Delhi Assembly Election History: दिल्ली का वो चुनाव, जिसमें कांग्रेस का गेम हो गया फिनिश और AAP ने कायम कर ली बादशाहत – Aaj Tak

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दिल्ली का 2015 का विधानसभा चुनाव. राष्ट्रीय राजधानी में ये छठा चुनाव था और कई मायनों में ऐतिहासिक बन गया. अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (AAP) ने अद्भुत और अकल्पनीय जीत हासिल की. रिकॉर्ड 67 सीटें जीतीं. BJP सिर्फ 3 सीटों पर सिमट गई. बाकी किसी का खाता भी नहीं खुल सका. ये नतीजे कई कारणों से ऐतिहासिक माने गए. स्विंग वोटर्स ने केजरीवाल की बादशाहत कायम कर दी. इस चुनाव में AAP का 24.8 फीसदी वोट बढ़ा और 28 सीटें ज्यादा जीतने में कामयाबी मिली. प्रचंड जीत से AAP को बूस्टर डोज मिला. जानिए 2015 के चुनाव की कहानी…
2013 में AAP की धमाकेदार एंट्री के बाद दिल्ली में चुनावी लड़ाई त्रिकोणीय हो गई है. उसके बाद 2015 का विधानसभा चुनाव ना सिर्फ दिल्ली की राजनीति में एक बड़ा बदलाव लेकर आया, बल्कि पूरे देश में राजनीति के नए आयाम स्थापित किए. 2013 में AAP ने 29.7% वोट शेयर के साथ 28 सीटें जीती थीं. 2015 में AAP ने लंबी छलांग लगाई और ना सिर्फ 28 सीटों की बढ़त हासिल की, बल्कि 24.8 फीसदी वोटों में भी इजाफा किया. AAP ने 67 सीटें जीतीं और 54.5 वोट शेयर हासिल किया. AAP से अरविंद केजरीवाल, बीजेपी से किरण बेदी और कांग्रेस से अजय माकन चेहरे थे.
9 फीसदी वोट शेयर तक सिमट गई कांग्रेस
2015 के चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद खराब रहा और वो खाता तक नहीं खोल पाई. कांग्रेस का पूरा जनाधार ही खिसक गया और आम आदमी पार्टी में शिफ्ट हो गया. 2008 में कांग्रेस को 40.3%, 2013 में 24.7% और 2015 में सिर्फ 9.7% वोट मिल सके. 2008 में 14 फीसदी वोट हासिल करने वाली बसपा भी ढेर हो गई और सिर्फ 1.3% वोट हासिल कर पाई. इसका सबसे ज्यादा फायदा AAP को मिला और बीजेपी को सबसे ज्यादा नुकसान झेलना पड़ा. 
बीजेपी का स्थिर रहा प्रदर्शन, सीटें घटीं
हालांकि, आंकड़े देखे जाएं तो 2015 में बीजेपी को सबसे कम 32 प्रतिशत वोट मिले. इससे पहले 2003, 2008 और 2013 के चुनाव में बीजेपी का वोट शेयर लगातार 32 से 36 प्रतिशत के बीच स्थिर रहा. यानी खास बदलाव नहीं आया, लेकिन स्विंग वोटर्स की वजह से 2015 के चुनाव में सीटों में बड़ा फेरबदल हो गया. 
1993 में बीजेपी ने पहले चुनाव में 49 सीटें जीतीं थीं और 42.8% वोट शेयर हासिल किया था. उसके बाद 1998 में 15 सीटें और 34% वोट, 2003 में 20 सीटें और 35.2% वोट, 2008 में 23 सीटें और 36.3% वोट, 2013 में 31 सीटें और 33.3% वोट, 2015 में सिर्फ 3 सीटें और 32.3% वोट हासिल किए.
AAP को कैसे जीत मिली?
