महाराष्ट्र सरकार ने सूखे से प्रभावित किसानों और पशुपालकों के लिए 'मिशन मुरघास' योजना शुरू की है। यह योजना साइलेज …और पढ़ें
फडणवीस सरकार ने शुरू की ‘मिशन मुरघास’ योजना (AI से बनाई गई सांकेतिक तस्वीर)
सूखे से प्रभावित किसानों के लिए ‘मिशन मुरघास’ योजना शुरू।
साइलेज खरीद पर 3 रुपये प्रति किलो की सब्सिडी मिलेगी।
मराठवाड़ा और विदर्भ के 19 जिलों पर विशेष ध्यान।
डिजिटल डेस्क, मुंबई। सूखे के संकट से जूझ रहे महाराष्ट्र के किसानों और पशुपालकों के लिए राज्य सरकार ने एक बहुत बड़ी राहत भरी पहल की है। सूखे के कारण चारे की कमी और दूध उत्पादन पर पड़ने वाले असर से निपटने के लिए राज्य के पशुपालन विभाग ने ‘मिशन मुरघास’ की शुरुआत की है।
सामने आई जानकारी के अनुसार, इस योजना का मुख्य फोकस मराठवाड़ा और विदर्भ के उन 19 जिलों पर है, जहां डेयरी फार्मिंग ग्रामीण आजीविका का एक बहुत बड़ा और मजबूत सहारा है।
बता दें कि ‘मागेल त्याला मुरघास’ योजना के तहत पात्र दुग्ध उत्पादकों और पशुपालकों को साइलेज खरीदने पर 3 रुपये प्रति किलो की सब्सिडी दी जाएगी। यह सब्सिडी प्रति पशु प्रति दिन 5 किलोग्राम चारे की जरूरत के हिसाब से 90 दिनों के लिए तय की गई है।
बता दें कि योजना का लाभ लेने के लिए लाभार्थियों को साइलेज खरीदने का प्रमाण देना होगा, जिसके बाद सब्सिडी की राशि डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) के जरिए सीधे उनके बैंक खातों में भेज दी जाएगी।
पशुपालन आयुक्त किरण पाटिल के मुताबिक, इस विकट सूखे के संकट से किसानों को उबारने के लिए यह कदम उठाया गया है। इसके अलावा विदर्भ-मराठवाड़ा डेयरी विकास परियोजना के दूसरे चरण के तहत, सरकार ने चारे की खेती और साइलेज उत्पादन के लिए 76.41 करोड़ रुपये का अतिरिक्त फंड मंजूर किया है।
यह राशि 2026-27 के खरीफ सीजन के लिए चारे के बीज वितरण और डेयरी विकास परियोजना के तहत पहले ही आवंटित किए गए 51.20 करोड़ रुपये के बजट के अलावा है।
गौरतलब है कि मक्का, ज्वार और नेपियर घास जैसी हरी फसलों को हवामुक्त परिस्थितियों में किण्वन के जरिए लंबे समय तक सुरक्षित रखने की प्रक्रिया को साइलेज या मुरघास कहा जाता है।
ऐसे में सूखे या चारे की कमी के लंबे दौर में जब हरी घास मिलना मुश्किल हो जाता है, तब यह संरक्षित चारा पशुओं की सेहत और दूध के उत्पादन को बनाए रखने में बेहद मददगार साबित होता है।
इस योजना से किसानों को संकट के समय महंगे दामों पर पशु आहार खरीदने की मजबूरी से राहत मिलेगी और वे अपने दुधारू पशुओं की उत्पादकता बरकरार रख सकेंगे।
इतना ही नहीं योजना को धरातल पर सफल बनाने के लिए पशुपालन विभाग, डेयरी सहकारी समितियों, महिला स्व-सहायता समूहों (SHGs) और कृषि विज्ञान केंद्रों के जरिए गांव-गांव में प्रशिक्षण शिविर और प्रदर्शन आयोजित किए जाएंगे। इसमें किसानों को चारा काटने, उसे कॉम्पैक्ट करने और हवामुक्त रखने की सही तकनीकों के बारे में सिखाया जाएगा।