DNA: बच्चों की गलती या माता-पिता की लापरवाही… गेम की लत ने ली तीन बच्चियों की जान, गाजियाबाद की घटना के ल… – Zee News

गाजियाबाद से आई इस घटना ने लोगों को हैरान कर दिया है. यहां पर गेमिंग की लत के कारण तीन नाबालिग लड़कियों ने आत्महत्या कर ली. इस घटना ने सभी को सन्न कर दिया है. 
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DNA Analysis: आज तीन बेटियों ने मोबाइल की वजह से आत्महत्या कर ली. वो तीनों नाबालिग थीं. मोबाइल गेम के नशे में आउट ऑफ कंट्रोल हो गई थीं. लेकिन आज अगर आप हमसे ये उम्मीद रखते हैं कि इस पूरी घटना के लिए उन बेटियों को जिम्मेदार ठहरा दिया जाए. अगर आप हमसे ये चाहते हैं कि मोबाइल एडिक्शन के लिए आपके बच्चों को गुनहगार बना दिया जाए तो ये नहीं होगा. आज माता-पिता की मानसिकता की बात होनी चाहिए. आज ये मुद्दा उठना चाहिए कि अपने बेटे-बेटियों को मोबाइल देखने के लिए तो आप डांटते हैं लेकिन खुद क्या करते हैं? ये जानते हुए कि हमारे देश में मोबाइल गेम जानलेवा बन गया है. 

ये आए दिन बच्चों की जान ले रहा है. फिर भी आपके हाथ से मोबाइल नहीं छूट रहा. सोचिए अगर आपके हाथ से मोबाइल नहीं छूट रहा अगर आप अपनी आदतें नहीं सुधार रहे तो बच्चों को कैसे कहेंगे कि इससे दूर रहो ये जानलेवा है. आज ये चर्चा होनी चाहिए कि आपने, कैसे अपने बच्चों को मनाने के लिए मोबाइल को टूलकिट बना लिया. आज पूछिए अपने आप से, आखिर उंगली पकड़ाने वाले हाथों ने बच्चों को मोबाइल पकड़ाना क्यों शुरू कर दिया? हमारी बात आपको बुरी लग सकती है, लेकिन गलत नहीं. दिल्ली के गाजियाबाद में जिन बेटियों ने आत्महत्या की है वो एक सामान्य परिवार की हैं. 

गाजियाबाद से आया डराने वाला मामला

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शुरुआती जांच में ये कहा जा रहा है कि तीनों बहनों ने मोबाइल और गेमिंग की लत की वजह से सुसाइड किया है, इस खबर के आने के बाद एक बार फिर हमारे देश में ये रटा रटाया शोर शुरू हो गया ये मोबाइल कंपनियां बच्चों को बिगाड़ रही हैं. आजकल के बच्चे बात नहीं मानते सरकार गेम बैन क्यों नहीं कर देती हो सकता है आपने भी ऐसा ही कुछ सोचा होगा, लेकिन आज इससे ज्यादा जरूरी है आपको यानी देश के हर माता-पिता को खुद से एक सवाल पूछने की क्या आपकी कोई जिम्मेदारी नहीं है.जिन बच्चियों की जान चली गई उनके परिवार और उनके माता-पिता के साथ हमारी संवेदनाएं हैं, लेकिन एक सच तो ये भी है कि बच्चियों को मोबाइल और गेम की लत एक दिन में नहीं पड़ी होगी. जब बच्चियां दिन-रात गेम खेल रही थीं तब घर के बड़े कहां थे वो क्या कर रहे थे.
 


