Explained: 35 साल बाद भी क्यों नहीं सुलझ पाया फर्जी मतदान और पहचान का संकट? – ABP News

भारतीय लोकतंत्र में फर्जी मतदान और पहचान का संकट 35 साल बाद भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है, जिसे लेकर अब सियासत और तीखी हो गई है. एक तरफ जहां 1990 के दशक की शुरुआत में मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन ने पहली बार फोटो वोटर आईडी का ऐतिहासिक कदम उठाकर बूथ कैप्चरिंग और कागजी हेराफेरी पर लगाम लगाने की नींव रखी थी, वहीं तीन दशकों के बदलावों के बाद भी यह मुद्दा पूरी तरह नहीं सुलझ सका है.
इसी बीच विपक्ष ने इस संकट को लेकर सरकार और चुनाव आयोग के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने भाजपा पर मतदाता सूचियों में धांधली और वोट चोरी का सीधा आरोप लगाते हुए चुनावी प्रक्रिया में बायोमेट्रिक सत्यापन और आधार-वोटर आईडी लिंकेज को अनिवार्य बनाने की बड़ी मांग कर दी है. आइए समझते हैं कि टी.एन. शेषन के दौर से शुरू हुई इस चुनावी पारदर्शिता की यात्रा में अब तक क्या-क्या बदलाव हुए हैं और आज की चुनौतियां क्या हैं.
टी.एन. सेशन का वह दौर जब पहली बार आई थी फोटो वोटर आईडी की बात
बात 1990 के दशक की शुरुआत की है. भारतीय राजनीति और चुनाव आयोग के इतिहास में टी.एन. सेशन का कार्यकाल एक बड़े बदलाव का प्रतीक माना जाता है. जब उन्होंने दिसंबर 1990 में देश के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) का पद संभाला, तब देश के चुनावों में बूथ कैप्चरिंग, फर्जी मतदान, और कागजी वोटर लिस्ट में हेराफेरी आम बात हुआ करती थी.
चुनावों में फर्जीवाड़ा रोकने और मतदान करने वाले व्यक्ति के चेहरे का मिलान वोटर लिस्ट के नाम से करने के लिए, टी.एन. सेशन ने 1993 में इलेक्टर्स फोटो आइडेंटिटी कार्ड (EPIC) यानी वोटर आईडी कार्ड की अवधारणा को कड़ाई से लागू किया.
उस समय राजनीतिक दलों और सरकारों ने इसका जमकर विरोध किया था, क्योंकि इससे चुनावी धांधली पर लगाम कसने लगी थी. सेशन की जिद और सुधारों के कारण ही देश के मतदाताओं को एक पहचान पत्र मिला.
लेकिन उस दौर की तकनीक सीमित थी. तब डेटाबेस को डिजिटल करना, हर नागरिक की उंगलियों के निशान या बायोमैट्रिक पहचान को सुरक्षित रखना संभव नहीं था. नतीजा यह हुआ कि फोटो आईडी मिलने के बाद भी कागजी और प्रशासनिक स्तर पर फर्जी वोटर्स (एक से अधिक जगह नाम होना या मृत लोगों के नाम पर वोट पड़ना) की समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हो सकी.
बीते 35 साल से वोटर आईडी का स्थायी हल क्यों नहीं निकल पा रहा है?
पिछले साढ़े तीन दशकों में भारत ने अंतरिक्ष से लेकर डिजिटल पेमेंट तक में अभूतपूर्व प्रगति कर ली है, लेकिन चुनावी सूचियों की शुचिता का मामला आज भी उलझा हुआ है. इसके पीछे कई मुख्य कारण हैं
डुप्लीकेसी (एक ही व्यक्ति के कई जगह नाम): लोग जब एक शहर से दूसरे शहर नौकरी या पढ़ाई के लिए शिफ्ट होते हैं, तो वे नए पते पर नया वोटर आईडी तो बनवा लेते हैं, लेकिन पुराने पते वाली मतदाता सूची से अपना नाम कटवाना भूल जाते हैं. इससे एक ही मतदाता का नाम कई निर्वाचन क्षेत्रों में दर्ज रहता है.
मृतकों के नाम सूची से न हटना: स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक सुस्ती के कारण मृत लोगों के नाम समय पर वोटर लिस्ट से डिलीट नहीं हो पाते, जिनका गलत फायदा कई बार उठाया जाता है.
