पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मंगलवार को निर्वाचन आयोग और बीजेपी पर बड़ा हमला बोलते हुए कहा कि वोटर्स के नाम काटने के लिए लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी का सहारा लिया गया है. यह चुनाव आयोग के आधिकारिक प्रारूप में कहीं है ही नहीं. उन्होंने दावा किया कि बीजेपी को फायदा पहुंचाने के लिए बंगाल में इसका इस्तेमाल किया गया, जबकि बिहार में ऐसा कुछ नहीं था. यानी लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी वो हथियार बन गया, जिसने बंगाल में करीब 91 लाख वोटर्स के नाम काट दिए. आखिर यह क्या बला है और इससे वोटर्स पर क्या असर पड़ा? जानेंगे एक्सप्लेनर में…
सवाल 1: लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी शब्द का मतलब क्या है?
जवाब: लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी ‘Logical Discrepancy’ एक तकनीकी श्रेणी है जिसे चुनाव आयोग ने उन मामलों के लिए इस्तेमाल किया जहां डेटा में ‘तार्किक असंगति’ पाई गई. जैसे नाम की स्पेलिंग में फर्क, उम्र में मामूली अंतर, परिवार के सदस्यों के डेटा में मेल न होना या एक ही व्यक्ति के अलग-अलग दस्तावेजों में अलग विवरण होना. हालांकि, समस्या यह है कि इन विसंगतियों की परिभाषा और लागू करने का तरीका पूरी तरह पारदर्शी नहीं रहा और यही विवाद की जड़ बन गया.
सवाल 2: यह लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी असल में इतना बड़ा मुद्दा क्यों बन गया?
जवाब: पश्चिम बंगाल में 2026 विधानसभा चुनाव से ठीक पहले चुनाव आयोग ने स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत वोटर लिस्ट की बड़े पैमाने पर सफाई की. इसमें करीब 90 से 91 लाख नाम हटा दिए गए, यानी कुल वोटरों का लगभग 10–12 प्रतिशत हिस्सा लिस्ट से बाहर हो गया. यह सिर्फ सामान्य ‘डुप्लीकेट या मृत’ एंट्री हटाने तक सीमित नहीं रहा बल्कि लाखों ऐसे लोग भी प्रभावित हुए जिन्होंने अपने नाम हटाए जाने को चुनौती दी थी.
इस श्रेणी के तहत करीब 1.25 करोड़ से ज्यादा नामों को चिह्नित किया गया और लाखों लोगों को या तो लिस्ट से हटा दिया गया या उन्हें ‘संदिग्ध’ बना दिया गया. कई मामलों में लोगों को यह तक नहीं बताया गया कि उनके नाम क्यों हटाए गए, जिससे प्रक्रिया पर भरोसा कमजोर हुआ और इसे मनमाना बताया जाने लगा.
सवाल 3: इसमें सबसे बड़ा लॉजिकल कॉन्ट्राडिक्शन क्या दिखता है?
जवाब: सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि चुनाव आयोग एक तरफ कहता है कि यह प्रक्रिया ‘डेटा को शुद्ध और सटीक’ बनाने के लिए है, लेकिन दूसरी तरफ बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी बाहर हो गए जिनके पास वैध दस्तावेज थे या जिनकी पहचान पहले से स्थापित थी. यहां तक कि कुछ मामलों में अदालतों को हस्तक्षेप करना पड़ा क्योंकि आयोग यह तक नहीं बता पाया कि नाम हटाने का आधार क्या था. यानी लिस्ट में सटीकता लाने के नाम पर वेलिड वोटर्स भी बाहर हो गए
यह सिर्फ तकनीकी गलती नहीं बल्कि प्रक्रिया की संरचनात्मक समस्या लगती है क्योंकि रिपोर्ट्स में सामने आया कि डेटा मिलान, AI आधारित जांच और फील्ड वेरिफिकेशन में कई खामियां थीं. जैसे भाषा और स्थानीय पहचान की बारीकियों को समझे बिना एल्गोरिद्म का इस्तेमाल किया गया. इससे बड़ी संख्या में सही लोगों को भी मिसमैच मान लिया गया और यही वजह है कि कई क्षेत्रों में पूरे-के-पूरे समुदाय प्रभावित हुए.
