दुनिया छोड़ने वाले एक व्यक्ति का शरीर नौ लोगों तक को जीवनदान दे सकता है.फिर भी इस समय भारत में 10 लाख में कोई एक ही इंसान करता है अंगदान.उनमें भी पुरुष अंगदान करने के मामले में महिलाओं से काफी पीछे हैं.उत्तर प्रदेश के लखीमपुर जिले के निवासी मोहन (बदला हुआ नाम) का एक भीषण दुर्घटना में घायल हो गए.उन्हें लखनऊ के किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) के ट्रॉमा सेंटर में लाया गया.तीन दिन तक इलाज करने के बाद डॉक्टरों ने उसे ब्रेनडेड घोषित कर दिया.इसके बाद केजीएमयू के काउंसलर्स ने मोहन के परिवार को अंगदान के लिए मनाया.परिवार की सहमति के बाद मोहन के आंखों की कॉर्निया समेत कुछ अन्य अंगों को जरूरतमंद मरीजों में प्रत्यारोपित किया गया.मानव शरीर के हर हिस्से अलग अलग काम होते हैं.अगर किसी भी अंग में कोई परेशानी आ जाए तो शरीर के दूसरे हिस्सों की कार्यशैली पर भी कुछ न कुछ असर जरूर पड़ता ही है.ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए चिकित्सा विज्ञान में अंग प्रत्यारोपण यानी ऑर्गन ट्रांसप्लांट को बेहद कारगर माना जाता है.अपने परिजनों के अंगों के कुछ हिस्से से लेकर किसी अजनबी के अंग तक को प्रत्यारोपित किया जा सकता है.अब तो इस प्रक्रिया की गिनती दुनिया की सबसे अहम चिकित्सा प्रक्रियाओं में होती है.आधुनिक भारत में पहली बार 1971 में तमिलनाडु के वेल्लोर में स्थित क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज में पहला सफल गुर्दा प्रत्यारोपण किया गया.इस प्रत्यारोपण ने देश में ट्रांसप्लांट मेडिसिन की नींव रखी और इसके बाद अन्य अंगों जैसे लिवर, दिल, फेफड़े, पैंक्रियाज और कॉर्निया के प्रत्यारोपण की दिशा में भी प्रगति हुई.भारत सरकार ने अंगदान और प्रत्यारोपण को नियमित करने के लिए 1994 में “मानव अंग और ऊतक प्रत्यारोपण अधिनियम” भी बनाया.इस अधिनियम के जरिए अंगदान की प्रक्रिया को कानूनी रूप से मान्यता दी गई.एक के शरीर से 9 लोगों को जीवनदानजब किसी व्यक्ति का जीवन खत्म होने वाला हो या हो गया हो तब भी उसका शरीर कम से कम नौ लोगों की जान बचाने के काम आ सकता है.इसके अलावा 50 के करीब लोगों की जीवन की गुणवत्ता में प्रत्यारोपण की मदद से सुधार लाया जा सकता है.इसके तहत दिल, फेफड़े, लिवर, दोनों गुर्दे, पैंक्रियाज, आंत और दोनों आंखें प्रत्यारोपित की जा सकती हैं.इस समय में भारत में हर साल लगभग पांच लाख लोगों को किसी न किसी अंग के प्रत्यारोपण की जरूरत पड़ती है.उनमें से औसतन केवल 52,000 लोगों को ही अंग ही उपलब्ध हो पाते हैं यानी जरूरत का सिर्फ 10 फीसदी.ऐसा इसलिए क्योंकि अंगदान को लेकर अलग-अलग वर्गों में मिथक और डर फैले हुए हैं. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत में हर साल दो लाख लोग लिवर रोग और 50 हजार लोग दिल की बीमारियों से मरते हैं.आंकड़े ये भी दिखाते हैं कि डेढ़ लाख से अधिक लोगों को किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत होती है, लेकिन केवल पांच हजार लोगों ही प्रत्यारोपण मिल पाता है.स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की कार्यवाहक सचिव निवेदिता शुक्ला वर्मा के अनुसार, इस समय भी 63 हजार से अधिक लोग गुर्दा प्रत्यारोपण और 22 हजार लोग लिवर प्रत्यारोपण के लिए प्रतीक्षा में हैं.