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दो दशक पहले आई सुनामी में अपना सबकुछ गंवा देने वाली वासुकी विनोथी अब छात्रों के लिए उम्मीद की किरण बन गई हैं. नई पीढ़ी को अच्छा भविष्य मिले वो उसके लिए मुफ्त कोचिंग सेंटर चला रही हैं. वासुकी तटीय और आदिवासी क्षेत्रों के छात्रों के लिए UPSC और TNSPC की तैयारी कराती हैं. वो अपनी पहल से तटीय क्षेत्र के छात्रों के लिए आशा की अलख बनी हैं.
वो जब 15 साल की थीं तब उनका जीवन हमेशा के लिए बदल गया. उन्होंने उस समय को याद करते हुए कहा कि मैं अपनी झोपड़ी के अंदर थी, तभी तेज़ आवाज़ सुनी, मुझे लगा कि यह बम विस्फोट है लेकिन जब मैं अपनी झोपड़ी से बाहर आई, तो मैंने देखा कि पानी का विशाल लहर मेरी ओर बढ़ रहा था और एक पल में ही सब कुछ ख़त्म हो गया.
नियति ने सब कुछ बदल दिया
वासुकी विनोथी ने उस समय को याद करते हुए कहा कि मैं जब होश में आई, मैंने अपने दोस्तों, पड़ोसियों और रिश्तेदारों को डूबे हुए देखा, उन सबकी मौत हो गई थी. एक और विशाल लहर हमारे पास आई, मैं मौत की ओर देख रही थी लेकिन बुजुर्गों ने मुझे बाहर निकाला और सुरक्षित स्थान पर ले गए. उन्होंने आगे कहा कि ये 26 दिसंबर था और नियति ने सब कुछ बदल दिया था.
वासुकी विनोथी ने कहा कि दो साल तक हमारे पास कुछ नहीं था. हमारी नावें, जाल, झोपड़ी, सब कुछ नष्ट हो गया था. हर दिन हमें अपना पेट भरने के लिए किसी न किसी पर निर्भर रहना पड़ता था. अनगिनत बार मैं भोजन की प्रतीक्षा में हाथ में थाली लेकर कतार में खड़ी हुई हूं.
समाज में कई तरह की बाधाएं थी
वासुकी ने कहा कि फिर मैंने अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करना शुरू किया और एक प्रतिभाशाली छात्रा बनीं. लेकिन संघर्ष यहीं ख़त्म नहीं हुआ. हमारा समुदाय बहुत एकांत है और दूसरों के साथ ज्यादा बातचीत नहीं करता है, मेरा गांव, अक्कराईपट्टी तीन तरफ से नदी और चौथे छोर पर समुद्र से घिरा हुआ था. जब मैं तीन साल की थी तब मैंने अपनी माँ को खो दिया. वह बच्चे को जन्म देते समय मर गई और मेरा भाई भी जीवित नहीं बचा.
हमारे समुदाय में अधिकांश के केवल एक ही माता-पिता थे क्योंकि महिलाएं स्वास्थ्य समस्याओं के कारण मर जाती थीं जबकि पुरुष समुद्र में तूफान या लंकाई नौसेना का सामना करते हुए मर जाते थे. इन सभी बाधाओं के बावजूद मैंने पढ़ाई की लेकिन मुझे अभी भी एक बड़ी बाधा, हमारे समुदाय की सामाजिक संरचना, को पार करना था.
‘आईआईटी मद्रास से बी.टेक किया’
वासुकी जिस समुदाय से आती हैं, वहां लड़की के युवावस्था में पहुंचते ही उसकी शादी कर दी जाती है. उन्होंने अपने अतीत को याद करते हुए कहा कि कल्पना कीजिए कि मुझे कितने लोगों को समझाना पड़ा होगा. उन्होंने कहा कि मैंने अपने भाई आग्रह किया वो कि मुझे चेन्नई ले कर चले, भाई तैयार हो गया और मैने छात्रवृत्ति के माध्यम से आईआईटी मद्रास से बी.टेक और एमएस की पढ़ाई पूरी की.मैं ऐसा करने वाली अपने समुदाय की पहली महिला थी. हालांकि छह साल बाद मैं अपने मछली पकड़ने वाले गांव में वापस चली गई.
यह समझते हुए कि अकेले अच्छी शिक्षा प्राप्त करना भर पर्याप्त नहीं है, वासुकी ने कमजोर समुदाय के लोगों को मुफ्त शिक्षा देने के लिए एक कोचिंग सेंटर शुरू किया. वासुकी ने कहा मैंने नौ साल पहले 400 वर्ग फुट के एक कमरे में नौ छात्रों के साथ यह कोचिंग सेंटर शुरू किया था और अब मैं एक कोचिंग सेंटर चलाती हूं, जहां 200 से अधिक छात्र पढ़ने आते हैं.
‘तटीय क्षेत्रों में साक्षरता बहुत कम है’
वासुकी तटीय क्षेत्र के छात्रों को मुफ्त कोचिंग प्रदान करने के लिए ‘मुथु चिपिगल’ (Pearls and Seashells) नामक एक कार्यक्रम शुरू किया है. उनका कहना है कि हालांकि राज्य में साक्षरता का स्तर ऊंचा है, लेकिन तटीय क्षेत्रों में साक्षरता दुर्भाग्य से बहुत कम है. मैं इसे बदलना चाहता थी और इसीलिए मुथु चिपिगल कार्यक्रम शुरू किया. अब तक 52 छात्रों ने ग्रुप 4 टीएनपीएससी परीक्षा उत्तीर्ण की है और यह एक बड़ी उपलब्धि है.
आप पूछ सकते हैं कि वे यूपीएससी क्यों नहीं पास कर पाए, उनका सपना तो है लेकिन वे ऐसी जगह से आते हैं जहां कुछ भी नहीं है. जब मैं छोटी थी, तो मुझसे कहा गया था कि जब मेरे पिता समुद्र में जाएं तो एक दीपक जलाएं और उनके लौटने तक उसे जलाए रखें. यहीं से हम आते हैं. हर दिन एक संघर्ष था.
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