#DNAमित्रों | आज 3 बेटियां मर गईं, करोड़ों बच्चे खतरे में हैं! हर माता-पिता को ‘सचेत’ करने वाला विश्लेषण#DNA #DNAWithRahulSinha #Ghaziabad #GhaziabadCase #MobileAddiction @RahulSinhaTV pic.twitter.com/zUr8mjOzc4
— Zee News (@ZeeNews) February 4, 2026
गेम की लत ने ली तीन बच्चियों की जान
गाजियाबाद की इस घटना की एक एक डिटेल हम आपको आगे बताएंगे. बच्चियों को किस गेम की लत थी. बच्चियों ने अपने सुसाइड नोट में क्या लिखा, बच्चियों के पिता ने क्या बताया. बच्चियों की मोबाइल हिस्ट्री क्या कहती है, लेकिन इससे पहले आज जरूरी है देश के हर माता-पिता को आगाह करने की. ताकि आगे और कोई बच्चा ऐसा कदम न उठा ले. आज देश के हर माता-पिता यानि आपको ये सोचने की जरूरत है कि जब बच्चों में गेमिंग का ये जहर घुल रहा होता है, तब आप शायद खुद अपने मोबाइल फोन में रील स्क्रॉल करने में व्यस्त रहते हैं.
हम ये बातें किसी वैसे ही नहीं कह रहे हैं. ताजा आंकड़े बताते हैं कि एक औसत भारतीय हर दिन साढ़े 6 से साढ़े 7 घंटे मोबाइल, लैपटॉप या टीवी की स्क्रीन के सामने गुजारता है. इसमें सबसे ज्यादा 3 घंटा 25 मिनट सोशल मीडिया एप्स पर बीतता है. साल 2024 में 140 करोड़ भारतीयों ने कुल मिलाकर 1.1 लाख करोड़ घंटे स्मार्टफोन की स्क्रीन के सामने ही गुजार दिया. इतना ज़्यादा समय लोग स्मार्टफोन को दे रहे हैं. 
हर माता-पिता को खुद से पूछना चाहिए सवाल 
आज देश के हर माता-पिता को अपने गिरेबान में झांकने की जरूरत है. आज ये सवाल देश के हर माता-पिता को खुद से करना चाहिए कि ऐसा कितनी बार हुआ है जब बच्चा खाना नहीं खा रहा था तो आपने उसके हाथ में मोबाइल थमा दिया. ऐसा कितनी बार हुआ है जब आपने उसे लालच दिया हो कि एक घंटे पढ़ लो तो एक घंटे गेम खेलने देंगे. ऐसा कितनी बार हुआ है जब बच्चा रो रहा था तो उसे चुप कराने के लिए आपने उसके हाथ में मोबाइल पकड़ा दिया. ऐसा कितनी बार हुआ है. जब आप कोई जरूरी कॉल पर थे और बच्चा डिस्टर्ब न करे इसीलिए आपने मोबाइल में गेम लगाकर उसे दे दिया.
आप में से कई लोग होंगे जिन्हें ये लगता होगा कि पांच मिनट में क्या ही हो जाएगा. तो आज हमारे इस विश्लेषण के अंत तक आप ये समझ जाएंगे कि ये पांच मिनट किसी विष यानी जहर से कम नहीं हैं. आज ये समझने की जरूरत है कि ‘डिजिटल जहर’ की पहली डोज़ बच्चों को माता-पिता ही दे रहे हैं और आज जब वो डोज़ बच्चों की जान ले रही है तो लोग कोस किसे रहे हैं. गेमिंग कंपनियों को.. सरकार को.. और उन नादान बच्चों को.
 