2013 में कांग्रेस के समर्थन से केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री बने और 49 दिन बाद ही केजरीवाल सरकार गिर गई. लेकिन इस दरम्यान केजरीवाल सरकार ने 3 ऐसे बड़े फैसले लिए, जिसने आगे जाकर AAP की प्रचंड जीत में खाद-पानी की तरह काम किया. 2013 के चुनाव में AAP बिजली, पानी के मुद्दे उठा रही थी और सरकार बनते ही सबसे पहले 400 यूनिट तक सब्सिडी देकर बिजली के दाम आधे कर दिए. उसके बाद हर महीने प्रत्येक घर में 20 हजार लीटर पानी मुफ्त देने का ऐलान कर दिया और सीवर चार्ज भी खत्म कर दिया. इसके अलावा, दिल्ली में स्कूली शिक्षा महंगी होने पर बड़ा कदम उठाया और ज्यादा फीस लेने वाले दिल्ली के 200 प्राइवेट स्कूलों को नोटिस भेज दिया. 
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तीन वादे बन गए गेमचेंजर
AAP ने अपनी चुनावी रणनीति में छोटे-छोटे मुद्दों (पानी, बिजली, भ्रष्टाचार) को प्राथमिकता दी. AAP के पास बड़ी संख्या में युवा और समर्पित कार्यकर्ता थे, जिन्होंने जमीनी स्तर पर पार्टी का प्रचार किया. AAP ने वादा किया कि वो बिजली की दरों को 50% तक कम करेगी. 20,000 लीटर मुफ्त पानी हर परिवार को देने का वादा किया. भ्रष्टाचार विरोधी हेल्पलाइन का वादा किया. सरकारी स्कूलों और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार पर जोर दिया. मोहल्ला क्लीनिक खोलने का वादा किया. सीसीटीवी कैमरे लगाने और महिला हेल्पलाइन को मजबूत करने का वादा आधी आबादी को भी पसंद आया. झुग्गीवासियों से पुनर्वास और सस्ते मकान मुहैया कराने का वादा किया गया.
जानकार कहते हैं कि बिजली, पानी और शिक्षा से जुड़े बड़े फैसलों से केजरीवाल की छवि जनता के बीच ऐसी बनी कि आगे चलकर गेमचेंजर साबित हुई. फरवरी 2014 से फरवरी 2015 तक राष्ट्रपति शासन लगा  रहा. लेकिन जब सालभर बाद विधानसभा चुनाव चुनाव हुए तो AAP ने 70 में से 67 सीटें जीतकर इतिहास रच दिया. फ्री बिजली और फ्री पानी के वादे इतने चर्चित हुए कि नजीर बन गए और कई पार्टियों ने भी अपने राज्यों के चुनावी घोषणा पत्र में इसे शामिल किया.
दिल्ली विधानसभा चुनाव में ये किसी भी दल की अब तक की सबसे बड़ी जीत थी. AAP ने सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस को किया और उसके वोट बैंक में एक बार फिर जबरदस्त सेंध लगाई. 2013 में कांग्रेस का जो नुकसान किया था, वो 2015 में और बढ़ गया. दिल्ली में AAP ने कांग्रेस के वोट बैंक पर कब्जा कर लिया. कांग्रेस नेता अजय माकन ने चुनाव में पार्टी की हार की जिम्मेदारी ली और महासचिव पद से इस्तीफा दे दिया. 15 साल सत्ता में रहने के बाद कांग्रेस की छवि भ्रष्टाचार और सुस्त सरकार की हो गई थी.
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दिल्ली में स्विंग सीट ने कर दिया बड़ा खेल
दिल्ली में करीब 8 सीटे हैं, जिसमें जीत हार का अंतर 10 हजार से कम है और तीन सीट ऐसी हैं, जहां 10 हजार प्लस से हार-जीत हुई है. इसमें 8 सीटें AAP के पास हैं तो 3 सीटें बीजेपी के पास हैं. यही वो सीटें हैं, जहां स्विंग वोटर्स ने दोनों ही पार्टियों को अलर्ट किया है. 
2015 में रोहिणी में बीजेपी के विजेंद्र कुमार 5,367 वोटों से, विश्वास नगर से ओम प्रकाश शर्मा 10,158 वोटों से और मुस्तफाबाद से जगदीश प्रधान 6,031 वोटों से जीते थे. जबकि शालीमारबाग से AAP की बंदना कुमारी 10,978 वोटों से,  शकूर बस्ती से सत्येंद्र जैन 3,133 वोटों से, राजौरी गार्डन से जरनैल सिंह 10,036 वोटों से, नजफगढ़ से कैलाश गहलोत 1,555 वोटों से, लक्ष्मीनगर से नितिन त्यागी 4,846 वोटों से,  गांधी नगर से अनिल कुमार वाजपेयी 7,482 वोटों से, रोहतास नगर से सरिता सिंह 7,874 वोटों से, घोंडा से श्रीदत्त शर्मा 8,093 वोटों से चुनाव जीते थे.