सवाल 4: क्या ऐसे उदाहरण भी सामने आए जहां यह लॉजिक पूरी तरह फेल हो गया?
जवाब: हां, कई उदाहरण सामने आए जहां प्रतिष्ठित नागरिकों, सरकारी कर्मचारियों, यहां तक कि सुरक्षाबलों में तैनात लोगों के नाम भी हटा दिए गए. कुछ मामलों में एक ही परिवार के अलग-अलग सदस्यों का स्टेटस अलग था. कहीं-कहीं तो जिन लोगों के नाम हटाए गए उन्हें बाद में पोस्टल बैलेट भी जारी कर दिए गए. इससे यह साफ हुआ कि डेटा सिस्टम के भीतर ही विरोधाभास मौजूद है.
रिपोर्ट्स और विश्लेषण बताते हैं कि यह प्रभाव समान रूप से नहीं पड़ा बल्कि कुछ जिलों और समुदायों पर ज्यादा पड़ा. खासकर सीमा से जुड़े इलाके, अल्पसंख्यक और ग्रामीण आबादी. यहां बड़ी संख्या में लोगों के नाम हटे और कुछ जगहों पर तो आधे वोटर्स के प्रभावित होने की बात सामने आई. यह सवाल उठने लगा कि क्या यह सिर्फ ‘डेटा क्लीनिंग’ है या इसके पीछे कोई पैटर्न है.
सवाल 5: आम वोटर के लिए इसका क्या मतलब है?
जवाब: इसका सीधा मतलब है कि अगर आपका डेटा किसी भी वजह से लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी में आ गया, तो आपका वोट देने का अधिकार खतरे में पड़ सकता है. चूंकि यह प्रक्रिया चुनाव से ठीक पहले हुई, इसलिए कई लोगों के पास सुधार कराने का पर्याप्त समय या संसाधन नहीं था. वे चुनाव में भाग लेने से वंचित हो सकते हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे मामले में पारदर्शिता की जरूरत पर जोर देते हुए आयोग को निर्देश दिया कि लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी वाले सभी नाम सार्वजनिक किए जाएं और लोगों को अपनी बात रखने का मौका मिले. साथ ही अदालतों और ट्रिब्यूनल्स ने कई मामलों में नाम बहाल भी किए, जिससे यह साफ हुआ कि सिस्टम में गलतियां हो रही थीं.
लोकतंत्र का मूल सिद्धांत यह है कि हर योग्य नागरिक को वोट देने का अधिकार मिले, लेकिन यहां लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी जैसे अस्पष्ट और व्यापक मानदंड के आधार पर बड़े पैमाने पर नाम हटाए गए और जब डेटा सुधार के नाम पर सही वोटर भी बाहर हो जाएं तो यह प्रक्रिया अपने ही घोषित उद्देश्य के खिलाफ चली जाती है.
ज़ाहिद अहमद इस वक्त ABP न्यूज में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर (एबीपी लाइव- हिंदी) अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इससे पहले दो अलग-अलग संस्थानों में भी उन्होंने अपनी सेवाएं दी. जहां वे 5 साल से ज्यादा वक्त तक एजुकेशन डेस्क और ओरिजिनल सेक्शन की एक्सप्लेनर टीम में बतौर सीनियर सब एडिटर काम किया. वे बतौर असिस्टेंट प्रोड्यूसर आउटपुट डेस्क, बुलेटिन प्रोड्यूसिंग और बॉलीवुड सेक्शन को भी लीड कर चुके हैं. ज़ाहिद देश-विदेश, राजनीति, भेदभाव, एंटरटेनमेंट, बिजनेस, एजुकेशन और चुनाव जैसे सभी मुद्दों को हल करने में रूचि रखते हैं.
Source: IOCL
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