भारत में हर दस लाख में से 3-4 लोग ही नेत्रदान करते हैं.1 लाख से अधिक लोग कॉर्निया के कारण पैदा हुए अंधेपन से पीड़ित हैं.इकनॉमिक टाइम्स की हेल्थ वर्ल्ड वेबसाइट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, हर साल एक चौथाई जरूरतमंदों का ही कॉर्निया ट्रांसप्लांट हो पाता है.बाकी 75 फीसदी मरीज कॉर्निया मिलने का इंतजार करते ही रह जाते हैं.अंग प्रत्यारोपण के मामले में दुनिया में तीसरे स्थान पर भारतभारत कुल अंग प्रत्यारोपण के मामले में दुनिया में तीसरे स्थान पर है और लिविंग डोनर प्रत्यारोपण में पहले स्थान पर.राष्ट्रीय अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन, नोटो की ताजा वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में वर्ष 2024 के दौरान 18,911 अंग प्रत्यारोपण हुए, जो 2023 के 18,378 से कुछ ही अधिक है.इनमें से केवल 1,128 प्रत्यारोपण ब्रेनडेड या मृतक दाताओं से हुए, जबकि बचे हुए 15,500 से अधिक लिविंग डोनर्स से हुए.इन आंकड़ों से पता चलता है कि भारत में मृतकों से अंगदान की दर अभी भी प्रति दस लाख जनसंख्या पर 1 से भी कम है.ये दर स्पेन जैसे यूरोपीय देश से काफी पीछे है, जो कि 48 प्रति दस लाख दर्ज की गई है.रिपोर्ट के अनुसार, भारत में हर साल होने वाली 1.73 लाख सड़क दुर्घटनाओं में जान गंवाने वाले लोगों के अंग भी पूरी तरह से दान नहीं किए जाते.ऐसा इसलिए क्योंकि ब्रेन स्टेम डेथ या ब्रेनडेड प्रमाणीकरण के साथ मृतकों के परिवार की सहमति मिलना अकसर मुश्किल होता है.नोटो की रिपोर्ट कहती है कि पूर्वोत्तर भारत, उत्तराखंड, झारखंड, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख और अंडमान-निकोबार जैसे क्षेत्रों में 2024 में मृतकों के अंगदान का कोई आंकड़ा दर्ज ही नहीं हुआ.हर दिन अंगों का इंतजार करते 15 मरीज गंवाते हैं जान भारत में मरीजों की आवश्यकताओं, अंगों की उपलब्धता और प्रत्यारोपण के बीच के अंतर से स्पष्ट है कि तुरंत बदलाव की जरूरत है.आंकड़ों के अनुसार, लगभग अंतिम चरण के गुर्दे (किडनी) की बीमारी वाले दो लाख मरीज, 50 हजार लिवर की गंभीर बीमारी वाले और 50 हजार गंभीर हृदय रोग वाले मरीजों को अपनी जान बचाने के लिए प्रत्यारोपण की आवश्यकता होती है.इसके उलट हर साल केवल लगभग 1,600 किडनी, 700 लिवर और 300 हृदय ही प्रत्यारोपित किए जाते हैं.हर 10 मिनट में प्रत्यारोपण की प्रतीक्षा सूची में एक नया मरीज शामिल हो जाता है.हर दिन कम से कम 15 मरीज अंग के इंतजार में दम तोड़ देते हैं.अंतिम चरण की किडनी की बीमारी वाले 5 फीसदी से भी कम मरीजों का किडनी प्रत्यारोपण हो पाता है.सभी अंगों के लिए अगर राज्यवार विश्लेषण किया जाए तो 2024 में तमिलनाडु, महाराष्ट्र और दिल्ली-एनसीआर में सबसे अधिक प्रत्यारोपण हुए. दिल्ली में 4,426 प्रत्यारोपण हुए, जिनमें से 32 फीसदी ट्रांसप्लांट विदेशी नागरिकों को किए गए.तमिलनाडु में पिछले साल 96 हृदय प्रत्यारोपण दर्ज किए गए, उसके बाद कर्नाटक में 43 और गुजरात में 33 मामले दर्ज किए गए.चंडीगढ़, मध्य प्रदेश और गुजरात में 2024 में एक-एक हृदय प्रत्यारोपण दर्ज किया हुआ.फेफड़ों के प्रत्यारोपण की बात करें तो तमिलनाडु में 89, तेलंगाना में 76 और कर्नाटक में 23, पश्चिम बंगाल में 2 और मध्य प्रदेश और राजस्थान में एक-एक फेफड़े का प्रत्यारोपण किए गए.