भारत में 12 साल में करीब 50 करोड़ लोग गरीबी से निकले बाहर, विश्व बैंक की रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा – Jagran

विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने पिछले 12 वर्षों में लगभग 50 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकाला है।
 भारत में 12 साल में 50 करोड़ लोग गरीबी से उबरे। (फोटो- AI जेनरेटेड)
पिछले 12 वर्षों में 50 करोड़ लोग गरीबी से बाहर आए।
विश्व बैंक की रिपोर्ट ने भारत की प्रगति को सराहा।
मजबूत खपत, रोजगार और खाद्य सब्सिडी ने योगदान दिया।
जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। दुनिया के सामने जब गरीबी, भुखमरी और आर्थिक असमानता बड़ी चुनौती बनी हुई है, तब भारत ने इस मोर्चे पर ऐसी उपलब्धि हासिल की है, जिसने वैश्विक स्तर पर उसका ध्यान खींचा है।
दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देश भारत ने साबित किया है कि मजबूत आर्थिक विकास और जनकल्याणकारी योजनाओं के मेल से बड़े पैमाने पर गरीबी के दुष्चक्र को तोड़ा जा सकता है।
विश्व बैंक की ताजा रिपोर्ट ने भी भारत की इस प्रगति पर मुहर लगाई है। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 12 वर्षों में करीब 50 करोड़ लोग गरीबी से उबरे हैं। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस उपलब्धि को पीएम नरेन्द्र मोदी के कुशल नेतृत्व का परिणाम बताया है। उन्होंने कहा कि सरकार के निरंतर नीतिगत प्रयासों से ठोस परिणाम मिल रहे हैं, जिससे समावेशी विकास और अधिक आर्थिक अवसरों की नींव मजबूत हो रही है।
विश्व बैंक की अक्टूबर 2026 की ‘पावर्टी एंड इक्विटी ब्रीफ’ के अनुसार, 2011 से 2023 के बीच भारत में निम्न-मध्यम आय वर्ग की गरीबी रेखा से नीचे रहने वाली आबादी 57.7 प्रतिशत से घटकर 16.1 प्रतिशत रह गई। इस दौरान करीब 49.6 करोड़ लोग गरीबी के दायरे से बाहर आए। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में अत्यधिक गरीबी में रहने वाले लोगों की आबादी भी 2011 के 27.1 प्रतिशत से घटकर 2023 में महज 2.6 प्रतिशत रह गई है।
विश्व बैंक ने इस उपलब्धि के पीछे तीन प्रमुख कारण बताए हैं। इनमें मजबूत खपत वृद्धि, रोजगार के अवसरों में इजाफा और खाद्य सब्सिडी जैसी सामाजिक सहायता योजनाओं का विस्तार शामिल है। खासकर महिलाओं की रोजगार में बढ़ती भागीदारी ने इस बदलाव को गति दी है।
विश्व बैंक की गणना क्रय शक्ति समानता (पीपीपी) के आधार पर होती है। इसके तहत निम्न-मध्यम आय वर्ग की गरीबी रेखा 4.20 डालर प्रतिदिन निर्धारित है, जबकि अत्यधिक गरीबी की रेखा तीन डालर प्रतिदिन है। पीपीपी के आधार पर अलग-अलग देशों की वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों को ध्यान में रखकर लोगों की वास्तविक क्रय क्षमता का आकलन किया जाता है।
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में गरीबी आगे भी घटने का अनुमान है, लेकिन इसकी रफ्तार कुछ धीमी रह सकती है। अनुमान है कि 4.20 डालर प्रतिदिन वाली गरीबी रेखा के आधार पर गरीबी दर 2028 तक घटकर 12.1 प्रतिशत रह सकती है। हालांकि, ये अनुमान हैं और नए आर्थिक तथा श्रम बाजार के आंकड़ों के आधार पर इनमें बदलाव संभव है।
रिपोर्ट यह भी बताती है कि गरीबी अब उन परिवारों में अधिक केंद्रित होती जा रही है, जहां शिक्षा का स्तर कम है, संपत्ति सीमित है और स्थायी रोजगार के अवसरों तक पहुंच नहीं है। आय की असमानता भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। वर्ष 2023 में सबसे अधिक कमाई करने वाले 10 प्रतिशत श्रमिकों की औसत आय सबसे कम कमाई वाले 10 प्रतिशत श्रमिकों से करीब 13 गुना अधिक थी।
ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में गरीबी कम हुई है, लेकिन ग्रामीण भारत में सुधार की गति अधिक रही। इससे दोनों के बीच गरीबी का अंतर काफी घटा है। इसके बावजूद देश के अधिकांश गरीब अब भी ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं, जहां उत्पादकता कम और बेहतर गैर-कृषि रोजगार के अवसर सीमित हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर प्रदेश से पश्चिम बंगाल तक फैले राज्यों के एक बड़े हिस्से में देश के कुल गरीबों की करीब 57 प्रतिशत आबादी रहती है। ऐसे में गरीबी घटाने के अगले चरण में इन क्षेत्रों में उत्पादक रोजगार पैदा करना महत्वपूर्ण होगा।
रिपोर्ट के मुताबिक, 2017 से 2023 के बीच देश में करीब 13.4 करोड़ अतिरिक्त रोजगार के अवसर बने। यह कामकाजी उम्र की आबादी में हुई वृद्धि से लगभग दोगुना था।
इसमें ग्रामीण महिलाओं की बढ़ती भागीदारी का विशेष योगदान रहा। बड़ी संख्या में महिलाएं भुगतान वाले काम से जुड़ीं, जिससे परिवारों की आय और कमाने वालों की संख्या दोनों में बढ़ोतरी हुई।
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