गाजियाबाद की घटना से सीख लेने की जरूरत
गाजियाबाद में जो घटना हुई है, उससे सीख लेते हुए आज हर माता-पिता को ये सोचने की जरूरत है कि कहीं वो भी जाने अनजाने में अपने बच्चों को इसी अंजाम की ओर तो नहीं धकेल रहे हैं. गाजियाबाद में तीन बेटियों ने अपनी जान कैसे ले ली. इन्होंने मौत को क्यों गले लगाया अब आपको इस घटना की डिटेल्स जाननी चाहिए. ताकि आप समझ सकें कि मोबाइल फोन और उसमें मौजूद गेम कैसे किसी बच्चे की सांसें छीन सकता है.
बीती रात करीब दो बजे जिन तीनों बच्चियों ने अपने घर की बालकनी से कूदकर जान दे दी. उनकी उम्र 16 साल, 14 साल और 12 साल थी. बताया जा रहा है, तीनों बच्चियों को मोबाइल फोन और कोरियन गेम की लत थी. इतनी ज्यादा लत थी कि 3-4 साल से वो स्कूल तक नहीं जा रही थीं. इनका ज्यादातर वक्त मोबाइल फोन पर ही बीतता था, लेकिन जब माता-पिता ने इन्हें फोन देने से इनकार कर दिया तो इन्होंने आत्महत्या कर ली.इन बच्चियों ने आत्महत्या करने से पहले जो सुसाइड नोट लिखा उसका एक पन्ना सामने आया है..
बच्चियों ने सुसाइड नोट भी लिखा 
इन बच्चियों ने लिखा सच्ची कहानी.. इस डायरी में जो कुछ भी लिखा है.. सब पढ़ लो.. क्योंकि सब सच है.. अभी पढ़ो.. I AM REALLY SORRY… SORRY PAPA.. जिन बच्चियों ने अभी दुनिया भी नहीं देखी थी. उन्होंने अपने मोबाइल फोन और उसमें मौजूद एक गेम को ही अपनी पूरी जिंदगी का परम सत्य मान लिया और जब उनसे मोबाइल फोन छीन लिया गया तो उन्होंने इसे अपने जीवन का अंत समझ लिया. अपनी जान दे दी. इन बच्चियों ने कमरे की दीवारों पर भी जाते जाते कुछ लिखा इन्होंने लिखा.. मेरा दिल टूट गया है.. मैं बहुत अकेली पड़ गई हूं. मेरी जिंदगी बिल्कुल अकेली है.
घर पर मौजूद से सात लोग
जिस वक्त इन तीन बच्चियों ने आत्महत्या की. उस वक्त घर में सात लोग मौजूद थे ये सोचने वाली बात है कि जिस घर में सात लोग एक साथ रह रहे थे. वहां ये बच्चियां खुद को अकेला क्यों महसूस कर रही थीं. फिर से सुनिए घर में सात लोगों के होते हुए तीन बेटियां कूदकर मर गईं. सच्चाई ये है कि इन बच्चियों ने अपने मोबाइल फोन को, उसमें मौजूद गेम को ही अपना परिवार मान लिया था और अपने परिवार को पराया.  गाजियाबाद की इस घटना को आज देश के हर माता पिता को खुद से जोड़कर देखने की जरूरत है. आज ये सवाल हर माता-पिता को खुद से पूछने की जरूरत है कि कहीं उनके घर में भी यही स्थिति तो नहीं बन रही है. एक घर में होकर भी क्या आपलोग साथ-साथ रह रहे हैं या अकेले हो गए हैं. कहीं आपने मोबाइल को ही अपना असली परिवार तो नहीं बना लिया?
क्या माता-पिता बच्चों के साथ नहीं व्यतीत कर रहे वक्त 
आज हम देश के हर माता-पिता से एक और सवाल पूछना चाहते हैं, आखिरी बार अपने बच्चे के साथ आपने लंबा वक्त कब गुजारा था. आखिरी बार मोबाइल फोन साइड में रखकर या टीवी ऑफ कर के बच्चे के साथ घंटा-दो घंटा कब बिताया था. 2023 में साइबर मीडिया रिसर्च यानी CMR के आंकड़े के मुताबिक़ एक दिन में माता-पिता अपने बच्चों के साथ औसतन 2 घंटे बिताते हैं. शहरों में तो ये समय करीब करीब आधा है,  लेकिन इस दौरान 75% माता-पिता अपने मोबाइल का इस्तेमाल करते रहते हैं. इस घंटे-दो घंटे में भी खेलकूद और बातचीत से ज्यादा को-व्यूइंग का कल्चर बढ़ गया है. यानी बच्चों के साथ बैठकर मोबाइल या टीवी देखा जा रहा है. बातचीत कम हो रही है.
आज छोटे बच्चों के माता-पिता को ये याद करना चाहिए कि जब आप खुद बच्चे थे तब बिना मोबाइल गेम्स के बचपन कैसा बीता था. खेलने कूदने के लिए बाहर निकलते थे. मां के साथ बैठकर मटर छीलते थे. पापा के स्कूटर पर शाम को घूमने निकलते थे. क्या आप नहीं चाहते कि आपके बच्चों का बचपन भी ऐसा ही हो. आज ये सोचने की जरूरत इसलिए है क्योंकि आज देश का स्क्रीन टाइम हाई है और बच्चों के साथ माता पिता का टाइम बहुत लो.
मोबाइल ने कैसे बदल दिया सब कुछ 
देश में साल 2007 में स्मार्टफोन आया. स्मार्टफोन ने देश की तस्वीर बदल दी. आज देश के 85% परिवरों में कम से कम एक स्मार्टफोन है. शहरों में तो हर घर में 3 से पांच फोन हैं. हर साल भारत में डेढ़ करोड़ नए फोन खरीदे जाते हैं. इसके कई फायदे हैं लेकिन स्मार्टफोन के आए गेम्स से जो नुकसान हुआ है. आज हमें उसपर चर्चा करने की जरूरत है. माता-पिता के साथ साथ आज उस गेमिंग इंडस्ट्री को कटघरे में खड़ा करने की जरूरत है क्योंकि गेमिंग कंपनियां अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं छाड़ सकते हैं.  Lumikai और Google की ((रिपोर्ट की)) साल 2024 की रिपोर्ट के अनुसार

  • भारत में 60 करोड़ से ज्यादा लोग गेम खेलते हैं.

  • यानी हर 10 में से चार लोग गेम खेल रहे हैं.

  • हैरानी की बात तो ये है कि इसमें 40% से ज्यादा महिलाएं हैं. 

भारत में 60 करोड़ से ज्यादा लोग गेम खेलते हैं.
यानी हर 10 में से चार लोग गेम खेल रहे हैं.
हैरानी की बात तो ये है कि इसमें 40% से ज्यादा महिलाएं हैं. 
इससे बच्चों पर पड़ने वाले असर के बारे में अंदाजा लगाइये. क्योंकि माना जाता है कि बच्चे सबसे ज्यादा वक्त घर की महिलाओं के साथ ही बिताते हैं. मोबाइल गेम्स की लत हमारे देश में कितनी खतरनाक स्थ्ति पर पहुंच गई है इसे ऐसे समझा जा सकता है कि साल 2024 में भारत में 845 करोड़ गेम्स डाउनलोड किए गए. रिपोर्ट्स के मुताबिक भारत में हर मोबाइल में औसतन तीन से पांच गेम्स होते हैं. भारत मोबाइल गेम्स खेलने के मामले में दुनिया में नंबर 1 है. लेकिन गेमिंग की वजह से मौत के मामले में भी भारत की रैंकिंग हाई है.. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक बीते ढाई सालों में गेमिंग ने 32 लोगों की जान ले ली.
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अभिनव त्रिपाठी जी न्यूज हिंदी में बतौर सब एडिटर कार्यरत हैं।  पत्रकारिता के क्षेत्र में 3 साल से अधिक समय का अनुभव रखते हैं। डेस्क पर रियल टाइम की देश-विदेश की खबरों को कवर करते हैं। राष्ट्रीय राजन…और पढ़ें
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