बेंगलुरू की एक कंपनी में काम करने वाले AI इंजीनियर अतुल सुभाष की आत्महत्या की कहानी दर्दनाक और भयावह तो है ही, भारत में पति-पत्नी के बिगड़ते संबंधों पर नए सिरे से सोचने के लिए हमें विवश भी कर रही है. कई पत्नियों पर भी अत्याचार अवश्य होते होंगे, लेकिन आज की एक भयावह सच्चाई यह भी है कि अनेक पतियों पर भी कम अत्याचार नहीं हो रहे.
विडंबना यह कि ज्यादातर पति अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों के सच को किसी के सामने ला भी नहीं पाते, क्योंकि उनके सच को समाज हेय दृष्टि से देखता है कि कैसा मर्द है, एक औरत तक न संभाली जा रही इससे! लेकिन आज के पुरुष से औरत संभाली कैसे जाए, क्योंकि पति-पत्नी के रिश्तों में पाश्चात्य संस्कृति से उधार लिया हुआ कानून जो घुस गया है. अब यदि पुरुष औरत को संभालने के प्रयास करेगा, तो उसे अत्याचारी बताती हुई औरत कानून में चली जाएगी और फिर उल्टे पुरुष पर ही शुरू हो जाएगा दोहरे अत्याचार का सिलसिला. एक – पत्नी और उसके परिवार वालों की तरफ से. दूसरा – कानून, पुलिस, वकीलों और अदालतों की तरफ से.
जब तक पति-पत्नी के बीच पाश्चात्य संस्कृति से उधार लिया हुआ यह कानून नहीं घुसा था, पति पत्नी को संभाल लेते थे और पत्नियां भी पतियों को संभाल लेती थीं. दोनों मिलकर घर को संभाल लेते थे. एक दूसरे के साथ रहते हुए सुख-दुख, हर्ष-विषाद सब कुछ एक जनम नहीं, सात जन्मों या जनम जनम तक सह लेने का हौसला रखते थे.
पाश्चात्य संस्कृति के दलालों ने बड़ी हायतौबा मचाई और..
पाश्चात्य प्रभाव वाले कानूनों की अनुपस्थिति में इक्का-दुक्का कुछ घटनाएं होती रही होंगी, जिनके आधार पर पाश्चात्य संस्कृति के दलालों ने बड़ी हायतौबा मचाई कि भारत में स्त्रियों पर बड़े अत्याचार हो रहे हैं. इसी हायतौबा के कारण पति-पत्नी के संबंधों में इन घटिया कानूनों की घुसपैठ हुई. हालांकि हमने दो पीढ़ी पहले किसी के बारे में नहीं सुना कि किसी पति या पत्नी ने आत्महत्या कर ली या दूसरे की हत्या कर दी या किसी का किसी से तलाक हो गया. ये सारे चोंचले बीसवीं सदी में शुरू हुए और इक्कीसवीं सदी में भयावह रूप धारण कर चुके हैं.
आज तो हालात ऐसे हैं कि सात जन्मों तक चलने वाला रिश्ता एक जनम भी ठीक से नहीं चल पा रहा. शादी के सात फेरों को मजाक बना दिया गया है. घर घर में टूटन है, अत्याचार है. या तो पुरुष स्त्री पर अत्याचार कर रहे हैं, या फिर स्त्री पुरुष पर अत्याचार कर रही है. सभी अपने अपने घर की कलह पर पर्दा डालने में जुटे हुए हैं, लेकिन सच यह है कि शायद ही कोई घर ठीक से चल पा रहा, क्योंकि पति-पत्नी के रिश्ते के बीच जो प्यार, भरोसा, समर्पण और साथ ही जीने-मरने का संकल्प था, वह समाप्त हो चुका है.
आप कुछ पुरानी परंपराओं को दकियानूसी कहें, बकवास कहें, फिजूल कहें, निरर्थक कहें, पुरुषप्रधान सोच कहें, स्त्री का शोषण कहें, जो भी कहना चाहें, कहने की स्वतंत्रता तो आपको रहेगी, लेकिन उनके कुछ मायने थे, जिनके कारण पति-पत्नी के संबंध अटूट होते थे और दोनों के बीच का सामंजस्य और समर्पण-भाव अद्भुत होता था.
पति-पत्नी के संबंध अटूट होते थे कभी लेकिन अब…
जिस दिन बेटी अपने पिता के घर से विदा होकर पति के घर जाती थी, उस दिन से पिता के घर के लिए परायी हो जाती थी बेटी. सुनने में भले ही यह बात संवेदनहीनता और अन्याय से भरी लगती हो, लेकिन पिता के घर के लिए परायी हो जाना ही उस बेटी के मन में पति के घर-परिवार को अपना समझने की चेतना पैदा करती थी.
लेकिन आज क्या स्थिति है? बेटी की विदाई के दिन से ही बेटी वाले उसकी ससुराल में घुस जाते हैं. मोबाइल फोन ने तो हालात बिगाड़े नहीं हैं, भयावह बना दिये हैं. अब चौबीसों घंटे बेटी की ससुराल का सीधा प्रसारण उसके मायके में चलता रहता है. झूठ-सच सब कुछ नमक-मिर्च लगाकर, तिल का ताड़ बनाकर, राई का पहाड़ बनाकर.
