Purnia News: पूर्णिया पूर्व, एक संवाददाता। गुलाबबाग मेला सिर्फ खरीदारी और मनोरंजन का केंद्र नहीं रहा, बल्कि इसके इतिहास में हिंदी सिनेमा की भी एक खास याद जुड़ी है। वर्ष 1966 में फणीश्वरनाथ रेणु की रचना पर बनी चर्चित फिल्म ‘तीसरी कसम’ में गुलाबबाग मेले की झलक देखने को मिली थी। फिल्म में मेले में लगे थियेटर और वहां के माहौल को जिस तरह पर्दे पर उतारा गया, उसने गुलाबबाग की पहचान को कोसी-सीमांचल से बाहर तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। फिल्म का चर्चित गीत ‘पान खाए सैंया हमार’ भी दर्शकों के बीच खासा लोकप्रिय हुआ। गीत और फिल्म के कलाकारों के साथ-साथ गुलाबबाग मेले का दृश्य भी लोगों के आकर्षण का केंद्र बना। फिल्म में राजकपूर और वहीदा रहमान जैसे कलाकारों की मौजूदगी तथा रेणु की कहानी ने इसे अलग पहचान दी। फिल्म के माध्यम से गुलाबबाग मेले की उस दौर की रौनक, थियेटर और ग्रामीण परिवेश की झलक आज भी लोगों की स्मृतियों में बनी हुई है। बुजुर्गों के अनुसार उस समय सुदूर ग्रामीण इलाके के लोग गुलाबबाग मेला बैलगाड़ी से आते थे और सप्ताह भर रूक साल भर के सामान कि खरीदारी करते थे। इस मेले आपसी सौहार्द और गंगा जमुनी कि तहरीज उस वक्त से दिखती आ रही है। वही कई जिलों के छोटे-बड़े दुकानदारों के लिए रोजगार का बड़ा अवसर था। दूर-दराज से दुकानदार यहां पहुंचते थे। कई ऐसे परिवार थे, जो मेले में दुकान लगाने के बाद सालभर गुलाबबाग और आसपास के इलाकों में फेरी कर अपनी आजीविका चलाते थे। धीरे-धीरे कुछ दुकानदार गुलाबबाग में ही बस गए। गुलाबबाग निवासी बुजुर्ग बैजनाथ ठाकुर, चंदर साह, रानी देवी, अर्जुन साह और दिनेश सिंह, श्रवण साह, ज्योतिष मंडल आदि बताते हैं कि उनके जमाने का गुलाबबाग मेला अब पहले जैसा नहीं रहा। मेले की रौनक, थियेटर, अस्थायी दुकानें और दूर-दराज से आने वाले कारोबारियों की चहल-पहल आज भी उनकी यादों में ताजा है。
गुलाबबाग के मेला इतिहास में वर्ष 1999 से एक नया अध्याय जुड़ा। कारगिल युद्ध की थीम पर गणपति महोत्सव की शुरुआत मुख्य सड़क के किनारे की गई। शुरुआती वर्षों में यह आयोजन सड़क किनारे ही होता रहा। बाद में सड़क चौड़ीकरण के कारण आयोजन स्थल को लेकर स्थानीय लोगों ने मेला ग्राउंड में महोत्सव आयोजित करने का निर्णय लिया। वर्ष 2017 से गणपति महोत्सव गुलाबबाग मेला ग्राउंड में आयोजित किया जा रहा है। आज गणपति महोत्सव ने गुलाबबाग की पुरानी मेला संस्कृति को एक नए स्वरूप में जीवंत कर दिया है। पंडाल, सांस्कृतिक कार्यक्रम, धार्मिक आयोजन और बड़ी संख्या में पहुंचने वाले श्रद्धालुओं के कारण मेला ग्राउंड फिर से लोगों की आवाजाही और उत्सव का प्रमुख केंद्र बन गया है।
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