इसके अलावा, रिपोर्ट में महिला जीवित दाताओं की संख्या 63 फीसदी और मृतक दाताओं में पुरुषों की संख्या 77 फीसदी बताई गई.सड़क दुर्घटनाओं में होती हैं सबसे अधिक मौतेंभारत सरकार अंग प्रत्यारोपण के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की दिशा में कई कदम उठा रही है.राज्यस्तरीय अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन, सोटो के उत्तर प्रदेश के संयुक्त निदेशक और संजय गांधी स्नाकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) के चिकित्सा अधीक्षक प्रोफेसर डॉ.राजेश हर्षवर्धन बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में हर साल सड़क दुर्घटनाओं के कारण लगभग 25 हजार लोगों की मौत होती है.यह आंकड़ा देशभर में सबसे अधिक है.वो बताते हैं कि इनमें से लगभग आधे पीड़ित 18–35 वर्ष की उम्र के होते हैं.60–70 फीसदी मौतें ऐसी होती हैं, जिनमें व्यक्ति ब्रेनडेड घोषित किया जा सकता था.यानी हर साल करीब 15 हजार से अधिक संभावित अंगदाता केवल उत्तर प्रदेश में ही होते, लेकिन समय पर पहचान, प्रमाणन और पारिवारिक सहमति न मिलने के कारण यह संभावना खत्म हो जाती है.डॉ.राजेश कहते हैं, “दुर्घटनाओं में मरने वाले स्वस्थ युवा थे जो डोनर बन सकते थे.ऐसे में अगर दुर्घटना के ब्रेनडेड मामलों में अगर कुछ प्रतिशत अंग भी सफल दान में बदल जाएं तो इससे कई लोगों का जीवन बच सकता है”क्या अंतर है लिविंग, ब्रेनडेड और कैडेवर डोनर मेंजीवित या लिविंग अंगदान उसे कहते हैं जब एक स्वस्थ व्यक्ति अपना एक गुर्दा या लिवर का हिस्सा परिवार के सदस्य को चिकित्सकीय परीक्षण के बाद दे सकता है.वहीं मृतक दान या कैडेवर डोनेशन में ब्रेनडेड व्यक्ति के अंग देशभर में जरूरतमंद मरीजों को समय और परिस्थिति के अनुसार प्रत्यारोपित किए जा सकते हैं.अंगदान को बढ़ावा देने के लिए छुट्टियां दे रही केंद्र सरकारब्रेनडेड यानी मस्तिष्क की गतिविधि का स्थायी रूप से बंद होना, भारत में कानूनी रूप से मृत्यु माना जाता है और यह कोमा से अलग होता है.भले ही वेंटिलेटर से दिल की धड़कन बनी रहे, व्यक्ति को मृत माना जाता है.ब्रेनडेड की पुष्टि के लिए चार डॉक्टरों की टीम दो बार पुख्ता परीक्षण करती है और ये समय अंग निकालने के लिए काफी अहम माना जाता है.हालांकि इसके लिए समय पर ब्रेनडेड होने की पहचान और परिवार की सहमति दोनों की जरूरत होती है.ब्रेनडेड मामलों में जीवन और मृत्यु का फैसला अकसर आईसीयू में परिजनों के निर्णय पर निर्भर करता है.डॉ.हर्षवर्धन कहते हैं कि अगर ब्रेनडेड घोषित होने पर परिवार को सहानुभूति से समझाया जाए और सही जानकारी दी जाए तो एक की त्रासदी कइयों की आशा में बदल सकती है. डॉ.हर्षवर्धन कहते हैं, “यहां पर ट्रांसप्लांट समन्वयक की भूमिका बेहद अहम होती है.वे परिवारों को सही मार्गदर्शन देते हैं और इस अवसर को साकार करने में मदद करते हैं”अंग दान के लिए मौत की परिभाषा: ब्रेन डेड या दिल बंद होना?महिलाएं अंगदान में पुरुषों से इतनी आगे क्यों हैलखनऊ के एसजीपीजीआई के आंकड़ों को देखें तो एक साल में 111 महिलाओं ने किडनी दान की, जबकि केवल 16 पुरुषों ने ऐसा किया.महिलाएं अकसर पुरुषों की तुलना में अंगदान में आगे रहती हैं, तो इसके पीछे कई सामाजिक, सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक कारण माने जाते हैं.किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) में अंगदान के लिए ब्रेनडेड व्यक्ति के परिवार और लिविंग डोनर्स की काउंसलिंग करने वाले पीयूष श्रीवास्तव कहते हैं कि महिलाएं व्यक्तिगत और भावनात्मक स्तर पर निर्णय लेती हैं इसलिए बिना ज्यादा हिचकिचाहट के अंगदान के लिए तैयार हो जाती हैं.वहीं पुरुषों में कई बार अंगदान को लेकर डर, अपनी सेहत खराब होने की चिंता, आर्थिक बोझ की वजह से हिचकिचाहट रहती है जबकि महिलाएं “केयर गिवर” यानी देखभाल करने वाले की भूमिका को सबसे ऊपर रखते हुए त्याग और सेवा की भावना से प्रेरित होकर खुद पहल करती हैं.नेशनल मेडिकल जर्नल ऑफ इंडिया में 2022 में प्रकाशित एक लेख के अनुसार, महिलाएं लिविंग डोनर को तौर पर कहीं अधिक सामने आती हैं.महिलाओं के ही डोनर होने के और भी कई कारण सामने आते हैं.इनमें आर्थिक दबाव के साथ महिलाओं में आत्म-त्याग की भावना शामिल है.यही वजह है कि अकसर मां, पत्नी, बेटी या बहन ही अंगदान के लिए आगे आती हैं.लेख के अनुसार, महिलाएं किडनी डोनेट करने में झिझकती नहीं, जबकि पुरुष कम किडनी दान करते हैं.पुरुषों में डायबिटीज, हाई बीपी और शराब और सिगरेट पीने की आदतें ज्यादा होने से अकसर मेडिकल टेस्ट में वे डोनर बनने के लिए योग्य नहीं पाए जाते.पुरुषों की तुलना में महिलाएं ज्यादा योग्य पाई जाती हैं.बहुत अहम है परिजनों की काउंसलिंगकाउंसलर पीयूष श्रीवास्तव का कहना है कि अंगदान को लेकर फैली भ्रांतियां अब भी लोगों को अंगदान की शपथ लेने या परिवार को सहमति देने से रोकती हैं.सबसे आम गलतफहमी यह है कि डॉक्टर पंजीकृत दाताओं को बचाने की पूरी कोशिश नहीं करते, जो पूरी तरह गलत है.जीवन बचाने वाली टीम और ट्रांसप्लांट टीम अलग-अलग होती हैं और जीवन की रक्षा हमेशा पहली प्राथमिकता होती है.वो कहते हैं, “कुछ लोग सोचते हैं कि अंगदान से शरीर विकृत हो जाएगा या पारंपरिक अंतिम संस्कार नहीं हो पाएगा, जबकि सच्चाई यह है कि अंग निकालना एक सामान्य सर्जरी की तरह होता है”एक और गलतफहमी की ओर ध्यान दिलाते हुए श्रीवास्तव बताते हैं कि कुछ लोगों को लगता है कि उनका धर्म अंगदान की अनुमति नहीं देता, जबकि भारत में प्रचलित सभी धर्म जैसे हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सिख और बौद्ध अंगदान को सेवा और परोपकार का कार्य मानते हैं.श्रीवास्तव का कहना है, “एक और मिथक है कि अंगदान में खर्च आता है, जबकि दाता या उनके परिवार से कोई शुल्क नहीं लिया जाता”ऐसे बढ़ाई जा सकती है जागरूकताडॉ.हर्षवर्धन के अनुसार अंग प्रत्यारोपण के प्रति जागरूकता लाना आज की सबसे अहम जरूरत है.इसके लिए वो जो उपाय सुझाते हैं उनमें शामिल है – अंगदान को स्कूल और कॉलेजों के स्वास्थ्य शिक्षा पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना और अंगदाता परिवारों को सार्वजनिक रूप से सम्मानित किया जाना चाहिए ताकि वे दूसरों के लिए प्रेरणा बन सकें.इसके अलावा वे अंगदान के लिए भी वैसे ही मीडिया अभियान चलाए जाने की सिफारिश करते हैं जैसे देश में पोलियो उन्मूलन या रक्तदान के लिए चलाए गए थे.उनका मानना है कि अस्पतालों में प्रशिक्षित ट्रांसप्लांट समन्वयकों की मौजूदगी को सुनिश्चित करने से काफी फर्क पड़ेगा क्योंकि वे सही समय पर परिजनों से संवेदनशील और प्रभावी संवाद कर सकते हैं.
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