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भारत ने अपनी वायु सुरक्षा क्षमता को नई धार देने की दिशा में एक और निर्णायक कदम उठा लिया है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता वाली रक्षा अधिग्रहण परिषद ने सशस्त्र बलों के लिए कई अत्याधुनिक हथियार प्रणालियों की खरीद को सैद्धांतिक मंजूरी दी है। बताया जा रहा है कि इनकी अनुमानित लागत 52 हजार करोड़ रुपए है। इन हथियार प्रणालियों में सबसे अधिक चर्चा उन तीन प्रणालियों की हो रही है जो भारत की वायु रक्षा ढाल को अभेद बनाने वाली हैं। ये हैं मध्यम दूरी सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली, बेहद कम दूरी वायु रक्षा प्रणाली और आकाश तरंग मानव रहित हवाई वाहन रोधी इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली।
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब दुनिया भर में युद्ध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। अब केवल लड़ाकू विमान या पारंपरिक मिसाइलें ही खतरा नहीं हैं, बल्कि सस्ते ड्रोन, झुंड में हमला करने वाले मानव रहित यान और बैलिस्टिक मिसाइलें भी आधुनिक युद्ध की दिशा तय कर रही हैं। पश्चिम एशिया में ईरान की मिसाइल रणनीति और यूक्रेन युद्ध में रूस के घातक बैलिस्टिक हमलों ने पूरी दुनिया को यह संदेश दे दिया है कि भविष्य की जंग आसमान पर कब्जे की होगी। भारत ने इसी चुनौती को भांपते हुए अपने वायु सुरक्षा कवच को नई ताकत देने का निर्णय लिया है।
हम आपको याद दिला दें कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ छोटे ड्रोन, फतह द्वितीय बैलिस्टिक मिसाइल और सुपरसोनिक मिसाइलों का इस्तेमाल करने की कोशिश की थी। पाकिस्तानी वायु सेना ने जालंधर के पास आदमपुर वायुसेना स्टेशन में तैनात एस-400 प्रणाली को निशाना बनाने के लिए सीएम-400 एकेजी सुपरसोनिक मिसाइलें दागी थीं। लेकिन भारतीय वायु रक्षा प्रणाली ने इन सभी हमलों को नाकाम कर दिया। भारतीय सेना की आकाश मिसाइल प्रणाली और स्वदेशी रूप से उन्नत एल सत्तर वायु रक्षा तोपों ने दुश्मन की रणनीति को ध्वस्त कर दिया था। यह घटना भारत की बहुस्तरीय वायु सुरक्षा क्षमता का प्रत्यक्ष प्रमाण बनकर सामने आई।
अब इसी अनुभव के आधार पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूरे देश के लिए एकीकृत वायु रक्षा नेटवर्क “सुदर्शन चक्र” बनाने की घोषणा की है। यह नेटवर्क भारत के ऊपर ऐसा सुरक्षा कवच तैयार करेगा जो बैलिस्टिक मिसाइलों से लेकर ड्रोन तक हर तरह के हवाई खतरे को रोकने में सक्षम होगा। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें अधिकतर प्रणालियां स्वदेशी होंगी, जबकि एस-400 जैसी अत्याधुनिक प्रणालियां भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रहेंगी।
मध्यम दूरी सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली इस नई ढाल की सबसे ताकतवर परत मानी जा रही है। इसे इजराइल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज और रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन ने मिलकर विकसित किया है। भारत डॉयनेमिक्स लिमिटेड इसका निर्माण भारत में कर रही है। यह मिसाइल सत्तर किलोमीटर से अधिक दूरी तक दुश्मन के लड़ाकू विमान, हेलीकाप्टर, ड्रोन और क्रूज मिसाइलों को मार गिराने में सक्षम है। रिपोर्टों के अनुसार ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इस प्रणाली ने सिरसा के ऊपर पाकिस्तानी फतह द्वितीय बैलिस्टिक मिसाइल को भी रोक दिया था। भारतीय थल सेना, नौसेना और वायुसेना में यह प्रणाली पहले से तैनात है, जिससे इसकी विश्वसनीयता और बढ़ जाती है।
बेहद कम दूरी वायु रक्षा प्रणाली को वायु सुरक्षा की अंतिम दीवार माना जाता है। इसका काम उन खतरों को खत्म करना है जो बाकी परतों को पार कर जाते हैं। यह महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों, रणनीतिक परिसंपत्तियों और संवेदनशील क्षेत्रों की रक्षा करती है। फिलहाल भारत इस भूमिका में इगला मिसाइल, एल सत्तर तोप और जु-23 मिलीमीटर तोपों का इस्तेमाल करता है, लेकिन रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन स्वदेशी प्रणाली भी विकसित कर रहा है। इससे भविष्य में आयात पर निर्भरता घटेगी और आत्मनिर्भर भारत अभियान को मजबूती मिलेगी।
तीसरी प्रणाली आकाश तरंग है, जो आधुनिक युद्ध की सबसे खतरनाक चुनौती यानी ड्रोन हमलों का जवाब है। यह एक इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्लेटफॉर्म है जो ड्रोन की संचार आवृत्तियों को बाधित कर उन्हें निष्क्रिय कर देता है। यानी दुश्मन का ड्रोन हवा में रहते हुए ही अपने संचालक से कट जाता है और बेकार हो जाता है। यह प्रणाली बिना किसी विस्फोट या भौतिक विनाश के दुश्मन के ड्रोन नेटवर्क को पंगु बना सकती है। भविष्य के युद्धों में जहां हजारों छोटे ड्रोन एक साथ हमला कर सकते हैं, वहां ऐसी तकनीक निर्णायक साबित होगी।
सामरिक दृष्टि से देखें तो भारत अब केवल सीमाओं की रक्षा नहीं कर रहा, बल्कि वह बहुस्तरीय वायु युद्ध क्षमता की ओर बढ़ रहा है। सुदर्शन चक्र नेटवर्क भारत को एक ऐसा राष्ट्र बनाएगा जिसके खिलाफ हवाई हमला करना दुश्मनों के लिए बेहद कठिन हो जाएगा। चीन और पाकिस्तान दोनों की संयुक्त चुनौती को देखते हुए यह कदम अत्यंत महत्वपूर्ण है। इससे भारत की प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होगी, सैन्य ठिकानों की सुरक्षा बढ़ेगी और दुश्मन की पहली चोट को निष्फल करने की ताकत मिलेगी।
रणनीतिक स्तर पर यह फैसला भारत की रक्षा नीति में बड़े बदलाव का संकेत भी है। अब भारत केवल प्रतिक्रिया देने वाला देश नहीं रहना चाहता, बल्कि वह ऐसी सुरक्षा व्यवस्था बना रहा है जिससे दुश्मन हमला करने से पहले ही कई बार सोचने पर मजबूर हो जाए। यही आधुनिक युद्ध की असली ताकत है और यही भारत के सुदर्शन चक्र की सबसे बड़ी रणनीतिक सफलता मानी जा रही है।
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