मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कांग्रेस समेत कई विपक्षी राजनीतिक दल सड़कों पर हैं. SIR के विरोध में और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर मंगलवार को कांग्रेस समेत कई विपक्षी राजनीतिक दलों ने मार्च निकाला. मार्च के दौरान राहुल गांधी के हाथ में ‘ज्ञानेश इट्स डन ब्रो’ वाला पोस्टर था. पुलिस ने रोका तो राहुल-प्रियंका 8 घंटे से ज्यादा समय तक आकाशवाणी भवन परिसर में धरने पर बैठे रहे. प्रदर्शन में तिरंगे के सामने प्रियंका तनकर खड़ी हो गईं. राहुल ने उन्हें एनर्जी ड्रिंक ऑफर किया. लगभग पूरे दिन मंगलवार को विपक्ष एक्शन मोड में दिखा.
सभी विपक्षी दल एक सुर में मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं. हालांकि अभी तक इस्तीफे को लेकर या विपक्ष की मांग को पर ज्ञानेश कुमार की तरफ से कोई बयान नहीं आया है. अब सवाल उठ रहे हैं कि अगर ज्ञानेश कुमार इस्तीफा नहीं देते हैं तो विपक्ष के पास और क्या-क्या कानूनी और संवैधानिक विकल्प है.
अगर ऐसा होता है तो राहुल गांधी समेत पूरा विपक्ष एकजुट होकर एक बड़े राष्ट्रीय मुद्दे में इसे बदलने के लिए बहुस्तरीय रणनीति अपना सकता है. राजनीतिक लामबंदी और संवैधानिक प्रावधानों का इस्तेमाल करते हुए विपक्ष मुख्य रूप से इन संवैधानिक विकल्पों पर काम करने की तैयारी कर सकता है.
यदि प्रशासनिक इस्तीफे की मांग पूरी नहीं होती है, तो विरोध प्रदर्शन को बड़े स्तर पर सड़कों पर लाने पर विपक्ष विचार कर सकता है. NSUI और वामपंथी छात्र संगठनों के माध्यम से निर्वाचन सदन के घेराव, जंतर-मंतर पर रैलियों और ‘जेल भरो’ आंदोलनों की तैयारी की जा सकती है.
राहुल गांधी द्वारा दिए गए संदेश”यह केवल प्रशासनिक त्रुटि नहीं, बल्कि वोट की चोरी और लोकतंत्र पर हमला है” इसको सीधे जनता के बीच ले जाकर जन-आंदोलन का रूप दिया जाने पर काम किया जा सकता है.
चुनाव आयोग की स्वायत्तता का मुद्दा विपक्षी एकजुटता के लिए एक ऐसा मुद्दा है जिसपर सभी एकमत हैं. कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और वामदलों से लेकर क्षेत्रीय क्षत्रपों तक सभी दल विचारधारात्मक मतभेदों को भुलाकर एक साझा मंच पर आकर इस मुद्दे को उठा सकते हैं और केंद्र सरकार और चुनाव आयोग के खिलाफ राष्ट्रीय अभियान चला सकते हैं.
विपक्ष के पास कानूनी विकल्प क्या हैं
यदि राजनीतिक दबाव के बाद भी मुख्य चुनाव आयुक्त अपने पद पर बने रहते हैं, तो भारतीय संविधान और न्यायिक व्यवस्था विपक्ष को कई कानूनन विकल्प प्रदान करती है. जैसे
संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाना
संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से केवल उसी प्रक्रिया द्वारा हटाया जा सकता है, जो उच्चतम न्यायालय के किसी न्यायाधीश पर लागू होती है. न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत लोकसभा के कम से कम 100 सांसद या राज्यसभा के 50 सांसद हस्ताक्षरयुक्त नोटिस अध्यक्ष/सभापति को देंगे.
प्रस्ताव स्वीकार होने पर सुप्रीम कोर्ट के जज, हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस और एक प्रसिद्ध कानूनविद की 3-सदस्यीय जांच समिति ‘प्रमाणित दुर्व्यवहार’ या ‘अक्षमता’ के आरोपों की जांच करेगी. समिति की रिपोर्ट में पुष्टि होने के बाद ही संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित कराया जाना अनिवार्य है.