फर्जी और बोगस मतदाता: राजनीतिक दलों द्वारा अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए फर्जी पतों पर नाम जुड़वाने की प्रवृत्ति आज भी पूरी तरह बंद नहीं हुई है.
आधार से वोटर कार्ड का कनेक्शन और बायोमैट्रिक समाधान
इन तमाम पुरानी और जटिल समस्याओं से पार पाने के लिए ही पिछले कुछ वर्षों से वोटर आईडी को आधार कार्ड से जोड़ने की प्रक्रिया पर जोर दिया जा रहा है. चुनाव आयोग ने इसके लिए फॉर्म 6B की व्यवस्था की है, जिसके जरिए नागरिक स्वेच्छा से अपने आधार नंबर को अपने वोटर आईडी (EPIC) से लिंक कर सकते हैं.
आधार चूंकि पूरी तरह से बायोमैट्रिक (आंख की पुतली और फिंगरप्रिंट) डेटा पर आधारित है, इसलिए यदि इसे वोटर लिस्ट से जोड़ दिया जाए, तो यह पक्का हो जाएगा कि एक व्यक्ति का नाम पूरे देश में केवल एक ही जगह दर्ज है.
जैसे ही कोई नया व्यक्ति नाम जुड़वाने की कोशिश करेगा, बायोमैट्रिक सिस्टम तुरंत बता देगा कि उसका नाम पहले से कहीं और दर्ज है या नहीं. इससे डुप्लीकेट और बोगस वोटर्स की समस्या हमेशा के लिए खत्म हो सकती है.
मौजूदा स्थिति और चुनौतियां
हाल ही में चुनाव आयोग ने इस दिशा में तकनीकी परामर्श और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स (जैसे नेशनल वोटर्स सर्विस पोर्टल और ECINET ऐप) के जरिए इस प्रक्रिया को और सुगम बनाने की पहल तेज की है. हालांकि, इस पूरी प्रक्रिया में कुछ व्यावहारिक और कानूनी पहलू भी जुड़े हैं.
स्वैच्छिक प्रक्रिया: वर्तमान नियमों के तहत आधार को वोटर आईडी से जोड़ना अनिवार्य नहीं बल्कि स्वैच्छिक रखा गया है, जिससे शत-प्रतिशत डेटा सीडिंग में समय लग रहा है.
गोपनीयता और तकनीकी सुरक्षा: सुप्रीम कोर्ट के निजता के अधिकार के फैसलों को ध्यान में रखते हुए चुनाव आयोग और सरकार यह सुनिश्चित करने में लगे हैं कि नागरिकों का बायोमैट्रिक डेटा पूरी तरह सुरक्षित रहे और इसका कोई दुरुपयोग न हो सके.
टी.एन. सेशन द्वारा 1990 के दशक में शुरू की गई चुनावी सुधारों की लड़ाई आज एक नए और डिजिटल दौर में पहुंच चुकी है. पिछले 35 वर्षों से वोटर आईडी की जो समस्याएं देश के लोकतंत्र को दीमक की तरह खोखला कर रही थीं, उनका एकमात्र वैज्ञानिक और ठोस समाधान आधार जैसी बायोमैट्रिक व्यवस्था के साथ एकीकरण में ही छिपा है. यदि आम नागरिक जागरूकता दिखाते हुए स्वेच्छा से अपने दस्तावेजों को लिंक करें और प्रशासन तकनीकी खामियों को दूर करे, तो आने वाले दिनों में भारत के चुनाव दुनिया के सबसे पारदर्शी और त्रुटिहीन चुनावों में गिने जाएंगे.
संकल्प ठाकुर पिछले 10 वर्षों से मीडिया जगत में सक्रिय हैं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत न्यूज़ 24 से की, इसके बाद न्यूज़ नेशन में कार्य किया. वर्तमान में वह एबीपी हिंदी डिजिटल में डिप्टी प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं और पिछले सात वर्षों से संस्थान के साथ जुड़े हुए हैं. उन्हें खेल, अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम और चुनावी राजनीति से जुड़ी खबरों की गहरी समझ है. इसके अलावा साहित्य, कला और संस्कृति से जुड़े विषयों पर लेखन उनकी विशेष रुचि और विशेषज्ञता का क्षेत्र है. उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में स्नातक की उपाधि प्राप्त की है.
We use cookies to improve your experience, analyze traffic, and personalize content. By clicking “Allow All Cookies”, you agree to our use of cookies.

source.freeslots dinogame telegram营销

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Toofani-News