जब सरकार बनाने से पीछे हटी बीजेपी?
2013 में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी थी और सरकार बनाने के लिए प्रमुख दावेदार थी. बीजेपी हाईकमान भी चाहता था कि पार्टी सरकार बनाए. हालांकि, स्थानीय स्तर पर नेता तैयार नहीं थे और सरकार नहीं बनाने का ऐलान कर दिया. सूत्र बताते हैं कि बीजेपी के तत्कालीन चुनाव प्रभारी अरुण जेटली थे और उन्होंने सरकार बनाने के लिए दावा पेश करने के लिए हरी झंडी दी थी. हालांकि, स्थानीय स्तर पर सहमति नहीं बनी और यह दांव पार्टी के लिए उलटा पड़ गया. सूत्र बताते हैं कि अगर बीजेपी 2013 में सरकार बनाती तो उस समय AAP और कांग्रेस दोनों ही पार्टियों के कुछ विधायक टूट सकते थे और बीजेपी को समर्थन दे सकते थे. 
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जानकार कहते हैं कि बीजेपी अगर 2013 में सरकार बनाने का दावा पेश करती तो शायद उसे आगे जाकर इतना नुकसान नहीं झेलना पड़ता. दो कदम पीछे हटने का सीधा फायदा केजरीवाल की पार्टी को मिला और 49 दिन की सरकार में केजरीवाल ने दिल्ली में ताबड़तोड़ फैसले लेकर जनता के बीच अपनी छवि और मजबूत कर ली. इसका फायदा AAP को 2015 के चुनाव में सीधे तौर पर मिला. 
क्यों हार गई बीजेपी?
2015 में बीजेपी को जीत का दावेदार माना जा रहा था. लेकिन जब नतीजे आए तो पार्टी तीन सीटों तक सिमट कर रह गई. कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली. इसके लिए पार्टी की अपनी रणनीति काफी हद तक जिम्मेदार रही. दरअसल, शुरुआती दौर में बीजेपी ने तय किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सामने रखकर दिल्ली चुनाव लड़ा जाएगा. पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह थे. बीजेपी 2014 की जीत के बाद मोदी लहर पर निर्भर थी. इस बीच, देश की पहली महिला आईपीएस अधिकारी रहीं किरण बेदी बीजेपी में शामिल हुईं और पार्टी ने सिर्फ चार दिन के अंदर उन्हें सीएम फेस घोषित कर दिया. इससे पार्टी के स्थानीय नेताओं में अंदरखाने निराशा और नाराजगी बढ़ गई.
बीजेपी जीत के लिए पूरा जोर लगा रही थी और बाहरी नेताओं को टिकट देने से परहेज नहीं कर रही थी. कई सीटों पर बाहरी उम्मीदवारों को टिकट दिए गए. केंद्रीय कैबिनेट की पूरी टीम चुनाव मैदान में उतरी और केजरीवाल के खिलाफ सीधे हमले किए. कैबिनेट मंत्रियों को अलग-अलग इलाकों की जिम्मेदारी दी गई. दूसरे राज्यों से भी आरएसएस कार्यकर्ता दिल्ली में लगाए गए. लेकिन स्थानीय कार्यकर्ताओं में जोश देखने को नहीं मिला. कृष्णानगर सीट से किरण बेदी खुद चुनाव हार गईं. BJP की ये सीट सबसे सुरक्षित थी. कृष्णानगर से बीजेपी नेता डॉ. हर्षवर्धन चुनाव जीतते आ रहे थे.
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किरण की छवि ईमानदार अधिकारी की रही है. उन्होंने इंडिया अगेंस्ट करप्शन के बैनर तले जन लोकपाल के लिए अन्ना हजारे के नेतृत्व में चलाए गए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में हिस्सा लिया था और अरविंद केजरीवाल के साथ उन्होंने मंच से हुंकार भरी थी. हालांकि, चुनाव में वो बीजेपी की नैया पार नहीं कर सकीं.