विपक्ष अनुच्छेद 32 का सहारा लेकर सीधे सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर सकता है. याचिका में यह तर्क दिया जाएगा कि बिना उचित प्रक्रिया अपनाए वोटर लिस्ट से नाम हटाना या नियमों में बदलाव करना नागरिकों के मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 19 और 21) और निष्पक्ष चुनाव के सिद्धांत का सीधा उल्लंघन है.
विपक्ष अदालत से अपील कर सकता है कि जब तक गंभीर आरोपों की जांच पूरी न हो, तब तक मुख्य चुनाव आयुक्त को प्रशासनिक और नीतिगत निर्णय लेने से रोकने का अंतरिम आदेश जारी किया जाए.
CEC और अन्य EC अधिनियम, 2023′ की संवैधानिकता को चुनौती
विपक्ष चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया में आए बदलावों की वैधता पर सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट के समक्ष लंबित याचिकाओं के साथ नया मामला जोड़ सकता है.
2023 के नए कानून में चयन समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को हटाकर केंद्रीय मंत्री को शामिल किया गया है. विपक्ष इसे संविधान के ‘मूल ढांचे’ यानी स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव का उल्लंघन बता सकता है.
विपक्ष सुप्रीम कोर्ट से मांग करेगा कि अनुच्छेद 14 और 324 का हवाला देते हुए चुनाव आयोग की पूर्ण स्वायत्तता और निष्पक्षता बनाए रखने के लिए नए दिशा-निर्देश जारी किए जाएं.
चुनाव आयोग के ‘बहु-सदस्यीय निकाय’ के सिद्धांत को चुनौती
संविधान के अनुच्छेद 324 और सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णयों (जैसे टी.एन. शेषन मामला) के अनुसार, चुनाव आयोग एक बहु-सदस्यीय संस्था है. मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य दो चुनाव आयुक्तों के पास बराबर वोटिंग अधिकार होते हैं. ऐसे में विपक्ष सुप्रीम कोर्ट या उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर यह तर्क दे सकता है कि यदि मुख्य चुनाव आयुक्त ने अन्य दो चुनाव आयुक्तों की असहमति या आपत्ति के बावजूद मतदाता सूची (फॉर्म 6 / SIR) से जुड़े एकतरफा फैसले लिए हैं, तो वे फैसले गैर-कानूनी और असंवैधानिक हैं.
अदालत मुख्य चुनाव आयुक्त के एकतरफा प्रशासनिक फैसलों पर रोक लगा सकती है और यह आदेश दे सकती है कि सभी चुनावी निर्णय केवल पूर्ण बहुमत से ही लिए जाएं.
लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत HC में अपील
‘लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950’ की धारा 21, 22 और 23 के तहत मतदाता सूची के पुनरीक्षण और नामों को जोड़ने या हटाने की एक निश्चित वैधानिक प्रक्रिया तय है.
विपक्ष राज्य-वार HC में रिट याचिकाएं दायर करके यह साबित करने की कोशिश कर सकता है कि बिना वैधानिक प्रक्रिया अपनाए या प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ जाकर बड़े पैमाने पर वोट काटे गए हैं.
यदि उच्च न्यायालय यह पाता है कि अधिकारियों ने प्रक्रियात्मक नियमों का उल्लंघन किया है, तो वह उन विशिष्ट प्रशासनिक दिशानिर्देशों को रद्द कर सकता है और राज्य स्तर पर पुनरीक्षण प्रक्रिया पर स्थगादेश जारी कर सकता है, जिससे मुख्य चुनाव आयुक्त का कथित एकतरफा नियंत्रण रुक जाएगा.
संकल्प ठाकुर पिछले 10 वर्षों से मीडिया जगत में सक्रिय हैं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत न्यूज़ 24 से की, इसके बाद न्यूज़ नेशन में कार्य किया. वर्तमान में वह एबीपी हिंदी डिजिटल में डिप्टी प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं और पिछले सात वर्षों से संस्थान के साथ जुड़े हुए हैं. उन्हें खेल, अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम और चुनावी राजनीति से जुड़ी खबरों की गहरी समझ है. इसके अलावा साहित्य, कला और संस्कृति से जुड़े विषयों पर लेखन उनकी विशेष रुचि और विशेषज्ञता का क्षेत्र है. उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में स्नातक की उपाधि प्राप्त की है.
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