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34 साल के अतुल सुभाष ने बैंगलोर में सुसाइड कर लिया है. अतुल सुभाष पेशे से एआई इंजीनियर थे. उनके पास से एक सुसाइड नोट बरामद हुआ, जिस पर लिखा था ‘जस्टिस इस ड्यू’. इसमें उन्होंने अपनी पत्नी और उसके परिवार वालों पर गंभीर आरोप लगाए हैं. इसके आधार पर बेंगलुरु पुलिस ने जौनपुर की रहने वाली निकिता संघानिया और उसके परिवार वालों के खिालफ केस दर्ज कर लिया है.
इस बीच अतुल सुभाष के वकील दिनेश मिश्रा ने आजतक से खास बातचीत की. उन्होंने बताया कि 29 जुलाई 2024 को अतुल सुभाष के मामले का फैसला हुआ था, जिसमें बच्चे की परवरिश के लिए 40 हजार रुपये महीने देने का आदेश दिया गया था. ये पैसा मेंटेनेंस के रूप में व्योम सिंघानिया के खाते में ट्रांसफर किया जाना था. अतुल आखिरी बार जून में आए थे. इसके बाद जब जुलाई में केस का फैसला हुआ था तो वह नहीं आए थे.
वकील दिनेश मिश्रा ने बताया कि जब भी बातचीत होती थी तो ऐसा कोई भी चीज नहीं लगती थी कि वो डिप्रेशन में हैं. अतुल ने कहा था कि फैसला जो भी होगा हम उसका स्वागत करेंगे. मेरे जूनियर शैलेश शर्मा ने मामले की जजमेंट की कॉपी उनको डाक से भेजी थी.
जज पर लगाए आरोपों पर क्या बोले वकील
जज पर लगाए गए आरोपों पर अतुल के वकील ने कहा कि ये न्यायिक प्रक्रिया है और इसमें जज भी बंधे होते हैं. मामले में हाईकोर्ट से भी डायरेक्शन था कि इसे जल्दी निपटाया जाए. अब उन्होंने ऐसा सुसाइड नोट में लिखा हुआ है तो वह जांच का विषय है लेकिन हमने जो देखा है, उसके हिसाब से कोर्ट में उनके साथ कोई परेशानी नहीं थी. कोर्ट की तारीख को लेकर हाईकोर्ट का अगर कोई आदेश है तो उसका पालन करना होता है. इनको उस समय तारीखों पर आने में कोई परेशानी तो नहीं हुई थी.
वीडियो कॉन्फ्रेंस से तारीख पर हाजिर होने के प्रावधान पर वकील ने कहा कि हमारा जौनपुर जिला इतना समृद्ध नहीं है. वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए रूटिन सुनवाई नहीं हो सकती है. ये सिर्फ कुछ ही लोगों के लिए होता है. उनके भाई ने अब जो केस दर्ज कराया है, उस पर पुलिस को गहनता से जांच करनी चाहिए और नियमानुसार कार्रवाई करनी चाहिए. इस विषय में इनके परिजनों ने हमें अभी तक कोई बात नहीं की है. पुलिस जांच करेगी तो निश्चित रूप से तथ्य मिलेंगे. जून से हमारी न तो कोई मुलाकात हुई, और फिर जुलाई में फैसले के बाद बात भी नहीं हुई.
मुझसे मिलने के समय डिप्रेशन में नहीं थे अतुल
अतुल के वकील ने कहा कि जब हम लोग उनसे मिले थे तो वो डिप्रेशन में नहीं थे. रही बात बच्चे को 40 हजार रुपये महीना खर्चा देने की तो उसका रिविजन होता है हाईकोर्ट में. लेकिन ऐसी कोई लीगल एडवाइस हमसे अतुल ने नहीं ली. जजमेंट बिल्कुल सही हुआ था. केवल हो सकता है कि उन्हें मेंटेनेंस के रूप में 40 हजार रुपये ज्यादा लगे हो. लेकिन वो ठीक कराने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की जा सकती थी.
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