लखनऊ (ब्यूरो)। लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर देशभर में छिड़ी बहस के बीच ऐसे रिश्ते को लेकर कई पक्ष निकल कर सामने आए हैं, जिनमें एक पक्ष जेन-जी का भी है, जो इसे पॉजिटिवली लेते हैं। वहीं, मिलेनियल्स और जेन-एक्स का विचार अलग है। उनका कहना है कि इस तरह की चीजें इंडियन वैल्यूज के खिलाफ हैं। वहीं दूसरी तरफ, सोसायटी और मेंटल हेल्थ पर इस ट्रेंड के इम्पैक्ट को लेकर जब हमने सोशियोलॉजिस्ट्स और साइकोलॉजिस्ट्स से बात की तो उन्होंने लिव-इन को न तो निगेटिव कहा, न पॉजिटव। पढ़ें खुशी दुबे की रिपोर्ट
इनसिक्योरिटी है बड़ा रीजन
लखनऊ यूनिवर्सिटी में साइकोलॉजी डिपार्टमेंट की हेड प्रो। अर्चना शुक्ला कहती हैं कि आजकल रिलेशनशिप टूटने और मेंटल हेल्थ चैलेंजेस बढ़ने का सबसे बड़ा रीजन इनसिक्योरिटी है, जिसकी वजह से पर्सन के मन में हमेशा ऑप्शन रहता है कि अगर ऐसा नहीं होगा तो मैं ऐसा कर लूंगा और फिर यही रीजन बन जाता है कि लोग छोटी-छोटी चीजों पर झगड़ने लगते हैं, टॉलरेट नहीं करते हैं, जिसकी वजह से भी मेंटल हेल्थ चैलेंजेस सामने आते हैं। दो लोगों में कोई एक तो इमोशनली वीक होता ही है और जो वीक या डिपेंडेंट होता है, उसको सफर करना पड़ता है। यही रीजन है कि आप जब भी किसी पर्सन के साथ रहें तो उसको ऑब्जर्व करें क्योंकि स्टार्टिंग में तो सबकुछ खूबसूरत लगता है, मगर कुछ महीनों बाद जब रियलिटी सामने आती है तो लोग उससे भागने लगते हैं।
जनरलाइजेशन नहीं कर सकते
लिव-इन रिलेशनशिप का सोसायटी पर कितना असर पड़ता है इसको लेकर एलयू में सोशियोलॉजी डिपार्टमेंट के हेड प्रो। डीआर साहू कहते हैं कि किसी भी चीज को बिल्कुल सही या बिल्कुल गलत नहीं कहा जा सकता है। पहले के टाइम में रिश्तों का अलग महत्व था और अब अलग मीनिंग है। तब लोग ऑप्शन के बारे में नहीं सोचते थे लेकिन जैसे-जैसे सोसायटी अपग्रेड हुई, लोगों के पास भी ऑप्शन आ गए और वे प्रैक्टिकल हो गए। कुछ चीजों में प्रैक्टिकैलिटी सही भी है मगर रिलेशनशिप में यह ट्रस्ट इश्यूज को जन्म देती है, जो मैरिज जैसे इंस्टीट्यूशन पर बड़ा असर डालते हैं।
यंगस्टर्स पर वेस्टर्न कल्चरल का असर
लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर जब हमने कुछ जेन-एक्स से बात की तो उनका कहना है कि आजकल की जनरेशन वेस्टर्न कल्चर से इंफ्ल्यूएंस होकर भारतीय परंपरा को बिल्कुल भूलती जा रही है। पहले के टाइम में लोगों के बीच में झगड़े कम होते थे क्योंकि अंडरस्टैंडिंग और कमिटमेंट था। आज के टाइम में कमिटमेंट की कोई कीमत ही नहीं है। बिना कमिटमेंट के रिश्तों का क्या मतलब है, जो आज है और कल नहीं।
क्या कहते हैं यंगस्टर्स
इंडियन कल्चर में मैरिज का अपना महत्व है। लिव-इन जैसी सोच हमारी मोरल वैल्यूज के लिए एक तरह से खतरा बन रही है।
-विनय
लिव-इन रिलेशनशिप फैमिली वैल्यूज को सैटिस्फाइड नहीं करता है, जिससे सोसायटी में भी इंटरप्शन पैदा हो सकता है। हमारी सोसायटी में जब लोग साथ होते हैं तो उनके बीच एक रिश्ता होता है, लेकिन लिव-इन एक फैशन की तरह है, जो कभी भी चेंज हो सकता है।।
-विकास
लिव-इन जैसे रिलेशनशिप शुरू-शुरू में तो अच्छे लगते हैं, लेकिन अंडरस्टैंडिंग और कमिटमेंट की कमी की वजह से जल्दी टूट भी जाते हैं, वहीं इमोशनल पर्सन को इसके परिणाम भुगतने पड़ते हैं।
-विक्रमादित्य
कोई भी रिलेशन जो दो लोगों की मर्जी से शुरू हो, उसका फाइनल डिसीजन भी दोनों की मर्जी से होना चाहिए, जिस रिलेशन में कमिटमेंट न दी जा सके, वो तो बस टाइमपास है।
-निहारिका
लाइफ हो या रिलेशनशिप, सभी में क्लियरटी और कमिटमेंट जरूरी है, तभी वे सक्सेस होते हैं। इसके बाद ही करियर, फैमिली और बाकी की लाइफ को बेहतर बनाया जा सकता है।
-डॉ। अर्चना शुक्ला, हेड, डिपार्टमेंट ऑफ साइकोलॉजी, एलयू
लिव-इन रिलेशनशिप पर्टिकुलर पर्सन की इंडिपेंडेंस पर डिपेंड करता है, लेकिन इसके फ्यूचर आस्पेक्ट्स मैरिज और फैमिली जैसे इंस्टीट्यूशंस पर जरूर इम्पेक्ट डालते हैं, सोसायटी में भी ट्रस्ट इश्यूज बढ़ते हैं और परिवार टूटते हैं।
-डॉ। डीआर साहू, हेड, डिपार्टमेंट ऑफ सोशियोलॉजी, एलयू
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