दूतावास की ओर से जारी बयान में SCO का जिक्र किया गया है. लेकिन भारत की ओर से इस यात्रा को लेकर दिए गए बयान में SCO का नाम भी नहीं है.
चीन ने अपने बयान के सबसे पहले ही पॉइंट में कहा, ‘भारत शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के रोटेटिंग अध्यक्ष के रूप में चीन के काम का पूरा समर्थन करने को तैयार है और एससीओ के ढांचे के तहत चीन की ओर से आयोजित विभिन्न गतिविधियों में सक्रिय रूप से भाग लेगा.’ लेकिन भारत के बयान में SCO का नाम नहीं लिया गया. इसके पीछे का सबसे पहला कारण यह हो सकता है कि चीन इस बार SCO का अध्यक्ष है. संभव है कि इसीलिए चीन ने अपने बयान में इसे प्रमुखता दी है.
क्या है SCO?
SCO का पूरा नाम शंघाई सहयोग संगठन है. सदस्य देशों के बीच सहयोग और शांति को बढ़ावा देने के लिए इसे बनाया गया था. SCO के 10 सदस्य हैं. चीन, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, रूस, तजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, भारत, पाकिस्तान, ईरान और बेलोरूस इसके सदस्य हैं. साल 2017 में भारत इसका सदस्य बना था. तब चीन ने पाकिस्तान को भी इसमें शामिल कराया था. इस ग्रुप के ज्यादातर सदस्य सेंट्रल एशिया के देश हैं, जिनका झुकाव रूस और चीन की तरफ है. अमेरिका इसे भी एक पश्चिम विरोधी गुट की तरह देखता है. ऐसे में भारत के लिए बैलेंस बनाना जरूरी होता है.
एससीओ से भारत ने बनाई दूरी?
साल 2022 में उज्बेकिस्तान में हुआ शिखर सम्मेलन आखिरी मौका था जब पीएम मोदी व्यक्तिगत रूप से इसमें शामिल हुए थे. 2023 में भारत एससीओ का अध्यक्ष था, तब ये मीटिंग भारत ने वर्चुअल तरीके से कराई थी. 4 जुलाई 2024 को SCO के हेड ऑफ स्टेट की 24वीं मीटिंग कजाकिस्तान में हुई, जिसमें विदेश मंत्री डॉ. जयशंकर शामिल हुए थे. वहीं अक्टूबर 2024 में पाकिस्तान में हुई मीटिंग में भी डॉ. जयशंकर ने ही भारत का नेतृत्व किया. पीएम मोदी के दोनों मीटिंग में शामिल न होने के बाद सवाल उठे थे कि क्या भारत एससीओ के प्रति गंभीर नहीं है? हालांकि एक्सपर्ट्स का मानना है कि ऐसा बिल्कुल नहीं है. क्योंकि भारत मध्य एशिया को अपना विस्तारित पड़ोस मानता है. SCO इससे जुड़ने का सबसे अच्छा माध्यम है. अमेरिका का मानना है कि चीन के लिए यह ग्रुप बेहद जरूरी है. अमेरिका 2005 से SCO का पर्यवेक्षक बनना चाहता है, जिसे चीन ब्लॉक करता आया है. चीन में होने वाले SCO शिखर सम्मेलन में भारत किस तरह शामिल होगा यह आने वाली बात होगी.