Xप्लेन: अमेरिकी बादशाहत खत्म! जानिए क्या है ब्रिक्स देशों का वैश्विक एजेंडा – ABP News

भारत की मेजबानी में आयोजित होने वाले BRICS के 18वें शिखर सम्मेलन के साथ यह समूह वैश्विक कूटनीति के केंद्र में आ गया है. वर्तमान में BRICS एक अत्यंत मजबूत जियोपॉलिटिकल और आर्थिक मंच के रूप में विकसित हो चुका है. इसमें ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ़्रीका जैसी प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ-साथ सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), ईरान, मिस्र, इथियोपिया और इंडोनेशिया जैसे नए देश भी शामिल हो चुके हैं. पश्चिमी देशों के वर्चस्व वाले बहुपक्षीय ढांचों के एक ठोस कूटनीतिक विकल्प के रूप में यह मंच उभर रहा है.
इस समूह का मुख्य एजेंडा वैश्विक आर्थिक गवर्नेंस को पुनर्गठित करना, विकासशील देशों को पश्चिमी वित्तीय प्रतिबंधों के प्रभावों से बचाना और आवश्यक सप्लाई चेन को पूरी तरह सुरक्षित करना है. इस बड़े बदलाव के केंद्र में ऊर्जा सुरक्षा, कच्चे तेल का व्यापार, रेयर अर्थ एलिमेंट्स पर नियंत्रण और अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता घटाने के लिए स्थानीय मुद्राओं में लेन-देन को बढ़ावा देना जैसे रणनीतिक कदम शामिल हैं. आइए जानते हैं सभी एजेंडा के बारे में एक-एक कर…
1-डॉलर से दूरी और अपनी मुद्रा में व्यापार (LCSS)
अभी तक दुनिया भर का व्यापार (खासकर तेल) अमेरिकी डॉलर और SWIFT जैसी पश्चिमी व्यवस्थाओं से होता है. ब्रिक्स देश अब डॉलर की निर्भरता खत्म करने के लिए अपने आपसी व्यापार में डॉलर की जगह अपनी खुद की मुद्राओं (जैसे भारतीय रुपया, चीनी युआन, रूसी रूबल) का इस्तेमाल कर रहे हैं. इससे देशों का पैसा और समय दोनों बचते हैं और अमेरिका के आर्थिक प्रतिबंधों का खतरा भी कम होता है.
2-कच्चे तेल और ऊर्जा की सुरक्षा
सऊदी अरब, रूस और ईरान जैसे बड़े तेल बेचने वाले देश अब भारत और चीन जैसे बड़े खरीदार देशों के साथ ब्रिक्स मंच पर एक साथ हैं. इससे तेल खरीदने और बेचने के लिए डॉलर के अलावा दूसरे विकल्पों का इस्तेमाल आसान हो गया है, जिससे भारत जैसे देशों को तेल आयात करने में आसानी होती है.
3-रेयर अर्थ और महत्वपूर्ण खनिज
इलेक्ट्रिक गाड़ियां (EV), मोबाइल, लैपटॉप और हथियार बनाने के लिए ‘रेयर अर्थ’ यानी दुर्लभ खनिजों की बहुत जरूरत होती है. अभी इसमें चीन का दबदबा है. ब्रिक्स देश मिलकर यह कोशिश कर रहे हैं कि इन खनिजों की सप्लाई सुरक्षित रहे, किसी एक देश पर पूरी तरह निर्भर न रहना पड़े और हर देश अपने यहां इनकी प्रोसेसिंग कर सके.
4-दुनिया की पुरानी व्यवस्था में बदलाव 
ब्रिक्स का मानना है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC), IMF और विश्व बैंक जैसे पुराने संगठन आज की दुनिया के हिसाब से काम नहीं कर रहे हैं और इनमें विकासशील देशों (‘ग्लोबल साउथ’) की सही सुनवाई नहीं होती. इसलिए ब्रिक्स का ‘न्यू डेवलपमेंट बैंक’ (NDB) गरीब और विकासशील देशों को बिना किसी सख्त और राजनीतिक शर्तों के आसानी से कर्ज देता है.
भारत की मेजबानी में हो रहा यह सम्मेलन इस बात का प्रमाण है कि ब्रिक्स का व्यापक एजेंडा एक व्यावहारिक ब्लूप्रिंट है, जिसका उद्देश्य वैश्विक वित्तीय व्यवस्था के समानांतर एक मजबूत आर्थिक ढांचा तैयार करना है. स्थानीय मुद्राओं में व्यापार निपटान को बढ़ावा देकर, बड़े तेल उत्पादकों और उपभोक्ताओं को आपस में जोड़कर, महत्वपूर्ण रेयर अर्थ सप्लाई चेन को सुरक्षित करके और वैश्विक शासन प्रणालियों में समान भागीदारी की मांग करके, ब्रिक्स अंतरराष्ट्रीय व्यापार की पूरी गतिशीलता को नए सिरे से परिभाषित कर रहा है.
उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के लिए यह सामूहिक मंच निरंतर खंडित होती जा रही दुनिया में अधिक आर्थिक स्वायत्तता, जोखिम प्रबंधन और रणनीतिक मजबूती हासिल करने का एक बेहतरीन मार्ग प्रशस्त करता है.
संकल्प ठाकुर पिछले 10 वर्षों से मीडिया जगत में सक्रिय हैं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत न्यूज़ 24 से की, इसके बाद न्यूज़ नेशन में कार्य किया. वर्तमान में वह एबीपी हिंदी डिजिटल में डिप्टी प्रोड्यूसर के पद पर कार्यरत हैं और पिछले सात वर्षों से संस्थान के साथ जुड़े हुए हैं. उन्हें खेल, अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम और चुनावी राजनीति से जुड़ी खबरों की गहरी समझ है. इसके अलावा साहित्य, कला और संस्कृति से जुड़े विषयों पर लेखन उनकी विशेष रुचि और विशेषज्ञता का क्षेत्र है. उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में स्नातक की उपाधि प्राप्त की है.
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