AI बच्चों की पढ़ाई आसान बना रहा या उन्हें 'भोंदू'? दुनिया भर में शुरू हुई ग्लोबल डिबेट – AajTak

Feedback
अब दौर बदल चुका है. मैथ या साइंस के न्यूमेरिकल के ल‍िए घंटों माथापच्ची नहीं करनी. इतिहास के ल‍िए रट्टा नहीं मारना… होमवर्क के ल‍िए पेरेंट्स से बहस भी बंद है. अब जमाना एआई का है. यहां चाहे किसी विदेशी भाषा के लेक्चर को समझना हो या कोई भी इन्फॉर्मेशन जाननी हो… बच्चों के पास सबसे बड़ा हथियार है, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI. लेकिन साथ में कई तरह के डर और सवाल भी उठ रहे हैं. इसे लेकर ग्लोबल ड‍िबेट हो रही है कि कहीं ये हथियार छात्रों की मौलिक बुद्धि यानी ओर‍िजिनल इंटेलिजेंस के लिए खतरा तो नहीं बन रहा? हाल ही में आए ग्लोबल डेटा और विशेषज्ञों की राय ने इस पर एक नई ‘ग्लोबल डिबेट’ छेड़ दी है. आइए समझते हैं. 
क्या सच में हम एआई पर डिपेंड हो रहे हैं? 
एजुकेशन फील्ड में AI वाकई वरदान जैसी द‍िखती है. अब’वर्डली’ जैसे प्लेटफार्म्स हैं जहां विदेशी भाषा के लेक्चर भी रीयल-टाइम में स्टूडेंट जिस भाषा को समझते हैं, उसी में अवेलेबल हैं. यूनिवर्सिटी ऑफ साउदर्न कैलिफोर्निया जैसे संस्थान इसका सफल उपयोग कर रहे हैं. लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू डराने वाला है. गैलप और कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी की एक हालिया स्टडी बताती है कि 57% छात्र अब हर हफ्ते AI टूल्स का इस्तेमाल कर रहे हैं.
क्या नई पीढ़ी ‘सोचना’ छोड़ रही है?
ग्लोबल टेक-साइंस मीडिया प्लेटफॉर्म ‘डिजिटल जर्नल’ के एक विश्लेषण के अनुसार, AI का अत्यधिक उपयोग छात्रों को ‘कॉग्निटिव ऑफलोडिंग’ की ओर धकेल रहा है. इसका सीधा मतलब यह है कि छात्र अब समस्याओं को सुलझाने के बजाय उत्तर जनरेट करने पर निर्भर हो गए हैं.
विशेषज्ञों ने AI के इस्तेमाल को लेकर बताए 3 बड़े खतरे
1. क्रिटिकल थिंकिंग का अंत
जब छात्र होमवर्क और निबंध (Essay) लिखने के लिए AI का उपयोग करते हैं, तो उनकी तर्क करने और खुद के विचार विकसित करने की क्षमता खत्म हो जाती है.
2. गलत जानकारी का भ्रम 
AI अक्सर ‘हैलुसिनेशन’ का शिकार होता है, यानी वह पूरे आत्मविश्वास के साथ गलत तथ्य पेश कर देता है, जिसे छात्र सच मान लेते हैं.
3. करियर पर खतरा
अगर छात्र एआई की मदद से डिग्री तो ले लेते हैं, लेकिन कार्यस्थल पर उन्हें बिना हेल्प के काम करना पड़ा, तो वे वहां पूरी तरह विफल साबित हो सकते हैं.
संस्थानों के पास नहीं है कोई ठोस नीति
हैरानी की बात यह है कि आधे से ज्यादा छात्रों का कहना है कि उनके स्कूलों या कॉलेजों में AI के इस्तेमाल को लेकर कोई साफ गाइडलाइन नहीं है. ऐसे में यह ‘शॉर्टकट’ पढ़ाई का तरीका छात्रों को भविष्य की चुनौतियों के लिए कमजोर बना सकता है.
एजुकेशन एक्सपर्ट्स का मानना है कि AI को स‍िर्फ एक अस‍िस्टेंट के रूप में इस्तेमाल करना चाहिए, न कि ‘ब्रेन’ के ऑप्शन के तौर पर.लेकिन असल में हो ये रहा है कि अब न स‍िर्फ स्टूडेंट्स बल्क‍ि घरों में पेरेंट्स और टीचर्स तक एआई से इंसानों की तरह काम ले रहे हैं. वो भूल जाते हैं कि ये इंटेल‍िजेंस आर्ट‍िफ‍िश‍ियल है, हम इंसानों की तरह ओर‍िजनल नहीं है. 
इस नई पीढ़ी को लेकर चिंता करना अच्छा है लेकिन कई व‍िशेषज्ञ मानते हैं कि एआई का इस्तेमाल अगर बच्चों को सही तरीके से करने की ट्रेन‍िंग दी जाए तो बच्चे और ज्यादा बुद्ध‍िमान हो सकते हैं. जरा सोचकर देख‍िए सीम‍ित जानकारी या किताबों से मिली जानकारी के आधार पर पली बढ़ी पीढ़ी के लोग आज भी खुद को हर क्षेत्र में तैयार नहीं कर पाते. वहीं एआई ने जैसे हरेक सवाल का जवाब उपलब्ध करा दिया है. इससे बच्चों में ज्ञान की खोज भी बढ़ी है. हम ऐसा कतई नहीं कह सकते कि एआई बच्चों को भोंदू बना रही है. हो सकता है कि एआई उन्हें और ज्यादा नॉलेज की ओर ले जा रही हो. 
Copyright © 2026 Living Media India Limited. For reprint rights: Syndications Today
होम
वीडियो
लाइव टीवी
न्यूज़ रील
मेन्यू
मेन्यू

source.freeslots dinogame telegram营销

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Toofani-News