मायके वाले ससुराल वालों के खिलाफ साजिशें करना सिखाते हैं अब..
ज्यादातर मायके वाले जो बेटी को बेटे के बराबर अधिकार देने को आज भी तैयार नहीं हैं, वे बेटी के विवाह के बाद भी उसके प्रति अपना फालतू कंसर्न शो करते रहते हैं, बेटी को ससुराल वालों के खिलाफ साजिशें करना सिखाते रहते हैं और बेटी भी उनकी बातों में आकर अपने ही घर में आग लगाती रहती है.
अरे अभागो, जब बेटी को ससुराल वालों के खिलाफ भड़काना ही था, तो उसे ससुराल भेजा क्यों? जब बेटी की इतनी ही चिंता थी, तो उसे अपने ही घर में रख लेते न, बेटे के बराबर उसे भी हक देकर आत्मनिर्भर बना देते न! बेटी और अपनी गुलामी करने के लिए घरजमाई ले आते न! आजकल तो महंगाई, बेरोजगारी के आलम में ऐसे ढेर सारे लड़के मिल जाएंगे, जो घरजमाई बनने को भी तैयार हो जाएं. तो बदल डालो न समाज की परंपरा. उसमें क्यों शर्म आती है, अभागो? क्योंकि बेटी को हक नहीं देना है, केवल उस पर कब्जा जमाकर रखना है, उसके सहारे उसके ससुराल वालों को लूटना और तबाह करना है. बेटी को अपनी स्वार्थसिद्धि का हथियार बनाकर रखना है.
दुर्भाग्य यह कि मां-बाप-भाई के प्यार में अंधी बेटी कभी इस बात को समझ नहीं पाती है. अब शायद ही कोई लड़की पहले की तरह सास-ससुर को अपने मां-बाप की तरह स्नेह और सम्मान देती है. वह तो हमेशा इसी जुगत में लगी रहती है कि कैसे उनसे उसे छुटकारा मिले, कैसे पति को उसके मां-बाप के खिलाफ भड़का दिया जाए. आज की लड़की अपने और पति के घर में पति के मां-बाप को फूटी आंख नहीं देखना चाहती, जबकि उसका वश चले तो पति की सारी कमाई अपने मां-बाप पर उड़ा दे और उन्हें पति के ही घर में बसा ले.
जबकि मैंने पहले भी एक बार लिखा था कि आंकड़े निकालकर देख लीजिए, बेटियों पर सबसे ज्यादा अत्याचार पति या ससुराल वालों ने नहीं किये हैं, उनके अपने मां-बाप ने ही किये हैं. पता कीजिए कि कितने मां-बापों ने बेटियों को गर्भ में ही मार डाला है. जितनी बेटियों को मां-बाप ने गर्भ में मारा है, उसका शून्य दशमलव शून्य एक प्रतिशत (0.01%) भी ससुराल में नहीं मारा गया होगा.
मां-बाप के घर में पिछली रोटी खाने वाली बेटी पति और सास-ससुर के घर में आकर मालकिन बन जाती है, जहां पहली बार उसे स्वतंत्रता और संपत्ति मिलती है. जीवन में पहली बार उसके शौक और सपने पूरे होने शुरू होते हैं. मां-बाप के घर में उसका कुछ भी नहीं होता, जबकि ससुराल में सब कुछ उसी का हो जाता है. देखा जाए तो उसका पति जो दिन-रात गधे-बैल की तरह खटता रहता है, किसकी सुख-सुविधा के लिए खटता है?
मेरी सरकार होती, तो तलाक की व्यवस्था को समाप्त कर देता
यदि देश में मेरी सरकार होती, तो मैं केवल सनातन और हिन्दुत्व की बातें नहीं करता, बल्कि कुछ अमल भी सनातन और हिन्दुत्व के मूल्यों पर करता. मैं हिन्दुओं में तलाक की व्यवस्था को समाप्त कर देता. एलान कर देता कि पति-पत्नी जीवन-पर्यंत अलग नहीं हो सकते.पतियों की उन बुराइयों को मिटाने पर ज़ोर देता, जिनसे पत्नियां पीड़ित हैं. पत्नियों की भी उन बुराइयों पर चोट करता, जिनसे पति पीड़ित हैं. व्यभिचार को अस्वीकार्य और असहनीय घोषित करता.
एक बात सबको समझ लेनी चाहिए कि हिन्दुत्व और सनातन संस्कृति की नींव हैं हमारे परिवार. इसलिए हमारी परिवार व्यवस्था को नष्ट करने के लिए गहरी साज़िशें हुई हैं. यदि हम अपने सनातन परिवारों को नहीं बचा पाएंगे तो सनातन संस्कृति को बचाना भूल जाएं. राजनीति करने के लिए तो कुछ भी करते रहें, कुछ भी कहते रहें. धन्यवाद.
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi उत्तरदायी नहीं है.)
अभिरंजन कुमार जाने माने लेखक,पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं.तीन किताबें, हजारों लेख प्रकाशित. मीडिया में लगभग 27 साल का अनुभव. संप्रति न्यूट्रल मीडिया प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक हैं.
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