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सिकंदराबाद (Sikandrabad) उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले में स्थित एक शहर है. यह दिल्ली-NCR का हिस्सा है और बुलंदशहर जिले की प्रमुख तहसीलों में शामिल है. सिकंदराबाद तहसील के अंतर्गत 60 से अधिक गांव आते हैं, जिससे यह प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्र माना जाता है. दिल्ली, नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गाजियाबाद और बुलंदशहर जैसे शहरों से इसकी सड़क संपर्क व्यवस्था इसे क्षेत्रीय स्तर पर जोड़ती है.
सिकंदराबाद का इतिहास 15वीं शताब्दी से जुड़ा हुआ है. इस शहर की स्थापना वर्ष 1498 में दिल्ली सल्तनत के शासक सिकंदर लोदी ने कराई थी. बाद में मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल में इसे एक महल (प्रशासनिक इकाई) का मुख्यालय बनाया गया. समय के साथ यह क्षेत्र विभिन्न शासकों और प्रशासनिक व्यवस्थाओं के अधीन रहा. 18वीं शताब्दी में यहां कई सैन्य गतिविधियां हुईं. वर्ष 1736 में अवध के सूबेदार सआदत खान ने यहां अभियान चलाया, जबकि 1764 में भरतपुर की जाट सेना ने भी यहां डेरा डाला था. इसके बाद अलीगढ़ के युद्ध के पश्चात मराठा सेना की एक टुकड़ी ने भी इस क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित किया.
वर्ष 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भी सिकंदराबाद का नाम प्रमुख रूप से सामने आया. उस समय आसपास के गुर्जर, राजपूत और मुस्लिम समुदायों ने विद्रोह में भाग लिया. 27 सितंबर 1857 को ब्रिटिश अधिकारी कर्नल एडवर्ड ग्रेटहेड अपनी सेना के साथ यहां पहुंचे और क्षेत्र पर दोबारा नियंत्रण स्थापित किया.
ब्रिटिश काल में सिकंदराबाद प्रशासनिक गतिविधियों का एक प्रमुख केंद्र था. यहां तहसील कार्यालय और पुलिस स्टेशन के लिए एक किलेनुमा भवन बनाया गया था. इसके अलावा एक चैरिटेबल डिस्पेंसरी, एंग्लो-वर्नाक्युलर स्कूल और चर्च ऑफ इंग्लैंड मिशन की शाखा भी संचालित होती थी. शहर में कई पुराने मंदिर और मस्जिदें भी स्थित हैं, जो यहां के सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास का हिस्सा हैं.
सिकंदराबाद साहित्य के क्षेत्र में भी जाना जाता है. प्रसिद्ध फारसी और उर्दू कवि मुंशी हरगोपाल तफ्ता का संबंध इसी शहर से था. वे महान शायर मिर्जा गालिब के प्रिय शिष्यों में गिने जाते थे. गालिब के उर्दू पत्रों के संग्रह ‘उर्दू-ए-मुअल्ला’ की भूमिका लिखने का श्रेय भी उन्हें दिया जाता है.
यह शहर पहले पगड़ी निर्माण के लिए भी जाना जाता था, जहां पारंपरिक तरीके से सिर पर पहनने वाली पगड़ियां तैयार की जाती थीं. स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में डॉ. जमुना प्रसाद शर्मा का योगदान उल्लेखनीय रहा. उन्होंने वर्ष 1915 में यहां एक क्लिनिक की स्थापना की थी, जो आज भी उनके परिवार की चौथी पीढ़ी द्वारा संचालित किया जा रहा है.
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