यूरोप से भिड़ गया भारत- गरीब देशों को तुमने धेला तक नहीं दिया, 100 अरब देने की बात हुई थी – Hindustan

केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए विकासशील देशों को आर्थिक और तकनीकी मदद देने के वादे पर विकसित देशों को जमकर सुनाया। उन्होंने कहा कि विकसित देशों ने दशकों तक दुनिया के पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई, लेकिन विकासशील देशों की मदद करने की अपनी प्रतिबद्धता पूरी नहीं की।
बर्लिन ग्लोबल डायलॉग में एक गोलमेज चर्चा को संबोधित करते हुए गोयल ने कहा कि विकसित देशों और यूरोपीय संघ को बताना चाहिए कि उन्होंने जलवायु फंडिंग से जुड़े अपने वादे को पूरा करने के लिए क्या किया है। केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने गरीब देशों के हित में खूब आवाज उठाई। उन्होंने यूरोपीय पैनल से साफ कहा कि आप खुद तो कार्बन उत्सर्जन करके अमीर हो गए लेकिन अब आप गरीब देशों पर प्रतिबंध चाहते हैं। उन्होंने कहा कि 2015 में पेरिस जलवायु सम्मेलन के दौरान विकासशील देशों की मदद के लिए हर साल 100 अरब डॉलर देने की प्रतिबद्धता जताई गई थी, लेकिन 11 साल बाद भी इस दिशा में कोई ठोस मदद नहीं मिली।
पीयूष गोयल ने कहा कि 2015 में पेरिस में आयोजित जलवायु सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ग्लोबल साउथ के देशों को एकजुट करने और जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए सामूहिक प्रयासों को प्रोत्साहित करने में अहम भूमिका निभाई थी।
गोयल के मुताबिक, उस समय यह सहमति बनी थी कि विकसित देश विकासशील और कम विकसित देशों के साथ-साथ प्रशांत और कैरेबियाई क्षेत्र के द्वीपीय देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद करेंगे। इसके लिए हर साल 100 अरब डॉलर देने का लक्ष्य रखा गया था। उन्होंने कहा, ‘‘11 साल बाद भी हमें उसकी फूटी कौड़ी तक नहीं मिली। सिर्फ वादे किए गए।’’ वाणिज्य मंत्री ने कहा कि यूरोपीय संघ और कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (सीबीएएम) से जुड़े सवालों का भी पर्याप्त जवाब नहीं मिला है।
जलवायु वित्त को लेकर विकसित देशों की प्रतिबद्धता का जिक्र करते हुए गोयल ने पहले किए गए वादों की ओर ध्यान दिलाया। संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क कन्वेंशन (यूएनएफसीसीसी) के तहत 2009 में कोपेनहेगन में आयोजित कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज (सीओपी15) में विकसित देशों ने विकासशील देशों की जरूरतों को पूरा करने के लिए 2020 तक संयुक्त रूप से हर साल 100 अरब डॉलर जुटाने की प्रतिबद्धता जताई थी।
हालांकि, विकसित देश इस लक्ष्य को समय पर पूरा नहीं कर सके। इसके बाद 2015 में पेरिस में आयोजित सीओपी21 के दौरान इस लक्ष्य को 2025 तक जारी रखने का फैसला किया गया था। गोयल ने कहा कि विकसित देश अब भी कम विकसित देशों की जरूरतों को पूरा करने और उन्हें कार्बन उत्सर्जन घटाने के प्रयासों में पर्याप्त सहयोग देने में नाकाम रहे हैं।
पीयूष गोयल ने विकसित देशों के ऐतिहासिक कार्बन उत्सर्जन और भारत जैसे विकासशील देशों की स्थिति के बीच अंतर का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि भारत दुनिया की करीब 17 फीसदी आबादी का प्रतिनिधित्व करता है, लेकिन वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में उसका योगदान 3 फीसदी से भी कम है। उन्होंने यूरोप का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां दुनिया की आबादी का लगभग 3 से 4 फीसदी हिस्सा रहता है, लेकिन वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में उसका योगदान काफी अधिक है।
गोयल ने कहा कि जलवायु संकट के लिए जिम्मेदार देशों को अपनी भूमिका स्वीकार करनी चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि वातावरण में कार्बन किसने छोड़ा और ओजोन परत को नुकसान पहुंचाने में किसकी भूमिका रही।
गोयल ने कहा कि आज भी भारत का प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन यूरोप के मुकाबले काफी कम है। उनके मुताबिक, यूरोप का प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन और पर्यावरण पर प्रति व्यक्ति प्रभाव भारत की तुलना में लगभग सात से आठ गुना है। उन्होंने कहा कि भारत दुनिया की 17 फीसदी आबादी की जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ संसाधनों की बर्बादी रोकने और सर्कुलर इकोनॉमी को बढ़ावा देने के प्रति भी सजग है।
पीयूष गोयल ने कहा कि भारत को 140 करोड़ लोगों की ऊर्जा और खाद्य जरूरतों को पूरा करने के साथ देश की सुरक्षा भी सुनिश्चित करनी है। इन चुनौतियों के बावजूद भारत दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते स्वच्छ ऊर्जा कार्यक्रमों में से एक पर काम कर रहा है।
उन्होंने कहा कि विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अपनी विकास संबंधी जरूरतों को भी ध्यान में रखना पड़ता है। ऐसे में विकसित देशों को आर्थिक और तकनीकी सहायता देने के अपने वादों को पूरा करना चाहिए।
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