पहलगाम नरसंहार के बाद भारत ने जो कार्रवाई की, उसने पाकिस्तान की हालत ऐसी कर दी है कि प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ अब दुनिया भर में शांति की मिन्नतें करते फिर रहे हैं. तुर्की और ईरान के बाद अब अजरबैजान जाकर भी उन्होंने वही राग अलापा- शांति चाहिए. बातचीत चाहिए. और सबसे बड़ी बात. सिंधु जल संधि को लेकर फिर से वही पुराना रोना. भारत ने ऐसी नस पकड़ ली है कि पाकिस्तान का दम निकल रहा है. उसके पास घुटने टेकने के अलावा और कोई चारा नहीं बचा है.
अजरबैजान के लाचिन शहर में पाकिस्तान-तुर्की और अजरबैजान की त्रिपक्षीय बैठक में शरीफ ने खुले तौर पर भारत से बातचीत की अपील की. लेकिन ये अपील नहीं. एक तरह की मजबूरी थी. क्योंकि भारत ने आतंक के खिलाफ जैसे नकेल कसी है. उससे पाकिस्तान पूरी तरह से कूटनीतिक घेराबंदी में आ गया है. शरीफ ने फिर वही घिसा-पिटा आरोप दोहराया, भारत बिना सबूत के पाकिस्तान को बदनाम कर रहा है. पहलगाम हमले के पीछे पाकिस्तान का हाथ कहने से पहले भारत को कोई सबूत तो देना चाहिए था. इतना ही नहीं. उन्होंने ये भी कहा कि पाकिस्तान जांच में सहयोग करना चाहता था लेकिन भारत ने प्रस्ताव ठुकरा दिया.
‘पानी’ पर फिर शुरू हुआ पाकिस्तानी प्रलाप
शरीफ ने एक बार फिर सिंधु जल संधि की दुहाई दी. बोले, भारत पाकिस्तान का पानी रोकना चाहता है. इसे हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है. लेकिन पाकिस्तान इसे कभी कामयाब नहीं होने देगा. यह हमारे 24 करोड़ लोगों की जीवनरेखा है. यही लाइन वे तुर्की और ईरान में भी दोहरा चुके हैं. अब अजरबैजान में भी वही स्क्रिप्ट पढ़ी.
भारत की नीति से हिल गई पाकिस्तान की जमीन
विश्लेषक मानते हैं कि भारत ने आतंक पर सख्त रवैया अपनाकर पाकिस्तान की कूटनीतिक जमीन खिसका दी है. ऑपरेशन सिंदूर जैसे अभियान और पाकिस्तान की छवि को दुनिया में बेनकाब करने वाली रणनीति ने उसे अकेला कर दिया है. मजबूरन शरीफ अब ‘शांति शांति’ की रट लगाए घूम रहे हैं.
अब पाकिस्तान की कूटनीति नहीं. मजबूरी बोल रही है
जिस पाकिस्तान की फौज अब तक परमाणु बम की धमकी देती थी. वो आज फाइबर ऑप्टिक ड्रोन और पानी रोकने के डर से बिलबिला रहा है. आर्थिक बदहाली. कूटनीतिक अलगाव और भारत के सख्त रुख ने पाकिस्तान को अपने घुटनों पर ला दिया है. अब शरीफ के पास सिर्फ एक ही हथियार बचा है, शांति की भीख और अंतरराष्ट्रीय सहानुभूति की उम्मीद.