भारत में मिठाइयों का कारोबार 50,000 करोड़ रुपये से अधिक का है, जिसमें कई दुकानें सदियों पुरानी परंपरा और स्वाद …और पढ़ें
भारत के सबसे पुराने हलवाई कौन? (AI फोटो)
भारत में मिठाई का कारोबार 50,000 करोड़ रुपये से अधिक
आगरा का भगत हलवाई 1795 से स्वाद परोस रहा है
केसी दास ने 1930 में कैन पैक रसगुल्ला लॉन्च किया
बिजनेस डेस्क, नई दिल्ली। भारत में मिठाइयों का कारोबार सिर्फ स्वाद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके साथ सैकड़ों साल पुरानी परंपराएं और कारोबारी विरासत भी जुड़ी हुई हैं। त्योहार हो, शादी-ब्याह हो या कोई खास जश्न, मिठाई के बिना हर खुशी अधूरी मानी जाती है। यही वजह है कि देश में मिठाइयों का कारोबार करीब 50000 करोड़ रुपये से ज्यादा का आंका जाता है।
धनतेरस, दिवाली (Diwali 2026) और नए साल जैसे मौकों पर इसकी मांग और तेजी से बढ़ती है। लेकिन इस चमकते बाजार में कुछ ऐसे नाम भी हैं, जिन्होंने आज से दो-तीन सदियों पहले अपने छोटे से कारोबार की शुरुआत की थी। दिलचस्प बात यह है कि इनमें से कई दुकानें आज भी ग्राहकों को अपने पुराने स्वाद का अहसास करा रही हैं। आइए जानते हैं देश की कुछ ऐसी ही ऐतिहासिक मिठाई की दुकानों के बारे में।
आगरा की पहचान सिर्फ ताजमहल और पेठे तक सीमित नहीं है। यहां 1795 में शुरू हुआ भगत हलवाई भी अपनी अलग पहचान रखता है। लेख राज भगत ने इस मिठाई की दुकान की नींव रखी थी। 231 साल का सफर पूरा कर चुका यह कारोबार आज भी मिठाइयों के साथ स्नैक्स के बाजार में सक्रिय है।
यहां अलग-अलग तरह की मिठाइयां 322 से 1000 रुपये से अधिक तक के पैक में उपलब्ध हैं। इतने लंबे समय बाद भी इस नाम का कारोबार में बने रहना इसकी खास पहचान है।
घसीटाराम स्वीट्स की कहानी भारत-पाकिस्तान के बंटवारे से भी जुड़ी हुई है। इस कारोबार की शुरुआत 1916 में घसीटाराम दास बजाज ने कराची में की थी। उस समय कराची अविभाजित भारत का हिस्सा था। 1947 में देश के बंटवारे के बाद परिवार को अपना कारोबार नए सिरे से खड़ा करना पड़ा।
इसके बाद उनके बेटे गोवर्धनदास बजाज ने मुंबई में इस बिजनेस को दोबारा शुरू किया। आज यह ब्रांड बेसन के लड्डू, पेड़ा, काजू कतली समेत कई पारंपरिक मिठाइयों के लिए जाना जाता है।
मुंबई की पारसी डेयरी फार्म ने भी 1916 में अपने सफर की शुरुआत की थी। यह दुकान केवल मिठाइयों की दुकान नहीं, बल्कि पारंपरिक डेयरी उत्पादों के लिए भी जाना जाता है। यहां ताजा दूध और पुराने पारसी डेयरी व्यंजनों के साथ 80 से ज्यादा किस्मों की मिठाइयां मिलती हैं। समय के साथ खानपान की पसंद बदली, लेकिन इस डेयरी फार्म ने अपने पारंपरिक उत्पादों की पहचान बनाए रखी है।
दिल्ली के चांदनी चौक की गलियों में खानपान के कई पुराने ठिकाने मौजूद हैं। इन्हीं में एक नाम कंवरजी मिठाई वालों का भी है। इसकी शुरुआत 1850 में हुई थी। पराठे वाली गली के आसपास स्थित इस दुकान की खास पहचान इसका पिस्ता लौज है। पुरानी दिल्ली की खानपान संस्कृति में इस दुकान का अपना अलग स्थान है और इसकी विरासत 170 साल से भी ज्यादा पुरानी है।
कोलकाता की मिठाइयों का जिक्र रसगुल्ले के बिना पूरा नहीं हो सकता। इसी रसगुल्ले को नई पहचान देने वाले नामों में केसी दास का महत्वपूर्ण स्थान है। इस कारोबार की शुरुआत 1866 में हुई थी। इसके फाउंडर केसी दास के नाम से जुड़ी सबसे बड़ी उपलब्धियों में 1930 में कैन पैक रसगुल्ला लॉन्च करना शामिल है। इस पहल ने रसगुल्ले को सिर्फ दुकान तक सीमित रखने के बजाय दूर-दराज के बाजारों तक पहुंचाने का रास्ता खोला।
पुरानी दिल्ली के चांदनी चौक में मौजूद चैना राम सिंधी कन्फेक्शनर्स की कहानी भी देश के बंटवारे से जुड़ी है। इस दुकान की शुरुआत 1947 में हुई थी, लेकिन इसका इतिहास इससे पहले लाहौर के अनारकली बाजार से जुड़ा हुआ है। विभाजन के बाद कारोबार दिल्ली पहुंचा और चांदनी चौक में इसकी नई पहचान बनी। इस तरह एक शहर से दूसरे शहर तक पहुंची मिठाई की यह दुकान आज भी अपनी पुरानी कारोबारी विरासत के लिए जानी जाती है।
पंजाबी चंदू हलवाई की शुरुआत 1896 में हुई थी। इसके फाउंडर चंदूलाल बहल कराची से मुंबई आए थे और यहां उन्होंने मिठाइयों का कारोबार खड़ा किया। समय के साथ इस दुकान ने अपनी अलग पहचान बनाई। इसकी सिंधी जलेबी खास तौर पर लोकप्रिय है। पारंपरिक स्वाद और पुराने तौर-तरीकों से जुड़ी पहचान ने इस प्रतिष्ठान को मुंबई की पुरानी मिठाई दुकानों में शामिल किया है।
चेन्नई की बाशा हलवावाला दुकान करीब 85 साल पुरानी है। यहां मिलने वाला ‘दम का रोस्ट’ खास आकर्षण है, जिसे शहद में तैयार किया जाता है। हलवे की इस खास किस्म के अलावा दुकान पर कई अन्य वैरायटी भी उपलब्ध हैं। इनकी कीमत लगभग 480 से 700 रुपये प्रति किलो तक बताई जाती है। दक्षिण भारत की मिठाई परंपरा में इस दुकान ने अपनी एक अलग जगह बनाई है।
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