दिल्ली में 25 सीटों पर ‘बाहरी समीकरण’?
चूंकि दिल्ली के लगभग हर हिस्से में बाहर से आकर रहने वालों की संख्या बढ़ी है. दिल्ली की करीब 25 सीटें ऐसी हैं, जहां दूसरे प्रदेश से आकर बसे लोग निर्णायक साबित होते हैं. पूर्वी, उत्तर पूर्वी और उत्तर पश्चिमी, पश्चिमी दिल्ली में बाहरी प्रदेशों से आए लोगों की संख्या ज्यादा है. ऐसे में सभी पार्टियों ने सोशल इंजीनियरिंग को ध्यान में रखा और उम्मीदवारों का चयन किया. कई उम्मीदवार ऐसे थे, जो उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान या उत्तराखंड से ताल्लुक रखते थे. ताकि स्थानीय वोटों को साधा जा सके और जीत के समीकरण बैठाए जा सकें.
673 उम्मीदवार उतरे थे मैदान में…
कुल 72 पार्टियों ने 673 उम्मीदवार मैदान में उतारे. 2015 में 1,33,09,078 वोटर्स रजिस्टर्ड थे. इनमें 89,80,294 वोटर्स ने मतदान किया. रिकॉर्ड 67.5% वोटिंग हुई. इससे पहले 2013 में 65.6% वोटिंग हुई थी.
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हालांकि, 2013 के चुनाव को छोड़कर जब भी सरकार चुनने की बात आती है तो दिल्ली के वोटर्स की पसंद बहुत निर्णायक होती है. चाहे वो विधानसभा हो, लोकसभा हो या एमसीडी. दिल्ली के वोटर्स के मूड को ध्यान से समझने की जरूरत है. दिल्ली में अलग-अलग लेवल पर होने वाले चुनाव के अलग-अलग नतीजे सामने आते हैं. 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में AAP को 54 प्रतिशत वोट मिले थे, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में AAP का वोट शेयर घटकर 18 प्रतिशत रह गया था. दूसरी ओर, 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी का वोट शेयर 2015 के विधानसभा चुनाव से 25 प्रतिशत बढ़ गया था. दिल्ली के मतदाताओं का वोट स्विंग दिल्ली चुनाव को आखिरी क्षण तक दिलचस्प बनाए रखता है.
2022 में दिल्ली में एमसीडी चुनाव हुए तो AAP ने जबरदस्त जीत हासिल की. MCD में AAP की ये पहली जीत थी. उसके बाद 2024 के आम चुनाव आए तो बीजेपी ने लगातार तीसरी बार AAP और कांग्रेस का सफाया किया और सभी सातों लोकसभा सीटों पर जीत हासिल की थी. 
इससे पहले साल 2014 में जब आम चुनाव थे तो बीजेपी ने पहली बार दिल्ली की सातों सीटों पर क्लीन स्वीप किया था. उसके बाद केजरीवाल ने दिल्ली पर ध्यान केंद्रित किया और अपनी रणनीति बदली. उसके बाद जब 2015 में दिल्ली में विधानसभा चुनाव हुए तो AAP को प्रचंड बहुमत देकर राजनीतिक पंडितों को चौंका दिया था. इसी तरह, 2019 में आम चुनाव हुए बीजेपी ने फिर सभी सातों लोकसभा सीटों पर जीत हासिल की. सालभर बाद 2020 में विधानसभा चुनाव फिर AAP को दोबारा बहुमत दिया. 
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तीसरी बात यह है कि दिल्ली में छोटे दल और निर्दलीय हमेशा वोटर्स की कम पसंद रहे हैं. 2015 के चुनाव में AAP, बीजेपी, कांग्रेस को कुल 96.5 फीसदी वोट मिले थे. बाकी 69 पार्टियां सिर्फ 3.5 फीसदी वोटों के लिए लड़ते देखी गई थीं. यानी दिल्ली जिसे जनादेश देती है, वो ‘छप्पड़ फाड़ के’ देती है. 
 
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